क्या बीजेपी से माधवगढ़ की सीट वापस ले पाएगी बसपा? जानिए जालौन की इस सीट का पूरा सियासी गणित

रजत सिंह

23 Sep 2026 (अपडेटेड: 23 Sep 2026, 12:49 PM)

UP Kiska: जालौन की माधवगढ़ सीट पर 2027 चुनाव से पहले बीजेपी और सपा के बीच सियासी मुकाबला चर्चा में है. बीजेपी लगातार तीसरी जीत की तैयारी में है. जबकि सपा 2024 की बढ़त, पीडीए समीकरण और स्थानीय मुद्दों के सहारे चुनौती पेश कर रही है.

CM Yogi and Mayawati

CM Yogi and Mayawati

Google CTA

बुंदेलखंड के जालौन जिले की माधवगढ़ विधानसभा सीट अपनी ऐतिहासिक पहचान और 'माधवगढ़ किले' के लिए काफी चर्चित रही है. कभी बहुजन समाज पार्टी  का मजबूत अजेय गढ़ मानी जाने वाली यह सीट पिछले दो चुनावों से भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) के पास है. 2017 और 2022 में बीजेपी के मूलचंद निरंजन यहां से लगातार दो बार विधायक चुने गए. लेकिन अब सवाल यह उठ रहा है कि क्या 2027 के विधानसभा चुनाव में बीजेपी यहां जीत की हैट्रिक लगा पाएगी या फिर समाजवादी पार्टी (सपा) का नया राजनीतिक समीकरण यहां बाजी पलट देगा? 'यूपी किसका' में आज बात जालौन की इसी बेहद दिलचस्प माधवगढ़ सीट के सियासी इतिहास और भावी समीकरणों की.

यह भी पढ़ें...

बसपा का अजेय किला कैसे बना बीजेपी का गढ़?

माधवगढ़ विधानसभा का इतिहास देखें तो यहां लंबे समय तक बसपा का दबदबा रहा है.

बसपा की लगातार तीन जीत: 2002 में बृजेंद्र प्रताप सिंह, 2007 में हरि ओम उपाध्याय और 2012 में संत राम कुशवाहा ने बसपा के टिकट पर यहां से जीत दर्ज की. इस जीत का मुख्य आधार दलित और अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) का मजबूत गठजोड़ था.

बीजेपी की एंट्री: 2017 की प्रचंड लहर में बीजेपी के मूलचंद निरंजन ने यह किला बसपा से छीन लिया और 2022 में दोबारा चुनाव जीतकर अपनी पकड़ मजबूत की.

बीजेपी का दावा

मौजूदा बीजेपी विधायक मूलचंद निरंजन का मानना है कि क्षेत्र में हुआ विकास कार्य ही उनकी जीत का सबसे बड़ा आधार है.

"माननीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के मार्गदर्शन और मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के नेतृत्व में बीते 9 वर्षों में माधवगढ़ में चौमुखी विकास हुआ है. मुख्य मार्ग, ग्रामीण संपर्क मार्ग, किसानों के लिए सिंचाई की सुविधा, शिक्षा के क्षेत्र में नए विद्यालय और नदियों-नालों पर बने पुल इसके प्रमाण हैं. 'सबका साथ-सबका विकास' के मूलमंत्र पर काम हुआ है और 2027 में बीजेपी यहां 2017 व 2022 से भी अधिक मतों से जीतेगी.'

सपा की नई उम्मीद

माधवगढ़ सीट हमेशा से समाजवादी पार्टी के लिए चुनौतीपूर्ण रही है और सपा यहां अक्सर तीसरे नंबर पर ही सिमटती आई थी. लेकिन हालिया दौर में स्थिति बदलती दिख रही है.

सपा का जमीनी काम: सपा नेताओं का कहना है कि 2022 के बाद से पार्टी ने बूथ और जमीनी स्तर पर लगातार काम किया है.

2024 का टर्निंग प्वाइंट: 2024 के लोकसभा चुनाव में सपा ने पहली बार इस विधानसभा क्षेत्र में बढ़त बनाई और 1,10,000 (1.10 लाख) से अधिक वोट हासिल किए. कार्यकर्ताओं में इसी बढ़त के बूते 2027 में सीट जीतने का उत्साह है.

जातीय समीकरण: माधवगढ़ का वोट बैंक गणित

माधवगढ़ सीट पर जातीय समीकरण ही जीत-हार का मुख्य दायरा तय करते हैं.

दलित मतदाता: लगभग 1,20,000 (सबसे बड़ा वोट बैंक)

कुशवाहा समुदाय: लगभग 70,000

अन्य ओबीसी व सवर्ण वोट: क्षत्रिय (35,000)

ब्राह्मण (35,000)

मुस्लिम (35,000)

राठौर (30,000)

कोरी (25,000)

कुर्मी (14,000)

यादव (10,000)

अन्य जातियां (56,000)

बीजेपी के लिए गैर-यादव ओबीसी (विशेषकर कुशवाहा), सवर्ण और गैर-जाटव दलित वोट बैंक का मेल जीत की कुंजी साबित होता रहा है.

स्थानीय विश्लेषकों का आकलन: चुनौतियां और संभावित खतरे

स्थानीय पत्रकारों और सियासी विश्लेषकों का मानना है कि 2027 का चुनाव काफी कड़ा होने वाला है.

एंटी-इन्कंबेंसी और प्रत्याशी परिवर्तन: स्थानीय स्तर पर नाराजगी को दूर करने के लिए बीजेपी को चेहरे में बदलाव करने की जरूरत पड़ सकती है. अगर एंटी-इन्कंबेंसी को साधने के लिए टिकट में बदलाव नहीं हुआ तो बीजेपी को नुकसान हो सकता है.

सपा के लिए AIMIM का खतरा: एआईएमआईएम (AIMIM) जैसी पार्टियां भले ही चुनाव न जीतें. लेकिन वे मुस्लिम वोटों में सेंधमारी कर सपा-कांग्रेस गठबंधन के वोट बैंक को नुकसान पहुंचा सकती हैं.

योगी आदित्यनाथ का प्रभाव: उत्तर प्रदेश में अभी भी मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के चेहरे का बड़ा प्रभाव है जो बीजेपी के पक्ष में माहौल बनाने में अहम भूमिका निभाता है.

देखना दिलचस्प होगा कि क्या 2027 में बीजेपी अपने विकास के दावों के साथ इस सीट पर अपना कब्ज़ा बरकरार रख पाती है या फिर सपा का 'पीडीए' (पिछड़ा, दलित, अल्पसंख्यक) का प्रयोग माधवगढ़ के सियासी किले को फतह कर पाता है.
 

ये भी पढ़ें: शिवपाल यादव के खिलाफ किसे टिकट देगी बीजेपी? जानिए जसवंतनगर विधानसभा सीट का पूरा सियासी समीकरण