सुप्रीम कोर्ट ने 13 साल से अचेत अवस्था जी रहे गाजियाबाद के हरीश राणा को पैसिव यूथेनेशिया यानी निष्क्रिय इच्छा मृत्यु की मंजूरी दे दी है. यह फैसला एक पिता के उस संघर्ष की लंबी कहानी है जिसने अपने बेटे की सांसें बचाने के लिए अपना सब कुछ दांव पर लगा दिया था. हरीश के पिता अशोक राणा ने इलाज के लिए अपना तीन मंजिला मकान तक बेच दिया था. लेकिन जब सुधार की सारी उम्मीदें खत्म हो गईं तब उन्होंने भारी मन से बेटे की इच्छा मृत्यु की मांग को लेकर कोर्ट का दरवाजा खटखटाया था.
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सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस जेबी पारदीवाला और जस्टिस केवी विश्वनाथन की पीठ ने माना कि हरीश स्थायी रूप से अचेत हैं और उनकी स्थिति में सुधार की कोई संभावना नहीं है. कोर्ट ने कहा कि चिकित्सकीय पोषण भी उपचार का हिस्सा है और अगर यह रोगी के हित में नहीं है, तो इसे हटाया जा सकता है.
पिता ने इलाज में सब कुछ खो दिया- मकान बिका, जमापूंजी खत्म
मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, हरीश के पिता अशोक राणा ने अपने बेटे को मौत के मुंह से निकालने के लिए तन, मन और धन सब लगा दिया. 2013 से शुरू हुए इस इलाज में परिवार ने करोड़ों रुपये खर्च कर दिए. हालत यह हो गई कि इलाज के खर्चों को पूरा करने के लिए अशोक राणा को साल 2021 में दिल्ली स्थित अपना तीन मंजिला मकान तक बेचना पड़ा.अब वे राजनगर एक्सटेंशन के एक छोटे से फ्लैट में रहते हैं.
हर महीने खर्च हो रहे 40 से 50 हजार रुपये
अशोक बताते हैं कि हरीश के इलाज में हर महीने 40 से 50 हजार रुपये खर्च होते हैं, इसके अलावा एक नर्स की सेवा के लिए 27 हजार रुपये अलग से देने पड़ते हैं. हार मान चुके पिता भावुक होकर कहते हैं, "करोड़ों रुपये खर्च कर दिए, लेकिन अब लगता है कि हम हार गए."
वेटलिफ्टिंग चैंपियन बनने का सपना रह गया अधूरा
हरीश राणा सिर्फ एक छात्र नहीं, बल्कि एक होनहार खिलाड़ी थे. वे चंडीगढ़ यूनिवर्सिटी में सिविल इंजीनियरिंग के अंतिम वर्ष के छात्र थे और यूनिवर्सिटी टॉपर रह चुके थे. उनका सपना वेटलिफ्टिंग में चैंपियन बनने का था और वे दो बार यूनिवर्सिटी स्तर पर विजेता भी रहे थे. लेकिन तीसरी प्रतियोगिता से ठीक पहले 21 अगस्त 2013 की रात बहन से बात करते समय वे पीजी की चौथी मंजिल से गिर गए और उनका यह सपना हमेशा के लिए चूर हो गया.
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