Farrukhabad Sadar election 2027: उत्तर प्रदेश की राजनीति में कई ऐसी विधानसभा सीटें हैं जहां चुनावी मुकाबला केवल राजनीतिक दलों के बीच नहीं होता बल्कि इतिहास, विरासत और सामाजिक समीकरणों के इर्द-गिर्द घूमता है. ऐसी ही एक बेहद दिलचस्प और हॉट सीट है फर्रुखाबाद सदर. कभी कांग्रेस का मजबूत किला रही इस सीट पर जनसंघ और बीजेपी ने अपनी जमीन तैयार की. बीजेपी के कद्दावर नेता स्वर्गीय ब्रह्मदत्त द्विवेदी की सियासी विरासत ने फर्रुखाबाद सदर को पूरे प्रदेश में एक अलग पहचान दी.
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2027 के महासमर से पहले यूपी Tak के खास शो 'यूपी किसका' में आज हम टटोलेंगे फर्रुखाबाद सदर सीट का सियासी मिजाज. क्या बीजेपी अपनी विरासत और संगठन के दम पर लगातार तीसरी जीत दर्ज करेगी या समाजवादी पार्टी (सपा) इस पुराने किले में वापसी कर पाएगी?
फर्रुखाबाद का सियासी इतिहास
फर्रुखाबाद सदर सीट का इतिहास काफी उतार-चढ़ाव भरा रहा है. फरवरी 1997 में भाजपा के दिग्गज नेता ब्रह्मदत्त द्विवेदी की हत्या के बाद यहां की राजनीति पूरी तरह बदल गई. 1997 के उपचुनाव में उनकी पत्नी प्रभा द्विवेदी ने बीजेपी के टिकट पर जीत हासिल की और मंत्री बनीं.
2002 के चुनाव में हत्याकांड के आरोपी निर्दलीय प्रत्याशी विजय सिंह ने बड़ा उलटफेर करते हुए जीत दर्ज की. बाद में विजय सिंह सपा में शामिल हुए और 2007 व 2012 के चुनावों में बीजेपी के सुनील दत्त द्विवेदी को हराया. 2017 में बीजेपी लहर के दौरान ब्रह्मदत्त द्विवेदी के बेटे सुनील दत्त द्विवेदी (मेजर साहब) ने शानदार वापसी की और विजय सिंह को तीसरे नंबर पर धकेल दिया. 2022 में भी सुनील दत्त द्विवेदी ने अपनी जीत बरकरार रखी और अब वह हैट्रिक लगाने की तैयारी में हैं.
बीजेपी का 2047 वाला बूथ प्लान बनाम सपा का 'गंगा एक्सप्रेसवे' मुद्दा
2027 के चुनाव को लेकर दोनों ही मुख्य दलों के अपने-अपने बड़े दावे हैं.
बीजेपी का दावा: बीजेपी पदाधिकारियों का कहना है कि पार्टी का कार्यकर्ता 365 दिन और 24 घंटे चुनाव मोड में रहता है. जिले के सभी 1,612 बूथों पर पार्टी का संगठन और बूथ प्रबंधन बेहद मजबूत है. पार्टी विकास और सुरक्षा के नाम पर 2047 तक की रणनीति के साथ चुनावी मैदान में है.
समाजवादी पार्टी का हमला: सपा नेताओं का आरोप है कि बीजेपी ने केवल वादे और भ्रम फैलाने का काम किया है. महंगाई, बेरोजगारी, पर्चा लीक और विकास कार्यों की उपेक्षा से जनता त्रस्त है. सपा का कहना है कि शाहजहांपुर के लिए गंगा एक्सप्रेसवे और ग्रीनफील्ड एक्सप्रेसवे ले जाया गया. लेकिन स्थानीय बीजेपी सांसद-विधायक इसे फर्रुखाबाद में रोकने में नाकाम रहे. सपा इस बार पीडीए के दम पर जीत का दावा कर रही है.
फर्रुखाबाद सदर सीट का जातीय समीकरण
फर्रुखाबाद सदर सीट पर जीत का गणित तय करने में ब्राह्मण और मुस्लिम मतदाता सबसे निर्णायक भूमिका निभाते हैं. लगभग 3,54,286 कुल मतदाताओं वाली इस सीट का अनुमानित जातीय गणित इस प्रकार है.
मुस्लिम: 70,000
ब्राह्मण: 55,000
अनुसूचित जाति (SC): 50,000
लोधी: 38,000
शाक्य: 35,000
वैश्य: 25,000
यादव: 24,000
कुर्मी: 20,000
बाथम (कश्यप): 20,000
क्षत्रिय: 18,000
क्या कहते हैं स्थानीय पत्रकार?
स्थानीय पत्रकारों और सियासी विश्लेषकों की मानें तो फर्रुखाबाद में चुनाव अक्सर विकास के बजाय जातीय समीकरणों के आधार पर लड़े जाते रहे हैं. जिले में डिवाइडर, बेहतर सड़कों और औद्योगिक इंफ्रास्ट्रक्चर की कमी जैसे मुद्दे अब भी बने हुए हैं. जानकारों का मानना है कि यदि बीजेपी अपने प्रत्याशियों के कामकाज और फीडबैक के आधार पर टिकट वितरण करती है, तो उसकी राह आसान होगी. वहीं अगर सपा अकेले दम पर मजबूती से चुनाव लड़ती है और सही उम्मीदवार उतारती है तो फर्रुखाबाद सदर में इस बार कड़ा और संघर्षपूर्ण मुकाबला देखने को मिल सकता है.
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