Aaj Ka UP: यूपी Tak का एक बेहद लोकप्रिय और खास शो है 'आज का यूपी'. इस शो के माध्यम से हम उत्तर प्रदेश की राजनीति और प्रशासनिक गलियारों से जुड़ी तीन बड़ी खबरों का विस्तृत और सटीक विश्लेषण करते हैं. आज के इस एपिसोड में मुख्य रूप से तीन बड़ी खबरें छाई हुई हैं: पहली बड़ी खबर भीम आर्मी प्रमुख चंद्रशेखर आजाद के आगामी विधानसभा चुनाव 2027 को लेकर गठबंधन की शर्तों, सीटों की डिमांड और उनके बदले राजनीतिक तेवरों से जुड़ी है. दूसरी बड़ी खबर चंद्रशेखर द्वारा अखिलेश यादव और अन्य विपक्षी दलों के लिए अपने 'घर के दरवाजे' बड़े करने के सियासी इशारों और दावों का विश्लेषण करती है. वहीं, तीसरी बड़ी खबर में इस बात का गहराई से विश्लेषण किया गया है कि क्या चंद्रशेखर यूपी में गठबंधन न होने पर तमिलनाडु के 'टीवी के विजय' (थलपति विजय) की तरह 'एकला चलो' के फॉर्मूले पर चुनाव लड़ेंगे और उनकी इस पब्लिक पोश्चरिंग के पीछे जमीनी हकीकत क्या है.
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चंद्रशेखर आजाद की बड़ी मांग, क्या 2027 में अखिलेश के साथ गठबंधन के लिए मांगी 90 सीटें?
भीम आर्मी प्रमुख और आजाद समाज पार्टी (कांशीराम) के राष्ट्रीय अध्यक्ष, नगीना से सांसद चंद्रशेखर आजाद अब उत्तर प्रदेश की राजनीति में गठबंधन को लेकर खुलकर बात करने लगे हैं. हालांकि, पूर्व में वे लगातार अकेले चुनाव लड़ने की बात कहते रहे हैं, लेकिन यूपी Tak से हुई खास बातचीत में उन्होंने अपनी शर्तें और राजनीतिक हैसियत दोनों को स्पष्ट कर दिया है.
चंद्रशेखर ने सीटों के तालमेल को लेकर एक बहुत बड़ा इशारा किया है. उन्होंने कहा कि गठबंधन तो हो सकता है, लेकिन वह तभी संभव है जब उनकी पार्टी को 'हक की सीटें' दी जाएं. उत्तर प्रदेश में दलितों की आबादी लगभग 22% मानी जाती है. अगर इस 22% आबादी के समीकरण को आधार माना जाए, तो प्रदेश की कुल विधानसभा सीटों में से लगभग 90 सीटें बनती हैं. चंद्रशेखर ने इशारों-इशारों में स्पष्ट कर दिया है कि अगर कोई दल उनके साथ गठबंधन करना चाहता है, तो कम से कम 90 सीटों की डिमांड मेज पर रहेगी.
हालांकि, इससे पहले की एक बातचीत में उन्होंने मजाकिया या प्रतीकात्मक लहजे में कहा था कि 400 में से 203 सीटें अखिलेश यादव रख लें और 200 सीटें उन्हें दे दें. चंद्रशेखर का मानना है कि भले ही उनके पास वर्तमान में कोई विधायक न हो और उन्होंने केवल एक लोकसभा सीट (नगीना) जीती हो, लेकिन जमीन पर उनकी राजनीतिक हैसियत अब एक बड़े प्लेयर जैसी हो चुकी है. वे सीटों का समझौता अपनी शर्तों पर चाहते हैं और बहुजन समाज के मुद्दों पर दृढ़ हैं. फिलहाल, समाजवादी पार्टी (सपा) या अन्य कोई बड़ा दल उनकी इन भारी-भरकम मांगों को ज्यादा तवज्जो देने के मूड में दिखाई नहीं दे रहा है.
अखिलेश यादव को सियासी इशारा? चंद्रशेखर बोले- 'मैंने घर का दरवाजा बड़ा करवाया है ताकि बड़े नेताओं की गाड़ियां आ सकें'
साल 2022 के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव के बाद से ही समाजवादी पार्टी के प्रमुख अखिलेश यादव और चंद्रशेखर आजाद के बीच एक बड़ी राजनीतिक दूरी साफ देखी जा सकती है. संसद में भले ही दोनों नेताओं की मुलाकातें होती हों, लेकिन गठबंधन के मोर्चे पर बर्फ जमी हुई है. इस बीच चंद्रशेखर आजाद ने यूपी तक के माध्यम से अखिलेश यादव और इंडिया अलायंस के नेताओं को एक बड़ा ही दिलचस्प और कूटनीतिक संदेश दिया है.
चंद्रशेखर आजाद ने कहा, "मैंने अबकी बार अपने घर पर बहुत बड़ा दरवाजा लगवाया है ताकि किसी भी बड़े नेता को मेरे घर आते समय यह महसूस न हो कि उनकी गाड़ी अंदर नहीं जा पा रही है या उन्हें उतरकर पैदल जाना पड़ रहा है. वह जिस भी गाड़ी से आना चाहें, आ सकते हैं."
इस बयान को सीधे तौर पर अखिलेश यादव की तरफ एक सियासी इशारे के रूप में देखा जा रहा है. चंद्रशेखर खुद को उत्तर प्रदेश में बहुजन समाज और बहुजन समाज पार्टी (बसपा) के एक मजबूत विकल्प के रूप में स्थापित करने की कोशिश कर रहे हैं. वे कहते हैं कि अब समय आ गया है कि मायावती जी उन्हें अपना आशीर्वाद दें, क्योंकि अब वक्त आजाद समाज पार्टी का है. पश्चिमी उत्तर प्रदेश के जिलों में चंद्रशेखर की रैलियों में न सिर्फ भारी भीड़ उमड़ रही है, बल्कि वहां 'मुस्लिम-दलित' कॉम्बिनेशन भी कुछ हद तक सफल होता दिख रहा है. चंद्रशेखर को पूरा भरोसा है कि चुनाव नजदीक आने पर पश्चिमी यूपी के इस मजबूत समीकरण को देखकर समाजवादी पार्टी और कांग्रेस को उनके दरवाजे पर आना ही पड़ेगा, क्योंकि उनके बिना वहां किसी का जोर नहीं चलने वाला.
यूपी में चलेगा तमिलनाडु का मॉडल?
चंद्रशेखर आजाद को इस बात का भली-भांति अंदाजा है कि 90 सीटों की उनकी इस बड़ी मांग को समाजवादी पार्टी या कोई भी अन्य प्रमुख राजनीतिक दल आसानी से स्वीकार नहीं करेगा. यही कारण है कि उनके दिमाग में 'प्लान-बी' के तौर पर तमिलनाडु का एक बेहद चर्चित राजनीतिक फॉर्मूला भी चल रहा है. यह फॉर्मूला है 'एकला चलो रे'.
तमिलनाडु की राजनीति में सिनेमा से राजनीति में आए अभिनेता थलपति विजय ने बिना किसी गठबंधन के, बिना किसी मजबूत पारंपरिक संगठन के, सिर्फ अपने संघर्ष और जनता के भरोसे अकेले चुनाव लड़कर बड़ी राजनीतिक सफलता हासिल की. चंद्रशेखर आजाद अब इसी थलपति विजय के फॉर्मूले को उत्तर प्रदेश में आजमाने का मन बना रहे हैं.
विजय के फॉर्मूले का जिक्र करते हुए चंद्रशेखर आजाद ने कहा, "गठबंधन अपनी जगह महत्वपूर्ण है, लेकिन जब जनता ने नगीना लोकसभा सीट पर खुद गठबंधन बनाकर दिखा दिया, तो तानाशाही हुकूमत को उखाड़ना कोई बड़ी बात नहीं है. टीवी के विजय के पास तो कोई बड़ा राजनीतिक संगठन भी नहीं था, न ही उन्होंने फिल्मों के अलावा मेरी तरह जमीन पर संघर्ष किया है. उन्होंने मेरी तरह जेलें नहीं काटीं, लाठियां और गोलियां नहीं खाईं और न ही मुकदमे झेले हैं. जब तमिलनाडु की जनता उन्हें अकेले दम पर अवसर दे सकती है, तो यूपी की जनता हमारे संघर्ष को देखकर हमें अवसर क्यों नहीं देगी?"
चंद्रशेखर की यह पूरी रणनीति फिलहाल एक 'पब्लिक पोश्चरिंग' (जनता के बीच अपनी मजबूत छवि दिखाना) भी हो सकती है, ताकि बड़े दल उन्हें कम सीटों पर आंकने की भूल न करें. हालांकि, हकीकत यह भी है कि अखिलेश यादव आमतौर पर उन नेताओं से दूरी बनाकर रखते हैं जो सीटों को लेकर 'हार्ड बारगेनिंग' (कड़ी सौदेबाजी) करते हैं. ऐसे में देखना दिलचस्प होगा कि क्या आने वाले समय में आजाद समाज पार्टी जमीन पर इतनी मजबूत हो पाती है कि इंडिया अलायंस को उनकी शर्तों पर झुकना पड़े, या फिर चंद्रशेखर को सचमुच यूपी में अकेले ही चुनावी समर में उतरना पड़ेगा.
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