यूपी पंचायत चुनाव में देरी पर इलाहाबाद हाईकोर्ट ने राज्य निर्वाचन आयोग से पूछा कब होंगे इलेक्शन? 10 जुलाई को बतानी होगी डेट

इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ बेंच ने यूपी पंचायत चुनाव में देरी पर नाराजगी जताई है. कोर्ट ने सरकार को 10 जुलाई को ओबीसी आयोग की रिपोर्ट पेश करने और निर्वाचन आयोग को चुनाव की संभावित तारीख बताने का निर्देश दिया है.

UP Panchayat Chunav Update

आशीष श्रीवास्तव

04 Jun 2026 (अपडेटेड: 04 Jun 2026, 09:41 AM)

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उत्तर प्रदेश में पंचायत चुनाव कराए जाने में हो रही देरी को लेकर इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ बेंच ने कड़ी नाराजगी व्यक्त की है. कोर्ट ने मामले का संज्ञान लेते हुए राज्य निर्वाचन आयोग से स्पष्ट रूप से पूछा है कि पंचायत चुनाव कब तक कराए जाएंगे, इसकी संभावित तारीख कोर्ट को बताई जाए. इस संवेदनशील मामले की सुनवाई कर रही खंडपीठ ने राज्य सरकार और निर्वाचन आयोग दोनों को कड़े निर्देश जारी किए हैं.

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10 जुलाई को होगी अगली सुनवाई, पेश करनी होगी OBC आयोग की रिपोर्ट

कोर्ट में इस मामले की सुनवाई जटिस शेखर बी. सराफ और जस्टिस अवधेश कुमार चौधरी की खंडपीठ द्वारा की जा रही है. इस मामले की अगली सुनवाई के लिए 10 जुलाई की तारीख तय की गई है. कोर्ट ने राज्य सरकार को सख्त निर्देश दिया है कि 10 जुलाई को ही पिछड़ा वर्ग आयोग (ओबीसी आयोग) की रिपोर्ट कोर्ट के समक्ष पेश की जाए. राज्य निर्वाचन आयोग को भी उसी दिन (10 जुलाई को) पंचायत चुनाव की संभावित तारीख बताने के लिए कहा गया है.

क्यों कानूनी विवादों में घिरा है प्रधानों को प्रशासक बनाने का फैसला?

यह पूरा कानूनी मामला मौजूदा ग्राम प्रधानों को ही प्रशासक बनाए जाने के फैसले के खिलाफ दायर याचिका से जुड़ा हुआ है. याचिकाकर्ता ओमप्रकाश प्रजापति ने कोर्ट में तर्क दिया कि पंचायत राज अधिनियम के अनुसार, किसी भी ग्राम प्रधान का कार्यकाल अधिकतम 5 वर्ष का होता है. याचिकाकर्ता का कहना है कि समय पर चुनाव न कराकर मौजूदा प्रधानों को ही प्रशासक नियुक्त करना उनके कार्यकाल को अप्रत्यक्ष रूप से आगे बढ़ाने जैसा है, जो कि पूरी तरह कानून के खिलाफ है. उन्होंने पूर्व के उदाहरण देते हुए तर्क दिया कि इससे पहले जब भी चुनाव में देरी हुई थी, तब एडीओ (ADO) पंचायत या बीडीओ (BDO) को प्रशासक बनाया जाता था. वर्ष 2021 और 2000 में जब पंचायत चुनाव देर से हुए थे, तब अधिकारियों को ही प्रशासक नियुक्त किया गया था.

57,694 ग्राम पंचायतों का कार्यकाल समाप्त, सरकार की ये थी दलील

उत्तर प्रदेश की कुल 57,694 ग्राम पंचायतों का कार्यकाल 26 मई 2026 को पूरी तरह समाप्त हो चुका है. कार्यकाल खत्म होने से ठीक पहले राज्य सरकार ने 25 मई को एक आदेश जारी किया था. इस आदेश के तहत पंचायत चुनाव होने तक या अधिकतम 6 माह के लिए मौजूदा प्रधानों को ही प्रशासक नियुक्त कर दिया गया था. इस फैसले के पीछे सरकार का तर्क था कि पंचायत चुनाव में ओबीसी (OBC) आरक्षण तय करने के लिए गठित किए गए आयोग को अपनी रिपोर्ट सौंपने में 3 से 6 माह का समय लग सकता है. हालांकि, हाईकोर्ट ने सरकार की इस दलील को स्वीकार नहीं किया और ओबीसी आयोग की रिपोर्ट को जल्द से जल्द प्रस्तुत करने का आदेश दिया है. इसके साथ ही, पंचायत चुनाव की मतदाता सूची का अंतिम प्रकाशन अभी 10 जून को होना निर्धारित है.

योगी सरकार ने क्यों लिया प्रधानों को प्रशासक बनाने का निर्णय?

इस बार योगी सरकार ने पूर्व की व्यवस्था को बदलते हुए राजस्थान, मध्य प्रदेश और उत्तराखंड राज्य की तर्ज पर ग्राम प्रधानों को ही प्रशासकीय जिम्मेदारी सौंपने का फैसला किया. इसके पीछे सरकार के अपने प्रशासनिक और राजनीतिक तर्क हैं. सरकार का मानना है कि ग्राम प्रधान ग्रामीण क्षेत्रों में विकास कार्यों, सरकारी योजनाओं के सुचारू क्रियान्वयन और चुनावी प्रबंधन को संभालने की सबसे अहम कड़ी होते हैं. आगामी विधानसभा चुनाव से पहले ग्रामीण क्षेत्रों में प्रधानों की इसी महत्वपूर्ण भूमिका को देखते हुए उन्हें प्रशासक बनाए रखने का निर्णय लिया गया. इसके अलावा खुद प्रधान संगठन ने भी सरकार के सामने यह मांग रखी थी कि प्रशासनिक समिति या फिर प्रधानों को ही यह जिम्मेदारी सौंपी जाए. अब इस पूरे प्रकरण में आगामी 10 जुलाई को होने वाली सुनवाई पर सबकी नजरें टिकी हुई हैं, जहां ओबीसी आयोग की रिपोर्ट और पंचायत चुनाव की संभावित तारीख आने के बाद स्थिति पूरी तरह स्पष्ट हो सकती है.