Mood Kya Hai Santkabir Nagar: पूर्वांचल के संत कबीर नगर जिले की तीनों विधानसभा सीटें खलीलाबाद, मेहदावल और धनघटा पर पिछले दो चुनावों से भारतीय जनता पार्टी का एकछत्र कब्जा रहा है. लेकिन 2027 के विधानसभा चुनाव की आहट के साथ ही यहां की सियासी हवा करवट लेती दिख रही है. एक तरफ जहां मुख्य सड़कें और अंडरपास जैसे बड़े विकास कार्य गिनाए जा रहे हैं. वहीं दूसरी तरफ खलीलाबाद नगर पालिका में नलों से आने वाला 'काला गंदा पानी', घंटों लंबा ट्रैफिक जाम, बारिश में कीचड़ से लबालब गांव की सड़कें और हावी होती अफसरशाही जनता के गुस्से को बढ़ा रही है. 2024 के लोकसभा चुनाव में तीनों बीजेपी विधायक होने के बावजूद बीजेपी प्रत्याशी की हार और नगर निकाय चुनावों में निर्दलीयों की जीत ने 2027 के लिए बीजेपी के सामने कड़ी चुनौती खड़ी कर दी है. क्षेत्र के वरिष्ठ पत्रकारों के विश्लेषण के साथ जानिए संत कबीर नगर की ज़मीनी हकीकत.
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जातीय समीकरण: तीन सीटों का सामाजिक गणित
संत कबीर नगर जिले की तीनों विधानसभाओं का अपना अलग-अलग जातीय और राजनीतिक प्रभाव है.
मेहदावल विधानसभा: यह क्षेत्र निषाद बहुल माना जाता है जहां निषाद पार्टी (एनडीए) का मजबूत दबदबा है.
धनघटा विधानसभा: यह सीट चौहान बहुल है जहां से वर्तमान में बीजेपी के विधायक हैं.
खलीलाबाद सदर (मुख्यालय): यह मुस्लिम बहुल क्षेत्र माना जाता है. इसके बावजूद पिछले दो चुनावों से यहां बीजेपी के विधायक (अंकुर राज तिवारी) जीतते आ रहे हैं.
स्थानीय मुद्दे जो जनता को कर रहे हैं बेहाल
स्थानीय पत्रकारों के अनुसार, 2027 का चुनाव राष्ट्रीय मुद्दों से ज्यादा स्थानीय नागरिक समस्याओं पर लड़ा जाएगा.
नलों से 'काला पानी': खलीलाबाद नगर पालिका क्षेत्र के मुस्लिम और दलित बहुल इलाकों में सुबह वाटर सप्लाई से बेहद गंदा और काला पानी आ रहा है जिससे लोग बीमार पड़ रहे हैं.
भयंकर ट्रैफिक जाम: खलीलाबाद शहर के 3 किलोमीटर के दायरे को पार करने में लोगों को आधे घंटे से अधिक का समय लग जाता है. नेताओं के स्वागत-जुलूसों के कारण हाईवे जाम हो जाते हैं जिससे एम्बुलेंस और मरीज फंसे रहते हैं.
गांवों में कीचड़ और बदहाली: मुख्य मार्ग भले ही चमचमा रहे हों लेकिन हल्की सी बारिश होते ही अंदरूनी गांवों की सड़कें घुटनों तक कीचड़ से भर जाती हैं जिससे ग्रामीणों का निकलना दूभर हो जाता है.
अफसरशाही और निकाय चुनावों से उपजा जन-असंतोष
जिले में अफसरशाही का हावी होना और जनप्रतिनिधियों व स्थानीय निकायों के बीच का टकराव एक बड़ा मुद्दा बन चुका है.
नगर निकाय चुनावों में झटका: हालिया निकाय चुनावों में जनता ने बीजेपी प्रत्याशियों को नकार कर निर्दलीय प्रत्याशियों को जिताया.
विधायक-निकाय खींचतान: स्थानीय विधायकों के प्रपोजल के बिना काम न होने के सरकारी नियमों के कारण निर्दलीय निकाय अध्यक्ष और विधायकों के बीच पेंच फंस गया. इससे विकास कार्य रुके और अफसरशाही हावी हो गई जिससे जनता खुद को ठगा हुआ महसूस कर रही है.
2024 लोकसभा चुनाव की हार
पत्रकारों का मानना है कि बीजेपी के लिए 2027 की राह आसान नहीं होगी.
3-0 का आंकड़ा पर लोकसभा में हार: जिले की तीनों सीटों (खलीलाबाद, मेहदावल, धनघटा) पर बीजेपी और सहयोगी दल के विधायक होने के बावजूद 2024 के लोकसभा चुनाव में बीजेपी-निषाद पार्टी गठबंधन के प्रत्याशी को हार का सामना करना पड़ा और सपा ने जीत दर्ज की.
सपा का 'संविधान' और 'पीडीए' दांव: 2024 में समाजवादी पार्टी द्वारा उठाए गए संविधान और पीडीए (पिछड़ा, दलित, अल्पसंख्यक) के मुद्दे ने ज़मीनी स्तर पर असर दिखाया है.
2027 की लड़ाई: प्रत्याशी और स्थानीय विकास पर टिकी निगाहें
वरिष्ठ पत्रकारों का निष्कर्ष है कि इस बार 2027 का चुनाव बेहद 'कांटे की टक्कर' का होगा. नाव मझधार में फंसी हुई है.
प्रत्याशी चयन होगा निर्णायक: इस बार केवल पार्टी के सिंबल पर नहीं बल्कि प्रत्याशी की छवि और स्थानीय समस्याओं के समाधान की क्षमता पर वोट पड़ेंगे.
समीकरण बनाम मुद्दे: यदि बीजेपी ने अफसरशाही, पीने के पानी, जलभराव और ग्रामीण सड़कों की समस्याओं पर समय रहते ध्यान नहीं दिया तो स्थानीय असंतोष का सीधा फायदा विपक्ष (सपा) को मिल सकता है.
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