Mishrikh Election 2027: उत्तर प्रदेश की राजनीति में कुछ विधानसभा सीटें सिर्फ हार-जीत का आंकड़ा भर नहीं होतीं हैं. वे धार्मिक आस्था और राजनीतिक साख का बड़ा मैदान बन जाती हैं. ऐसी ही एक बेहद खास सीट है सीतापुर जिले की मिश्रिख (सुरक्षित) विधानसभा सीट. एक तरफ विश्व प्रसिद्ध पौराणिक तीर्थ नगरी नैमिषारण्य और दूसरी तरफ बहुसंख्यक दलित वोट बैंक के बीच यहां पिछले एक दशक से दो दिग्गजों बीजेपी के वर्तमान विधायक रामकृष्ण और सपा के पूर्व विधायक रामपाल राजवंशी के बीच सीधा मुकाबला देखने को मिल रहा है. 2027 के चुनाव में क्या बीजेपी यहां जीत की हैट्रिक लगाएगी या सपा एक दशक बाद वापसी करेगी? आइए समझते हैं मिश्रिख का पूरा सियासी ताना-बाना.
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2008 के परिसीमन के बाद बदला स्वरूप
मिश्रिख सीट का मौजूदा स्वरूप 2008 के परिसीमन के बाद अस्तित्व में आया. इससे पहले इसका बड़ा हिस्सा मछरेटा सीट का हिस्सा था. 2012 में जब यहां पहली बार नए स्वरूप में चुनाव हुआ तो सपा के रामपाल राजवंशी ने परचम लहराया. हालांकि 2017 की मोदी लहर में बीजेपी के रामकृष्ण ने यह सीट सपा से छीन ली और 2022 में दोबारा अपनी जीत बरकरार रखी.
नैमिषारण्य का विकास बनाम स्थानीय नाराजगी
अयोध्या और काशी की तर्ज पर योगी सरकार नैमिषारण्य को एक बड़े धार्मिक टूरिज्म हब के रूप में विकसित कर रही है. नैमिष कॉरिडोर, सड़कों का चौड़ीकरण, पुलों का निर्माण और हेलीपैड जैसी परियोजनाएं बीजेपी के लिए विकास का सबसे बड़ा चेहरा हैं. हालांकि स्थानीय स्तर पर कॉरिडोर निर्माण के दौरान हुई तोड़फोड़, किसानों के लिए खाद-बीज की किल्लत और जनप्रतिनिधि के परिवार को लेकर उठ रही नाराजगी विपक्ष के लिए बड़ा हथियार बनी हुई है.
नेताओं के दावे
बीजेपी विधायक रामकृष्ण का का कहना है कि 'हम विधायक बनकर नहीं, जनता के सेवक के रूप में काम करते हैं. नैमिष क्षेत्र में सड़कों और पुलों का जाल बिछाया गया है. बिजली के लिए नया पावर हाउस और गोमती नदी पर परेठी पुल की स्वीकृति काम का सबूत है. जनता काम करने वाले और मोदी-योगी के नेतृत्व पर भरोसा जताते हुए फिर से बीजेपी को जिताएगी.'
सपा के पूर्व विधायक रामपाल राजवंशी का पलटवार
रामपाल राजवंशी का कहना है कि 'भारतीय जनता पार्टी की कथनी और करनी में जमीन-आसमान का फर्क है. किसान खाद-बीज के लिए परेशान हैं. हमने हर पोलिंग बूथ पर '1 बूथ 12 यूथ' की टीम खड़ी कर दी है. जनता बीजेपी की झूठ-फरेब की राजनीति से ऊब चुकी है और 2027 में अखिलेश यादव के नेतृत्व में सपा की वापसी तय है.'
पासी और जाटव तय करते हैं हार-जीत
मिश्रिख एक आरक्षित (SC) सीट है, जहां जीत की चाबी पासी और जाटव मतदाताओं के हाथ में होती है. हालांकि, सवर्ण और पिछड़ा वर्ग भी निर्णायक भूमिका निभाते हैं.
पासी: लगभग 65,000
जाटव: लगभग 60,000
ब्राह्मण: लगभग 35,000
कुर्मी: लगभग 20,000
ठाकुर, मुस्लिम और यादव: लगभग 15,000-15,000 (प्रत्येक)
अन्य अन्य पिछड़ा वर्ग (तेली, कश्यप, नाई आदि): लगभग 40,000
गठबंधन का गणित और निष्पक्ष विश्लेषण
स्थानीय पत्रकारों और राजनीतिक विशेषज्ञों के अनुसार, मिश्रिख में 2027 की लड़ाई काफी दिलचस्प होने वाली है. सपा और कांग्रेस के गठबंधन की स्थिति, बीएसपी का उम्मीदवार और छोटे दलों का वोट काटना चुनावी नतीजों पर गहरा असर डालेगा. अगर मुकाबला सीधा बीजेपी बनाम सपा होता है तो कोर वोट बैंक के साथ-साथ गैर-यादव ओबीसी और सवर्ण वोटों को साधने वाला दल ही बाजी मारेगा.
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