Mood kya hai Varanasi: वाराणसी में सभी आठ सीटों पर कैसी है बीजेपी की स्थिति, पत्रकारों ने बता दिया

रोशन जायसवाल

• 06:37 PM • 10 Aug 2026

वाराणसी में 2027 विधानसभा चुनाव से पहले बीजेपी के सामने स्थानीय विधायकों की नाराजगी और टिकट बदलाव की चुनौती है. सपा नए सामाजिक समीकरणों के साथ सेंध लगाने की तैयारी में है. जमीनी मुद्दे और पीएम मोदी का प्रभाव चुनावी दिशा तय करेंगे.

Mood Kya hai Varanasi

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Mood kya hai Varanasi: उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव 2027 को लेकर राजनीतिक सुगबुगाहट तेज हो चुकी है. इसी सिलसिले में यूपी Tak के खास कार्यक्रम 'मूड क्या है' में वाराणसी की आठों विधानसभा सीटों के सियासी मिजाज पर वरिष्ठ पत्रकारों के साथ सीधी चर्चा हुई. वाराणसी पिछले दो चुनावों (2017 और 2022) से भारतीय जनता पार्टी का मजबूत किला रहा है और यहां क्लीन स्वीप जैसी स्थिति रही है. हालांकि 2027 के महामुकाबले से पहले स्थानीय विधायकों के प्रति जनता और कार्यकर्ताओं में नाराजगी, सपा का नया सोशल इंजीनियरिंग प्रयोग और जमीनी मुद्दों बनाम पॉलिटिकल नैरेटिव को लेकर नई बहस छिड़ गई है.

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स्थानीय विधायकों के खिलाफ नाराजगी और टिकट बदलने का दबाव

वरिष्ठ पत्रकारों का मानना है कि वाराणसी में जो भी बड़े विकास कार्य (जैसे काशी विश्वनाथ कॉरिडोर, ओवरब्रिज, सड़कें) हुए हैं उनका सीधा श्रेय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और केंद्र/राज्य सरकार को जाता है. स्थानीय विधायकों की रिपोर्ट कार्ड और जनता से संवाद बेहद कमजोर माना जा रहा है. पत्रकारों के अनुसार अगर बीजेपी ने अपने वर्तमान विधायकों के टिकट नहीं बदले तो आठ में से कम से कम 3-4 सीटों पर पार्टी को भारी नुकसान उठाना पड़ सकता है.

सपा का नया दांव

चर्चा में यह बात सामने आई कि समाजवादी पार्टी इस बार वाराणसी की 8 सीटों पर अपने पारंपरिक यादव और मुस्लिम (M-Y) समीकरण से हटकर अन्य वर्गों के चेहरों को मौका देने की रणनीति बना रही है. लोकसभा चुनाव में मिले सकारात्मक नतीजों के बाद अखिलेश यादव गैर-ट्रेडिशनल समुदायों (जैसे ब्राह्मण, पटेल, अन्य पिछड़े वर्ग) के प्रत्याशियों को आगे कर बीजेपी के कैडर वोट बैंक में सेंध लगाने की तैयारी में हैं.

जमीनी मुद्दे बनाम पॉलिटिकल नैरेटिव

वरिष्ठ पत्रकार अमित सिंह के अनुसार, अगर 2027 का चुनाव शिक्षा, स्वास्थ्य (सरकारी अस्पतालों की स्थिति), स्थानीय रोजगार और सड़कों की बार-बार खुदाई जैसी जमीनी समस्याओं पर लड़ा गया तो बीजेपी के लिए चुनौती कठिन होगी. हालांकि सत्तारूढ़ दल हमेशा चुनाव को बड़े केंद्रीय चेहरों, राष्ट्रीय मुद्दों या अपने सेट किए गए नैरेटिव पर ले जाने में माहिर रहा है. विपक्ष की सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि वह स्थानीय मुद्दों को कितना उभार पाता है.

बीजेपी का संगठनात्मक ढांचा और बुनियादी पकड़

दूसरी तरफ पत्रकारों ने यह भी स्वीकार किया कि वाराणसी शुरुआत से ही बीजेपी का मजबूत गढ़ रहा है. पन्ना प्रमुख स्तर तक पार्टी की बेहद मजबूत माइक्रो-मैनेजमेंट संरचना है. भले ही स्थानीय जनप्रतिनिधियों के प्रति असंतोष हो लेकिन पीएम मोदी का प्रभाव और वाराणसी में हुए हजारों करोड़ के इंफ्रास्ट्रक्चर डेवलपमेंट का असर बीजेपी को बड़ी मजबूती प्रदान करता है.