शिवपाल यादव के खिलाफ किसे टिकट देगी बीजेपी? जानिए जसवंतनगर विधानसभा सीट का पूरा सियासी समीकरण

रजत सिंह

• 12:15 PM • 23 Sep 2026

इटावा की जसवंतनगर सीट पर 2027 चुनाव से पहले सियासी हलचल तेज है. शिवपाल यादव की बहू के संभावित चुनाव लड़ने की चर्चा के बीच बीजेपी के संभावित दांव और शाक्य-यादव समीकरण ने मुकाबले को चर्चा में ला दिया है.

Shivpal and CM yogi

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समाजवादियों का 'अभेद्य किला' कही जाने वाली इटावा की जसवंतनगर विधानसभा सीट एक बार फिर उत्तर प्रदेश की सियासत में हलचल का केंद्र बनी हुई है. 1967 में नेताजी मुलायम सिंह यादव की पहली जीत से लेकर लगातार छह बार से विधायक रहे उनके छोटे भाई शिवपाल सिंह यादव तक इस सीट पर दशकों से सैफई परिवार का एकछत्र राज रहा है. लेकिन 2027 के विधानसभा चुनाव को लेकर जसवंतनगर के सियासी गलियारों में एक नया सवाल तैर रहा है, क्या इस बार शिवपाल सिंह यादव अपनी यह पारंपरिक सीट अपनी पुत्रवधू (बहू) को सौंपेंगे? और वहीं दूसरी तरफ इस सीट पर आज तक खाता भी न खोल पाने वाली भारतीय जनता पार्टी क्या इस बार करहल की तर्ज पर कोई भारी-भरकम दांव खेलने की तैयारी में है?

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1967 से अजेय: सैफई परिवार का पैतृक गढ़

जसवंतनगर का इतिहास सोशलिस्टों और समाजवादियों के दबदबे की कहानी कहता है. 1952 के बाद से केवल दो मौकों को छोड़कर इस सीट पर हमेशा समाजवादियों का ही कब्जा रहा है. 1967 में पहली बार मुलायम सिंह यादव यहां से विधायक चुने गए थे. उनके बाद शिवपाल सिंह यादव ने इस सीट की कमान संभाली और लगातार 6 बार जीत दर्ज कर इसे अपनी अजेय कर्मभूमि बना लिया.

परिवार की एकता और बढ़ता वर्चस्व

मैनपुरी लोकसभा उपचुनाव में डिंपल यादव की ऐतिहासिक जीत ने पूरे यादव परिवार को एक मंच पर ला दिया. शिवपाल ने अपनी पार्टी प्रसपा का समाजवादी पार्टी में विलय कर दिया और हाल ही में अखिलेश यादव को लोहिया ट्रस्ट का अध्यक्ष भी बनाया. 2024 के लोकसभा चुनाव में शिवपाल के बेटे आदित्य यादव (अंकुर) बदायूं से सांसद बन चुके हैं जिससे पार्टी और परिवार में शिवपाल सिंह यादव का सियासी वर्चस्व और कद और अधिक मजबूत हो चुका है.

2027 का नया मोड़: क्या बहू की होगी एंट्री?

जसवंतनगर के राजनीतिक हलकों में इस बात की सबसे तेज चर्चा है कि 2027 में प्रत्याशी कौन होगा. चर्चा है कि शिवपाल सिंह यादव अपनी बहू का राजनीतिक करियर शुरू कराने के लिए जसवंतनगर सीट उन्हें सौंप सकते हैं. स्थानीय विश्लेषकों का मानना है कि सुरक्षित मानी जाने वाली इस सीट पर परिवार के किसी सदस्य को लड़ाकर, खुद शिवपाल सिंह यादव 2027 में सपा के पक्ष में माहौल बनाने के लिए पूर्वांचल की किसी कठिन सीट से चुनावी मैदान में उतर सकते हैं. चूंकि शिवपाल यादव खुद सपा के राष्ट्रीय महासचिव हैं और सीट पर उनका निजी प्रभाव है इसलिए अंतिम मोहर उन्हीं के फैसले पर लगेगी.

एकतरफा मुकाबला

राजनीतिक जानकारों का मानना है कि जसवंतनगर में मुख्य प्रतिद्वंद्विता की बात करना ही बेमानी है. यहां यादव समुदाय की सबसे बड़ी आबादी है जो पारंपरिक रूप से सपा के साथ एकजुट रहती है. स्थानीय स्तर पर विपक्षी दल यहाँ मुकाबला देने लायक उस कद या तैयारी का प्रत्याशी मैदान में नहीं उतार पाते. जानकारों का कहना है कि यहां लड़ाई 19 और 20 के बीच नहीं बल्कि 20 और शून्य जैसी रहती है.

क्या करहल जैसा दांव खेलेगी भाजपा?

जसवंतनगर की सीट पर कांग्रेस भले ही अतीत में दो बार जीत चुकी हो लेकिन बीजेपी यहां आज तक खाता भी नहीं खोल पाई है.

जातीय समीकरण (यादव + शाक्य): जसवंतनगर में यादवों के बाद सबसे अधिक आबादी शाक्य बिरादरी की है. बीजेपी हमेशा यहां गैर-यादव ओबीसी गोलबंदी के तहत शाक्य कार्ड खेलती आई है.

बीजेपी के संभावित दावेदार

विवेक शाक्य: पिछले चुनाव के बीजेपी प्रत्याशी.

मुकेश यादव / अजय यादव बिंदु / पर्वत सिंह यादव: पार्टी के भीतर चर्चित यादव चेहरे.

शरद तिवारी: ब्राह्मण चेहरे के रूप में टिकट की दावेदारी कर रहे हैं.

क्या होगा सरप्राइज दांव? जिस तरह बीजेपी ने करहल में अखिलेश यादव के खिलाफ अपने मंत्रियों या रिश्तेदारों को उतारकर भारी दबाव बनाया था, क्या वैसा ही कोई 'हैवीवेट' दांव जसवंतनगर में भी देखने को मिलेगा? यह सवाल अभी बना हुआ है.

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