नगर निकाय चुनाव में यूपी बीजेपी 1200 से अधिक पसमांदा मुसलमानों को बनाएगी उम्मीदवार

बीजेपी की एक रैली की तस्वीर.
बीजेपी की एक रैली की तस्वीर.फोटो: चंद्रदीप कुमार/इंडिया टुडे

उत्तर प्रदेश में बीजेपी निकाय चुनाव में पूरी तैयारी के साथ उतरने जा रही है, लेकिन इस तैयारी के बीच इस बार पार्टी ने खास रणनीति बनाई है. जिसके तहत पसमांदा मुसलमानों को जोड़ते हुए पार्टी पहली बार किसी चुनाव में पसमांदा मुसलमानों को टिकट देने का काम करेगी. इस बार निकाय चुनाव में 1200 से अधिक पसमांदा मुसलमान उम्मीदवारों को बीजेपी अपना सिंबल देगी. वहीं इसको लेकर की रणनीति बनाई जा चुकी है और उम्मीदवारों को जांचने का काम भी शुरू हो गया है.

पसमांदा भारतीय मुसलमानों के बीच भारी बहुमत बनाते हैं, लेकिन नौकरियों, विधायिकाओं और सामुदायिक संगठनों में उनका प्रतिनिधित्व बहुत कम है. पसमांदाओं को अशरफ अभिजात वर्ग द्वारा जानबूझकर नजरअंदाज किया जाता है, जिन्हें "मुस्लिमता" पर अत्यधिक ध्यान केंद्रित करने के रूप में देखा जाता है. पसमांदा मुसलमानों की इसी स्थिति को बीजेपी अपनी पार्टी के साथ जोड़कर मुख्यधारा में लाने और मजबूत पदों पर बैठाने के काम का दावा कर रही है.

पसमांदा एक फारसी शब्द है जिसका अर्थ है 'पीछे छूट जाने वाले'. इस शब्द का प्रयोग मुसलमानों में दलित वर्गों का वर्णन करने के लिए किया जाता है जिन्हें जानबूझकर या जानबूझकर सत्ता और विशेषाधिकार के फल से बाहर रखा गया है. पिछड़े, दलित और आदिवासी मुसलमान समुदाय के भीतर जाति-आधारित भेदभाव को जाहिर करने के लिए पसमांदा शब्द का उपयोग किया जाता है.

सूबे में पसमांदा सम्मेलन के जरिए बीजेपी की कवायद मुसलमानों के तबके को जोड़ने की है, जिसको लेकर के लखनऊ समेत दो दर्जन से ज्यादा जिलों में ये सम्मेलन कराए जा रहे हैं. बीजेपी की कोशिश है कि पसमांदा मुसलमानों को जोड़कर उनके लाभार्थी और निकाय चुनाव में उम्मीदवारों के जरिए इस समाज की नुमाइंदगी कराई जाए. इसी सोच के साथ अब इस उपेक्षित मुस्लिम वर्ग को पार्टी निकाय चुनाव में उम्मीदवारी के जरिए अपना राजनीतिक हथियार बनाने की तैयारी में है.

पसमांदा मुसलमानों के सम्मेलन और उन्हें टिकट देने के सवाल पर यूपी अल्पसंख्यक मोर्चा के अध्यक्ष कुंवर बासित अली ने कहा,

"यह तबका मुसलमानों का 80 फीसदी है जो हमेशा उपेक्षित रहा. बीजेपी सरकार ने उनको उनका हक दिया हिस्सेदारी दी पदों पर बैठाया और अब निकाय चुनाव में टिकट देकर उनकी चुनाव में भी हिस्सेदारी दी जाएगी. इस गुलदस्ते में रायनी, सैफी, अंसारी, सलमानी जैसे समाज है, जो सब मिलकर कमल खिलाते हैं."

कुंवर बासित अली

वहीं दूसरी तरफ यूपी तक से बात करते हुए यूपी के डिप्टी सीएम मुख्यमंत्री बृजेश पाठक ने कहा कि योगी-मोदी सरकार में मुसलमानों की योजनाओं ने सीधा असर किया है और आज पसमांदा मुसलमान मुख्यधारा से जुड़ा है. विपक्ष के लोगों ने महज राजनीति के लिए मुसलमानों को वोट बैंक बनाया, लेकिन बीजेपी ने ही पसमांदा मुसलमानों के मुद्दों पर सबसे ज्यादा काम किया है और पार्टी की कवायत आगे भी उन्हें साथ लेकर चलने की है.

वहीं, इसपर कांग्रेस पार्टी ने पलटवार किया है और पार्टी के नेता नसीमुद्दीन सिद्दीकी ने सीधे तौर पर बीजेपी के एमएलए और एमपी के ऊपर मुसलमानों को दबाने का आरोप लगाया है. सिद्दीकी ने कहा कि पहले पार्टी यह बताए कि जो नेता मुसलमानों को चुन-चुन कर मारने की बात कर रहे हैं उस पर पार्टी ने क्या संज्ञान लिया है. ऐसे में साफ है कि ना तो पसमंदा मुसलमान और ना ही कोई और मुसलमान बीजेपी की इस साजिश में फंसने वाला है.

समाजवादी पार्टी ने भी बीजेपी की राजनीति पर पलटवार किया है. सपा प्रवक्ता नितेंद्र सिंह यादव ने कहा,

"बीजेपी ने हमेशा बांटने वाली राजनीति की है और इस बार पसमांदा मुसलमानों को बरगलाने का काम कर रहे हैं लेकिन मुसलमान टूटने वाला नहीं है और वह आने वाले निकाय चुनाव में समाजवादी पार्टी का साथ देगा."

नितेंद्र सिंह यादव

साथ ही उन्होंने बीजेपी पर मुस्लिमों की आड़ में वोट बैंक की राजनीति करने का भी आरोप लगाया.

भले ही पसमांदा मुसलमानों को लेकर विपक्ष बीजेपी पर हमलावर है, लेकिन पार्टी ने रणनीति के साथ इस बार निकाय चुनाव में ना सिर्फ उन्हें टिकट देकर, बल्कि 2024 के मद्देनजर भी इस वर्ग को जोड़ने की कवायद पहले ही शुरू कर दी है. पार्टी का मानना है कि लाभार्थी वर्क के तौर पर पसमांदा मुसलमान सीधे तौर पर पार्टी की सरकार की योजनाओं से जुड़ा है और आने वाले समय में भी इसी वर्ग की नुमाइंदगी चुनाव में देखने को मिलेगी, जिसको लेकर के कवायत तेज हो गई है.

बीजेपी की एक रैली की तस्वीर.
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