यूपी में पंचायत चुनाव से पहले नया फॉर्मूला तय! सभी ग्राम प्रधान अब बनेंगे प्रशासक

संतोष शर्मा

26 May 2026 (अपडेटेड: 20 Jul 2026, 11:57 AM)

UP Panchayat Election: उत्तर प्रदेश की ग्रामीण राजनीति को लेकर मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने एक बड़ा फैसला लिया है. प्रदेश में ग्राम पंचायतों का मौजूदा कार्यकाल समाप्त होने के बाद अब गांवों की कमान किसी सरकारी अधिकारी के हाथ में सौंपने के बजाय पुराने प्रधानों को ही देने का निर्णय लिया गया है.

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उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ

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UP Panchayat Election News: उत्तर प्रदेश की ग्रामीण राजनीति को लेकर मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने एक बड़ा फैसला लिया है. प्रदेश में ग्राम पंचायतों का मौजूदा कार्यकाल समाप्त होने के बाद अब गांवों की कमान किसी सरकारी अधिकारी के हाथ में सौंपने के बजाय पुराने प्रधानों को ही देने का निर्णय लिया गया है. सरकार के नए आदेश के मुताबिक, अब सभी निवर्तमान ग्राम प्रधानों को अपनी-अपनी ग्राम पंचायतों का 'प्रशासक' नियुक्त किया जाएगा. यह नई व्यवस्था आगामी पंचायत चुनाव होने और नई पंचायतों के गठन तक या फिर अधिकतम छह महीने की अवधि के लिए प्रभावी रहेगी. गांव की सरकार और त्रिस्तरीय पंचायत चुनाव से ठीक पहले लिए गए इस फैसले ने उत्तर प्रदेश के ग्रामीण इलाकों में सियासी सरगर्मी को काफी तेज कर दिया है.

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डीएम करेंगे प्रशासकों की नियुक्ति

सरकारी दिशा-निर्देशों के अनुसार, जिलाधिकारियों (DM) को अपने-अपने जिलों में निवर्तमान प्रधानों को औपचारिक तौर पर प्रशासक नामित करने के लिए अधिकृत कर दिया गया है. हालांकि, प्रशासक बने इन प्रधानों के अधिकारों में सरकार ने कुछ कड़े प्रतिबंध भी लगाए हैं. ये प्रधान केवल रोजमर्रा के प्रशासनिक काम जैसे- गांव की सफाई, पेयजल आपूर्ति, स्ट्रीट लाइट की मरम्मत और सरकारी योजनाओं की सामान्य मॉनिटरिंग ही कर सकेंगे. इन्हें कोई भी नया नीतिगत या बड़ा वित्तीय निर्णय लेने का अधिकार नहीं होगा. यदि किसी गांव में कोई विशेष या आपातकालीन परिस्थिति पैदा होती है और बड़ा फैसला लेना अनिवार्य हो जाता है, तो प्रधान को इसका प्रस्ताव जिला पंचायत राज अधिकारी (DPRO) के माध्यम से जिलाधिकारी को भेजना होगा. डीएम की लिखित मंजूरी मिलने के बाद ही उस काम को आगे बढ़ाया जा सकेगा.

ओबीसी आरक्षण के लिए बना आयोग

प्रशासकों की नियुक्ति के साथ ही योगी सरकार ने पंचायत चुनाव से पहले सबसे संवेदनशील मुद्दे यानी पिछड़ा वर्ग (OBC) आरक्षण का सटीक फार्मूला तय करने के लिए एक नए समर्पित राज्य पिछड़ा वर्ग आयोग का भी गठन कर दिया है. इलाहाबाद हाई कोर्ट के सेवानिवृत्त जस्टिस राम औतार सिंह को इस पांच सदस्यीय आयोग की कमान सौंपी गई है. लखनऊ मुख्यालय वाले इस आयोग में जस्टिस राम औतार सिंह के अलावा रिटायर्ड अपर जिला जज बृजेश कुमार, रिटायर्ड अपर जिला जज संतोष कुमार विश्वकर्मा, रिटायर्ड आईएएस अधिकारी डॉ. अरविंद कुमार चौरसिया और रिटायर्ड आईएएस एसपी सिंह को बतौर सदस्य शामिल किया गया है. यह आयोग पंचायत स्तर पर ओबीसी समुदाय की सामाजिक, राजनीतिक और प्रशासनिक हिस्सेदारी का गहन अध्ययन और सर्वे करेगा, जिसके आधार पर ही चुनाव की सीटों का आरक्षण तय होगा.

जानिए क्यों पड़ी नए आयोग की जरूरत

राजनीतिक गलियारों में इस आयोग के गठन को काफी महत्वपूर्ण माना जा रहा है क्योंकि जस्टिस राम औतार सिंह इससे पहले वर्ष 2022-23 के निकाय चुनाव के दौरान भी ओबीसी आरक्षण विवाद को सुलझाने के लिए बने समर्पित आयोग के अध्यक्ष रह चुके हैं. सरकार ने इस नए आयोग को अपना काम पूरा करने के लिए पदभार ग्रहण करने की तारीख से केवल छह महीने का सीमित समय दिया है, जिससे साफ है कि सरकार चुनावों को ज्यादा टालना नहीं चाहती. दरअसल, उत्तर प्रदेश में पहले से मौजूद राज्य पिछड़ा वर्ग आयोग का मूल कार्यकाल अक्टूबर 2025 में खत्म हो चुका था, जिसे बाद में अक्टूबर 2026 तक बढ़ाया गया. लेकिन कानूनी नियमों के अनुसार, चुनाव में ओबीसी आरक्षण का निर्धारण करने और विस्तृत सर्वे करने का अधिकार सिर्फ एक 'वैध समर्पित आयोग' के पास ही होता है. इसी कानूनी अड़चन से बचने और निष्पक्ष चुनाव कराने के लिए योगी सरकार ने इस नए आयोग का गठन किया है.