पश्चिमी यूपी की थानाभवन सीट पर क्या फिर फंस जाएगी बीजेपी? समझिए पूरा समीकरण

रजत सिंह

• 01:59 PM • 29 Sep 2026

UP Kiska: शामली की थानाभवन विधानसभा सीट पर 2027 चुनाव से पहले सियासी हलचल तेज है. पूर्व मंत्री सुरेश राणा का गढ़ रही इस सीट पर बीजेपी-आरएलडी गठबंधन और सपा के बीच मुकाबला, जातीय समीकरण, गन्ना भुगतान और स्थानीय मुद्दे अहम बन गए हैं.

Akhilesh and Jayant

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पश्चिमी उत्तर प्रदेश के गन्ना बेल्ट में स्थित शामली जिले की थाना भवन विधानसभा सीट राज्य की सबसे चर्चित और सियासी रूप से संवेदनशील सीटों में से एक है. कहने को तो यह सीट वीआईपी श्रेणी में दर्ज नहीं है. लेकिन पूर्व गन्ना विकास मंत्री सुरेश कुमार राणा का राजनीतिक गढ़ होने और लगातार बदलते चुनावी समीकरणों के चलते 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले यहां की राजनीति गरमा गई है.

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2012 और 2017 में बीजेपी के परचम से लेकर 2022 में सपा-आरएलडी गठबंधन की जीत और फिर 2024 के लोकसभा चुनाव में सपा की मामूली बढ़त तक थाना भवन सीट ने कई सियासी रंग देखे हैं. अब जब आरएलडी और बीजेपी एक साथ (NDA) हैं तो 2027 का मुकाबला बेहद दिलचस्प मोड़ पर आ खड़ा हुआ है.

जब 265 वोटों से पलटी थी बाजी

थानाभवन सीट का इतिहास रहा है कि यहां किसी एक दल का स्थायी दबदबा नहीं रहा. कांग्रेस, जनता पार्टी, लोकदल, सपा, आरएलडी और बीजेपी सभी को यहां की जनता ने मौका दिया है.

2022 में मंत्री रहे सुरेश राणा को हार का सामना करना पड़ा था. लेकिन 2024 के लोकसभा चुनाव में थाना भवन विधानसभा क्षेत्र के भीतर सपा को मात्र 627 वोटों की बढ़त मिली. इससे साफ है कि 2027 में मुकाबला बेहद नजदीकी होने वाला है.

थानाभवन का जातीय समीकरण

थाना भवन सीट पर जीत-हार की कुंजी सामाजिक और जातीय लामबंदी के हाथ में होती है.

मुस्लिम: 98,000 से 1,00,000

अनुसूचित जाति (दलित): 60,000

जाट: 40,000 से 50,000

सैनी: 35,000

ठाकुर: 21,000

कश्यप: 20,000

ब्राह्मण: 14,000

वैश्य: 8,000

अन्य: 20,000 से 25,000

बीजेपी का दांव

बीजेपी नेताओं और पूर्व मंत्री सुरेश कुमार राणा का दावा है कि डबल इंजन सरकार ने थाना भवन में ऐतिहासिक विकास कार्य किए हैं.

इंफ्रास्ट्रक्चर विकास: 5 राजकीय इंटर कॉलेज, 3 डिग्री कॉलेज, 3 आईटीआई और अंतरराष्ट्रीय स्तर का खेल स्टेडियम.

बिजली और स्वास्थ्य: ₹1,000 करोड़ की लागत से 400 KVA का बिजली घर, मेडिकल कॉलेज और बड़ा सरकारी अस्पताल.

सड़क कनेक्टिविटी: शामली जिले में 6 नए नेशनल हाईवे का निर्माण.

एनडीए की ताकत: इस बार आरएलडी के साथ गठबंधन होने से जाट और अन्य बिरादरियों का समर्थन मिलने का दावा किया जा रहा है जिससे बीजेपी शामली की तीनों सीटों पर जीत का दावा ठोक रही है.

सपा और विपक्ष के मुद्दे

दूसरी ओर समाजवादी पार्टी और स्थानीय विपक्षी नेताओं का तर्क है कि धरातल पर मुद्दे अभी भी जस के तस हैं.

गन्ना बकाया भुगतान: विपक्ष का आरोप है कि पूर्व गन्ना मंत्री के क्षेत्र में ही किसान गन्ने के बकाए मूल्य भुगतान के लिए धरने पर बैठने को मजबूर रहे हैं और स्थानीय मिलों की स्थिति दयनीय रही है.

अग्निवीर योजना से युवाओं में निराशा: सेना भर्ती की तैयारी करने वाले स्थानीय युवाओं में अग्निवीर योजना को लेकर नाराजगी को सपा बड़ा चुनावी मुद्दा बना रही है.

अधूरे प्रोजेक्ट्स: बाईपास का निर्माण कार्य सालों से अटकने और राजकीय कॉलेजों में शिक्षकों की कमी का मुद्दा भी प्रमुखता से उठाया जा रहा है.

मुस्लिम-जाट समीकरण: सपा का मानना है कि चौधरी चरण सिंह के पारंपरिक मुस्लिम-जाट और किसान समीकरण के बल पर वे 2024 की बढ़त को 2027 में बड़ी जीत में बदलेंगे.

किसका पलड़ा भारी?

स्थानीय राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि 2027 का चुनाव टिकट वितरण और गठबंधनों के जमीनी ट्रांसफर पर निर्भर करेगा.

टिकट का चयन: क्या एनडीए से सुरेश राणा दोबारा मैदान में उतरेंगे या यह सीट आरएलडी के खाते में जाएगी?

वोटों का ध्रुवीकरण: आरएलडी के बीजेपी के साथ आने से जाट वोट बैंक किस हद तक एनडीए के पक्ष में गोलबंद होता है यह सबसे बड़ा निर्णायक कारक होगा.

सपा और बीएसपी की घेराबंदी: सपा मुस्लिम वोट बैंक को एकजुट रखते हुए किसान और दलित वर्ग में सेंधमारी की कोशिश में है. वहीं बीएसपी का उम्मीदवार समीकरणों को बिगाड़ या बना सकता है.

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