देशभर में NEET-UG पेपर लीक और परीक्षा में हुई धांधलियों को लेकर छात्रों का गुस्सा शांत होने का नाम नहीं ले रहा है. जंतर-मंतर से लेकर सड़कों तक जारी युवाओं के विरोध प्रदर्शन के बीच, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने ऐलान किया है कि पेपर लीक के आरोपियों को कड़ी से कड़ी सजा दिलाने और मामलों के जल्द निपटारे के लिए विशेष फास्ट ट्रैक कोर्ट बनाए जाएंगे.
ADVERTISEMENT
इस फैसले के आते ही देश की सियासत भी पूरी तरह गरमा गई. समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष और उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने सरकार के इस कदम पर जोरदार हमला बोला है. उन्होंने सोशल मीडिया पर अंग्रेजी-हिंदी के शब्दों का खेल खेलते हुए लिखा,
“जब बीमारी ROOT में है तो FRUIT के इलाज से कोई नहीं मानने वाला... NO FAST TRACK; BJP GO BACK!”
अखिलेश का कहना है कि समस्या की असली वजह खुद सरकार की नीतियां हैं, सिर्फ अदालतों से बात नहीं बनेगी.
आम अदालत और फास्ट ट्रैक कोर्ट में क्या अंतर है?
अगर आप कभी किसी आम अदालत के चक्कर में पड़े हैं तो जानते होंगे कि तारीख पर तारीख मिलना कितना आम है. लेकिन फास्ट ट्रैक कोर्ट का गणित एकदम अलग होता है-
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 21 हर नागरिक को जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता की गारंटी देता है. देश की शीर्ष अदालतों ने समय-समय पर यह साफ किया है कि "समय पर न्याय पाना भी जीवन के अधिकार का ही हिस्सा है."
कानून की दुनिया में एक मशहूर कहावत है- न्याय में देरी, न्याय न मिलने के बराबर है. महिलाओं, बच्चों से जुड़े अपराधों, दंगों और भ्रष्टाचार के बाद अब पेपर लीक जैसे गंभीर मुद्दों पर भी इसी सिद्धांत को लागू किया जा रहा है, ताकि लाखों युवाओं का भविष्य तारीखों की भेंट न चढ़े.
ADVERTISEMENT











