UP Panchayat Chunav Update: उत्तर प्रदेश की त्रिस्तरीय पंचायतों के चुनाव को लेकर आखिरकार वह बड़ी और निर्णायक बाधा दूर हो गई है. मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की अगुवाई में सोमवार को हुई कैबिनेट की अहम बैठक में 'समर्पित ओबीसी आयोग' के गठन के प्रस्ताव को मंजूरी दे दी गई है. सरकार के इस बड़े फैसले के बाद उत्तर प्रदेश में पंचायत चुनाव कराने की राह पूरी तरह साफ हो गई है.
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क्यों पड़ी नए समर्पित ओबीसी आयोग के गठन की जरूरत?
इस फैसले के पीछे के कानूनी और तकनीकी कारणों को समझना बेहद जरूरी है. दरअसल, उत्तर प्रदेश में पहले से मौजूद ओबीसी आयोग का मूल कार्यकाल अक्टूबर 2025 में ही समाप्त हो गया था. हालांकि, योगी सरकार ने इस आयोग के कार्यकाल को एक साल के लिए आगे बढ़ाते हुए अक्टूबर 2026 तक के लिए कर दिया था. लेकिन कानूनी और संवैधानिक दृष्टिकोण से उस पुराने आयोग के पास समर्पित आयोग के अधिकार प्राप्त नहीं थे.
नियमों के मुताबिक, ओबीसी आयोग अपने तीन साल के मूल कार्यकाल के दौरान ही आरक्षण से जुड़े सर्वे का काम कर सकता है. चूंकि उसका मूल समय पूरा हो चुका था इसलिए वह चुनाव के लिए वैध सर्वे करने के योग्य नहीं रह गया था. इसी कानूनी पेच को सुलझाने और हाई कोर्ट द्वारा पारित किए गए आदेशों का पूरी तरह अनुपालन करने के लिए योगी सरकार ने कैबिनेट के माध्यम से एक बिल्कुल नए 'समर्पित ओबीसी आयोग' के गठन का रास्ता साफ किया है.
अब आगे क्या होगा, कैसे शुरू होगी आरक्षण की प्रक्रिया?
कैबिनेट से मंजूरी मिलने के बाद अब इस नए समर्पित ओबीसी आयोग के गठन की अधिसूचना जारी होगी और यह तुरंत काम पर लग जाएगा. यह नया समर्पित ओबीसी आयोग उत्तर प्रदेश के ग्रामीण क्षेत्रों में पिछड़े वर्गों की सामाजिक और राजनीतिक स्थिति का आकलन करने के लिए एक समकालीन यानी रैपिड सर्वे चलाएगा. इस रैपिड सर्वे का मुख्य उद्देश्य उत्तर प्रदेश में पिछड़ों की वास्तविक और सटीक आबादी का पता लगाना है.
इसी सर्वे से प्राप्त आंकड़ों के आधार पर ही यह तय किया जाएगा कि पंचायतों में ओबीसी आरक्षण कितने प्रतिशत और किन-किन सीटों पर लागू होगा. हालांकि, राज्य में ओबीसी वर्ग के लिए 27 फीसदी आरक्षण की सीमा पहले से ही निर्धारित है, लेकिन उसे किस वार्ड या पद पर कैसे लागू करना है, यह सर्वे रिपोर्ट तय करेगी. जब आयोग अपनी इस पूरी प्रक्रिया को पूरा करके अपनी अंतिम रिपोर्ट सरकार को सौंप देगा, उसके बाद ही आरक्षण संबंधी आधिकारिक अधिसूचना जारी की जाएगी.
आखिर कब तक हो सकेंगे उत्तर प्रदेश में पंचायत चुनाव?
उत्तर प्रदेश में ग्राम प्रधान, क्षेत्र पंचायत सदस्य (BDC) और जिला पंचायत सदस्य के चुनाव तकनीकी तौर पर तय समय के अनुसार अप्रैल-मई के महीने में ही संपन्न हो जाने चाहिए थे. लेकिन समर्पित ओबीसी आयोग की अनुपस्थिति के कारण आरक्षण की शुरुआती प्रक्रिया भी शुरू नहीं हो सकी थी, जिसके चलते चुनावों में देरी हुई.
अब चूंकि बाधा दूर हो चुकी है, तो सवाल उठता है कि वोट कब डाले जाएंगे?
आयोग के गठन, उसके बाद पूरे प्रदेश में रैपिड सर्वे कराने, डेटा जुटाने, रिपोर्ट तैयार करने और फिर सरकार द्वारा आरक्षण की लिस्ट जारी करने में तकरीबन पांच से सात महीने का लंबा समय लग सकता है. इन सभी प्रशासनिक प्रक्रियाओं के पूरे होने के बाद जब राज्य निर्वाचन आयोग (राज्य चुनाव आयोग) द्वारा आधिकारिक रूप से चुनाव कार्यक्रम घोषित किया जाएगा, तभी तारीखों का ऐलान संभव होगा. इस पूरी समय-सीमा को देखते हुए यह प्रबल उम्मीद जताई जा रही है कि उत्तर प्रदेश में पंचायत चुनाव अक्टूबर-नवंबर तक कराए जा सकते हैं.
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