मायावती ने क्यों नहीं की कांग्रेस सांसद तनुज पुनिया से मुलाकात? अब सामने आ गई ये बड़ी वजह

Aaj ka UP: मायावती ने दो कांग्रेस नेताओं से मिलने से मना किया. यह मुलाकात राजनीतिक संदेश के तौर पर देखी जा रही है. कांग्रेस दलित वोटों को जोड़ने की कोशिश कर रही है.

यूपी तक

• 12:42 PM • 21 May 2026

follow google news

Aaj ka UP: यूपी तक का खास शो 'आज का यूपी' राज्य की राजनीतिक और सामाजिक हलचलों का सबसे सटीक विश्लेषण लेकर हाजिर है. आज के इस विशेष बुलेटिन में हम राज्य की तीन बड़ी खबरों का विस्तृत विश्लेषण करेंगे. हमारी पहली और सबसे बड़ी खबर बहुजन समाज पार्टी की सुप्रीमो मायावती के लखनऊ आवास से है जहां कांग्रेस के दो बड़े नेता बिना किसी पूर्व प्रोटोकॉल या बुलावे के पहुंच गए.लेकिन मायावती ने उनसे मिलने से साफ इनकार कर दिया.जानेंगे इस सियासी संदेश के पीछे का पूरा खेल. हमारी दूसरी बड़ी खबर कांग्रेस सांसद राहुल गांधी के रायबरेली और अमेठी दौरे से जुड़ी है जहां उन्होंने 1857 के क्रांतिकारी वीरांगना/क्रांतिकारी उदा देवी पासी और राजा बिजली पासी के इतिहास से जुड़े वीर पुरुष हीरा पासी की प्रतिमा का अनावरण कर अवध क्षेत्र में एक बड़े दलित (पासी) नैरेटिव को साधने की कोशिश की है. वहीं हमारी तीसरी बड़ी खबर विपक्षी खेमे के भीतर चल रही अंदरूनी खींचतान की है जिसमें एक तरफ अखिलेश यादव 2027 में कांग्रेस के साथ गठबंधन का दावा कर रहे हैं तो दूसरी तरफ कांग्रेस की इस 'दलित पॉलिटिक्स' ने समाजवादी पार्टी को भी हैरान कर दिया है.आइए इन तीनों बड़ी खबरों का सिलसिलेवार और गहराई से विश्लेषण करते हैं.

यह भी पढ़ें...

1. मायावती के दरवाजे से बैरंग लौटे कांग्रेस नेता

लखनऊ में बहुजन समाज पार्टी की राष्ट्रीय अध्यक्ष मायावती के आवास के बाहर अचानक उस वक्त सियासी सरगर्मी बढ़ गई जब कांग्रेस के दो बड़े चेहरे वहां वॉक-इन (बिना अपॉइंटमेंट) पहुंच गए. ये नेता थे बाराबंकी से कांग्रेस के नवनिर्वाचित सांसद तनुज पुनिया और कांग्रेस अनुसूचित जाति (SC) सेल के राष्ट्रीय चेयरमैन व दिल्ली के पूर्व विधायक राजेंद्र पाल गौतम. दोनों नेताओं ने बकायदा मायावती के आवास पर सुरक्षा रजिस्टर में अपना नाम दर्ज कराया और मिलने की इच्छा जताई. लेकिन बसपा प्रमुख ने उनसे मिलने से साफ मना कर दिया और दोनों नेताओं को बैरंग वापस लौटना पड़ा.

कांग्रेस की दलील बनाम मायावती का सियासी रुतबा

इस पूरे घटनाक्रम पर कांग्रेस नेताओं ने सफाई देते हुए कहा कि यह उनका पूरी तरह से निजी फैसला था. तनुज पुनिया का कहना था कि वे लखनऊ में पार्टी दफ्तर में थे तभी उन्हें जानकारी मिली कि दलितों की इतनी बड़ी नेता मायावती की तबीयत थोड़ी नासाज है.इसी शिष्टाचार के नाते वे उनका हाल-चाल और कुशलक्षेम पूछने सीधे उनके दरवाजे पर पहुंच गए थे.

हालांकि राजनीतिक गलियारों में इस बात को कोई भी महज एक 'शिष्टाचार भेंट' नहीं मान रहा है. सबको मालूम है कि जिस तरह कांग्रेस के शीर्ष नेतृत्व जैसे राहुल गांधी से मिलने का एक सख्त प्रोटोकॉल होता है ठीक उसी तरह मायावती से भी कोई राह चलते या अचानक जाकर नहीं मिल सकता. भले ही आज के वक्त में बसपा के पास केवल एक विधायक हो और लोकसभा में कोई सांसद न हो लेकिन मायावती के सियासी रुतबे और उनके कड़े प्रोटोकॉल में कोई कमी नहीं आई है. वह आज भी दलित समाज की सबसे बड़ी सर्वमान्य नेता हैं और वह किससे, कब और कैसे मिलेंगी, यह केवल वही तय करती हैं.

2. अवध में राहुल गांधी का 'पासी कार्ड'

जिस वक्त लखनऊ में कांग्रेस के दो नेता मायावती के घर के बाहर खड़े थे ठीक उसी समय कांग्रेस के शीर्ष नेता राहुल गांधी अमेठी और रायबरेली के दौरे पर थे. राहुल गांधी यहां 1857 के महान पासी क्रांतिकारी हीरा पासी की जयंती के अवसर पर आयोजित एक भव्य कार्यक्रम में शिरकत करने पहुंचे थे. राहुल गांधी ने यहां हीरा पासी की भव्य प्रतिमा का अनावरण किया. इस कार्यक्रम के जरिए कांग्रेस ने अवध के इलाके में एक बहुत बड़ा पासी (दलित) विमर्श और नैरेटिव खड़ा करने की कोशिश की है.

मुसलमानों के बाद अब दलितों पर कांग्रेस की नजर

दरअसल, उत्तर प्रदेश में अपनी खोई हुई जमीन तलाश रही कांग्रेस पार्टी अब बेहद सधी हुई चालें चल रही है. पार्टी को लगता है कि हालिया घटनाक्रमों के बाद उत्तर प्रदेश का एक बड़ा मुस्लिम वर्ग उनके पाले में आ चुका है. अब उनका पूरा फोकस दलित वोट बैंक को अपनी तरफ आकर्षित करने पर है.कांग्रेस रणनीतिकारों को अच्छी तरह मालूम है कि दलितों का सबसे बड़ा आधार आज भी मायावती के पास सुरक्षित है. ऐसे में मायावती भले ही उनसे न मिलें लेकिन उनके दरवाजे पर जाकर अपनी तस्वीरें वायरल करने और प्रेस में यह बात फैलाने से दलितों के बीच यह संदेश जाता है कि कांग्रेस उनके नेताओं का कितना सम्मान करती है. राहुल गांधी के हीरा पासी कार्यक्रम से ठीक पहले इस तरह की चर्चा छेड़ना कांग्रेस की एक सोची-समझी रणनीति का हिस्सा माना जा रहा है.

3. इंडिया अलायंस में शह-मात का खेल

इस पूरी सियासी तस्वीर का तीसरा और सबसे दिलचस्प कोना समाजवादी पार्टी (सपा) से जुड़ा हुआ है. इस घटनाक्रम से ठीक एक दिन पहले समाजवादी पार्टी के मुखिया अखिलेश यादव ने एक सार्वजनिक मंच से ऐलान किया था कि साल 2027 के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में कांग्रेस और सपा का गठबंधन अटूट रहेगा और दोनों दल मिलकर चुनाव लड़ेंगे. लेकिन अखिलेश के इस बड़े दावे के अगले ही दिन कांग्रेस नेताओं का मायावती के घर पहुंच जाना और समानांतर रूप से दलित एजेंडे पर आक्रामक रूप से काम करना, सपा के लिए भी एक बड़ा राजनीतिक संकेत है.

गठबंधन के बावजूद अपनी जमीन मजबूत करने में जुटी कांग्रेस

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि कांग्रेस इस कदम के जरिए समाजवादी पार्टी को यह साफ संदेश देना चाहती है कि वह उत्तर प्रदेश में सपा को 'टेकन फॉर ग्रांटेड' (कमतर) न समझे. बेशक लोकसभा चुनाव में इंडिया अलायंस के तहत दोनों दल साथ थे लेकिन कांग्रेस यूपी में खुद को नंबर दो की भूमिका तक सीमित नहीं रखना चाहती. वह दलितों, पिछड़ों और अल्पसंख्यकों के बीच अपना स्वतंत्र आधार तैयार कर रही है. हालांकि इस पूरे मामले पर कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष ने इसे नेताओं की व्यक्तिगत कोशिश बताकर पल्ला झाड़ लिया है और खुद मायावती या बसपा की तरफ से इस पर कोई सीधी प्रतिक्रिया नहीं आई है. लेकिन बसपा ने समाजवादी पार्टी पर अपना हमला जारी रखा है. कुल मिलाकर, मायावती से मुलाकात की यह असफल कोशिश भी कांग्रेस के लिए एक बड़ा सियासी नैरेटिव सेट करने में पूरी तरह कामयाब रही है.