Mood kya hai Farrukhabad: उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव 2027 को लेकर राजनीतिक बिसात बिछनी शुरू हो चुकी है. साल 2022 के चुनाव में फर्रुखाबाद जिले की चारों विधानसभा सीटों (फर्रुखाबाद सदर, भोजपुर, अमृतपुर और कायमगंज सुरक्षित) पर भारतीय जनता पार्टी और उसकी सहयोगी पार्टी अपना दल (एस) ने कब्जा जमाया था. हालांकि 2027 के महासमर से पहले जिले के सियासी समीकरण तेजी से बदलते नजर आ रहे हैं.
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स्थानीय पत्रकारों और राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार, जिले में करीब 10 साल से सत्ता में रहने के बावजूद विधायकों के प्रति जनता में भारी 'एंटी-इनकंबेंसी' (सत्ता विरोधी लहर) का माहौल बन रहा है. बाढ़ की गंभीर समस्या, जर्जर पुल, आलू किसानों की उपेक्षा, स्वास्थ्य सेवाओं का बदहाल ढांचा और युवाओं में बेरोजगारी-पेपर लीक को लेकर नाराजगी 2027 के चुनाव में भाजपा की राह कठिन बना सकती है.
विधायकों से दूरी और 10 साल की एंटी-इनकंबेंसी का खतरा
फर्रुखाबाद की चारों सीटों पर वर्तमान में भाजपा और उसके सहयोगी दल का कब्जा है. विश्लेषकों का मानना है कि जिले के वर्तमान जनप्रतिनिधि अपने व्यक्तिगत काम या जनता से कनेक्टिविटी के बजाय मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के चेहरे के सहारे चुनाव जीतते आए हैं.
जनता से कनेक्टिविटी का अभाव: विधायकों की धरातल पर मौजूदगी कम रहने और स्थानीय मुद्दों पर चुप्पी साधने से कार्यकर्ताओं और आम जनता दोनों में असंतोष है. यदि भाजपा 2027 में अपने उम्मीदवार नहीं बदलती है, तो उसे कुछ सीटों पर बड़ा नुकसान झेलना पड़ सकता है.
विकास के मोर्चे पर खड़े सवाल
जिले में बुनियादी सुविधाओं और विकास कार्यों को लेकर जनता के बीच गहरा आक्रोश देखा जा रहा है. अमृतपुर विधानसभा क्षेत्र हर साल गंगा की भीषण बाढ़ से झुलसता है. वर्षों से तटबंध (बंधा) बनाने की मांग की जा रही है. लेकिन वर्तमान विधायक और शासन स्तर से इस पर अब तक ठोस अमल नहीं हो सका. फर्रुखाबाद को अन्य जिलों से जोड़ने वाला गंगा जी का पुल करीब 30-32 साल पुराना और बेहद जर्जर हो चुका है जिससे आए दिन यातायात ठप रहता है. इसके अलावा मुख्य गंगा एक्सप्रेसवे के फर्रुखाबाद से न गुजरने को लेकर भी स्थानीय लोगों में कसक है.
स्वास्थ्य सेवाओं का बुरा हाल: डॉ. राम मनोहर लोहिया अस्पताल, जिसे बेहतर इलाज के लिए बनाया गया था, आज महज एक 'रेफर सेंटर' बनकर रह गया है. डॉक्टरों व स्टाफ की कमी के कारण गर्भवती महिलाओं और गंभीर मरीजों को मजबूरी में बाहर जाना पड़ता है.
आलू किसान, उद्योग और युवाओं में बेरोजगारी को लेकर गुस्सा
फर्रुखाबाद में बड़े पैमाने पर आलू की खेती होती है. सातनपुर मंडी में आलू किसानों को समर्थन मूल्य न मिलने से वे लगातार आंदोलित हैं. सरकार द्वारा आलू संरक्षण या प्रसंस्करण के लिए कोई बड़ा उद्योग न लगाने से किसान खुद को ठगा महसूस कर रहे हैं. क्षेत्र के पारंपरिक जरदोजी उद्योग के दम तोड़ने और कोई नया औद्योगिक प्रोजेक्ट न आने के कारण युवाओं को नौकरी के लिए दिल्ली-मुंबई जैसे शहरों की ओर पलायन करना पड़ रहा है.
पेपर लीक और युवाओं की नाराजगी: भर्ती परीक्षाओं के पेपर लीक और बढ़ती महंगाई ने 18 से 35 वर्ष के युवा मतदाताओं को सोचने पर मजबूर किया है जो इस बार जातीय सीमाओं से ऊपर उठकर वोट कर सकते हैं.
2027 का जातीय समीकरण और अखिलेश-राहुल गठबंधन का दांव
फर्रुखाबाद में हार-जीत का अंतिम फैसला जातीय समीकरणों और सही प्रत्याशी के चयन पर निर्भर करेगा.
फर्रुखाबाद सदर सीट: यह पारंपरिक रूप से ब्राह्मण बहुल सीट मानी जाती है. यदि समाजवादी पार्टी या इंडिया गठबंधन यहां से किसी मजबूत ब्राह्मण चेहरे को उतारता है, तो भाजपा के लिए मुकाबला कड़ा हो जाएगा.
भोजपुर सीट: यहां लोध, मुस्लिम और ठाकुर मतदाताओं की संख्या अधिक है. इन जातियों के गठजोड़ और प्रत्याशी के चेहरे पर ही चुनाव का रुख तय होगा.
विपक्ष की रणनीति: यदि सपा और कांग्रेस का गठबंधन सही प्रत्याशी का चयन करता है और आलू किसानों व युवाओं के मुद्दों को सही ढंग से उठाता है तो वे भाजपा के इस गढ़ में सेंध लगा सकते हैं. वहीं अगर विपक्षी खेमे से टिकट वितरण में गड़बड़ी होती है (जैसे पूर्व में लुईस खुर्शीद या गलत प्रत्याशी का प्रयोग) तो इसका सीधा फायदा भाजपा को मिल सकता है.
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