UP Kiska: अयोध्या में इस सीट पर BJP या सपा किसका पलड़ा भारी जानिए पूरा गणित

Ayodhya Assembly Seat 2027: अयोध्या विधानसभा सीट पर 2027 चुनाव को लेकर सियासी घमासान तेज हो गया है. भाजपा जहां राम मंदिर और विकास के दम पर जीत का दावा कर रही है. वहीं सपा स्थानीय मुद्दों और एंटी-इनकंबेंसी को हथियार बनाकर मुकाबले को दिलचस्प बना रही है.

Ayodhya Assembly Seat 2027

सुषमा पांडेय

• 06:52 PM • 27 May 2026

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Ayodhya Assembly Seat 2027: आस्था की वैश्विक राजधानी और उत्तर प्रदेश की राजनीति का मुख्य केंद्र अयोध्या विधानसभा सीट पर इस समय पूरे देश की नजरें टिकी हुई हैं. वर्ष 2024 के लोकसभा चुनाव में फैजाबाद सीट पर समाजवादी पार्टी के अवधेश प्रसाद की ऐतिहासिक जीत के बाद यहां की सियासी फिजा पूरी तरह बदल चुकी है. अब सबसे बड़ा सवाल यह है कि साल 2027 के आगामी उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में क्या भारतीय जनता पार्टी इस प्रतिष्ठित सीट पर अपना दबदबा कायम रख पाएगी या समाजवादी पार्टी के तेजतर्रार नेता तेज नारायण पांडे उर्फ पवन पांडे फिर से सपा की साइकिल दौड़ाएंगे? एक तरफ जहां भाजपा अपने 'धर्म और विकास' के मॉडल पर भरोसा जता रही है. वहीं सपा स्थानीय जनता के विस्थापन, महंगाई और बेरोजगारी को मुद्दा बनाकर चुनावी मैदान में हुंकार भर रही है.

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तीन दशकों से बीजेपी का गढ़

अगर अयोध्या विधानसभा सीट के इतिहास और पॉलिटिकल ट्रेंड पर नजर डालें तो साल 1991 के राम मंदिर आंदोलन के बाद से यहां भारतीय जनता पार्टी का ही वर्चस्व रहा है. हालांकि, साल 2012 के चुनाव में समाजवादी पार्टी के तेज नारायण पांडे (पवन पांडे) ने यहां ऐतिहासिक जीत दर्ज की थी और अखिलेश सरकार में मंत्री बने थे. साल 2017 की मोदी लहर में बीजेपी ने प्रचंड वापसी की और सपा बहुत पीछे छूट गई. लेकिन 2022 के चुनाव में स्थितियां फिर बदलीं, मुकाबला बेहद कड़ा हो गया. बीजेपी के वेद प्रकाश गुप्ता चुनाव तो जीत गए. लेकिन सपा के पवन पांडे ने उन्हें कड़ी टक्कर दी और हार-जीत का अंतर घटकर 20,000 वोटों से भी कम (करीब 19,000 वोट) रह गया. वोटों का यही घटता अंतर भाजपा के लिए बड़े संकेत दे गया था.

बीजेपी और सपा का दावा

वर्तमान बीजेपी विधायक वेद प्रकाश गुप्ता 2027 में हैट्रिक लगाने को लेकर पूरी तरह आश्वस्त हैं. बीजेपी संगठन और सरकार के कामकाज पर भरोसा जताते हुए वेद प्रकाश गुप्ता ने कहा कि 'पिछली बार भी संगठन और अयोध्या के विकास कार्यों की बदौलत मैं विजयी हुआ था. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के नेतृत्व में अयोध्या में विकास की गंगा बह रही है. भव्य राम मंदिर के साथ-साथ यहां की स्थानीय जनता को बड़े पैमाने पर रोजगार मिला है. मुझे पूरा विश्वास है कि 2027 के चुनाव में हम अयोध्या विधानसभा सीट 60% से अधिक मतों के अंतर से जीतेंगे.'

दूसरी तरफ, समाजवादी पार्टी को लगता है कि जो चमत्कार 2024 के लोकसभा चुनाव में हुआ था, वही इतिहास 2027 में भी दोहराया जाएगा. सपा नेताओं का आरोप है कि कोरोना काल में ऑक्सीजन की कमी से लोग मरे और आज गैस सिलेंडरों के लिए लंबी लाइनें लगानी पड़ रही हैं. मध्यम वर्ग और गरीब पूरी तरह त्रस्त है। सपा का कहना है कि 'लोकसभा चुनाव में अयोध्या की जनता ने बीजेपी के अहंकार का जवाब दे दिया है. विकास के नाम पर गरीबों के आशियाने उजाड़ दिए गए, उनकी दुकानें ढहा दी गईं, करोड़ों के घोटाले पर घोटाले हो रहे हैं. आज स्थानीय जनता सड़क पर है और गुजरात से आए बड़े-बड़े उद्योगपति, अडानी-अंबानी के लोग यहां आकर होटलों पर राज कर रहे हैं. आम नागरिक को कुछ नहीं मिला. जनता इस तानाशाही का बदला 2027 में वोट की चोट से लेगी.'

क्या कहते हैं स्थानीय पत्रकार

अयोध्या के स्थानीय और वरिष्ठ पत्रकारों का मानना है कि इस सीट पर चुनाव हमेशा रोचक मोड़ पर रहता है. पत्रकारों के मुताबिक, चुनाव में पीडीए (PDA) या जातीय समीकरणों को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता, यह बहुत बड़ा फैक्टर है. लेकिन अयोध्या की सामाजिक संरचना ऐसी है कि यहां मतदाताओं में एक स्वाभाविक हिंदूवादी और रामलला के प्रति रुझान रहता है. लोकसभा चुनाव में भले ही बीजेपी की लीड कम रही हो, क्योंकि निर्माण कार्यों के दौरान लगी बंदिशों से लोग परेशान थे और कई लोगों ने रोष में मतदान नहीं किया, लेकिन वे एंटी-भाजपा नहीं थे. मतदान केंद्र तक जाते-जाते लोगों की भावनाएं राम मंदिर से जुड़ जाती हैं जिससे पहली बढ़त हमेशा भाजपा को मिलती है.'

हालांकि, पत्रकारों ने यह भी जोड़ा कि 2022 का चुनाव 2017 जैसी लहर में नहीं लड़ा गया था तभी सपा के पवन पांडे 1 लाख से अधिक वोट पाने में कामयाब रहे थे.अब लगातार तीसरी बार सत्ता में रहने के कारण उत्पन्न होने वाली 'एंटी-इनकंबेंसी' (सत्ता विरोधी लहर) और स्थानीय मुद्दों के चलते 2027 का यह संघर्ष बेहद कड़ा, रोचक और 'तलवार की धार से गुजरने जैसा' होने वाला है. उपचुनावों में भले ही सरकारी मशीनरी के दम पर परिणाम कुछ भी रहे हों. लेकिन 2027 की मुख्य लड़ाई ही यूपी की सियासत का असली नैरेटिव सेट करेगी.