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पल्लवी पटेल ने यूनिवर्सिटी प्रोफेसरों और महाविद्यालय शिक्षकों के बीच भेद पर सवाल किया तो मंत्री ये बोले

Pallavi Patel Speech UP Assembly: पल्लवी पटेल ने विधानसभा में यूनिवर्सिटी प्रोफेसरों और सरकारी कॉलेज के शिक्षकों के छुट्टियों के नियमों में भेदभाव का मुद्दा उठाया. देखिए मंत्री संदीप सिंह ने इस पर क्या सफाई दी और क्यों दोनों के नियम अलग हैं.

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उत्तर प्रदेश विधानसभा में विधायक पल्लवी पटेल ने यूनिवर्सिटी प्रोफेसरों और राजकीय महाविद्यालय के शिक्षकों के लिए मेडिकल लीव (चिकित्सीय अवकाश) में असमानता का मुद्दा उठाया. उन्होंने सरकार से पूछा कि जब दोनों यूजीसी (UGC) के नियमों से संचालित होते हैं, तो प्रोफेसरों को मेडिकल लीव की सुविधा क्यों नहीं दी जा रही है. उन्होंने कहा कि राजकीय महाविद्यालयों के शिक्षकों को तो मेडिकल लीव मिलती है, लेकिन यूनिवर्सिटी प्रोफेसर्स को इस सुविधा से बाहर रखा गया है. 

पल्लवी पटेल ने सवाल किया कि क्या सरकार यह मानती है कि यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर बीमार ही नहीं पड़ते? उन्होंने मांग की कि विश्वविद्यालय अधिनियम 1973 में संशोधन कर प्रोफेसरों को भी मेडिकल लीव दी जाए. मंत्री ने स्पष्ट किया कि दोनों के नियम अलग-अलग हैं. महाविद्यालय के शिक्षक सरकारी कर्मचारी माने जाते हैं और अनुच्छेद 309 के तहत आते हैं, जबकि यूनिवर्सिटी प्रोफेसर विश्वविद्यालय अधिनियम के परिनियमों से चलते हैं. 

तुलनात्मक अंतर

  • यूनिवर्सिटी प्रोफेसर 62 वर्ष में रिटायर होते हैं, जबकि महाविद्यालय शिक्षक 60 वर्ष में. 
  • यूनिवर्सिटी शिक्षकों को साल में 10 उपर्जित अवकाश (EL) और 10 विशेष आकस्मिक अवकाश मिलते हैं, जबकि राजकीय महाविद्यालय शिक्षकों को केवल 1 EL मिलता है. 
  • यूनिवर्सिटी प्रोफेसर्स के लिए सेवाकाल में अधिकतम 240 दिन की 'क्यूम्युलेटिव लीव' की व्यवस्था है, जबकि महाविद्यालय शिक्षकों को एक वर्ष का मेडिकल लीव मिलता है. 

इसके बाद मंत्री ने कहा कि दोनों की परिस्थितियां अलग हैं, इसलिए उनकी सीधी तुलना नहीं की जा सकती. 

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