Shahganj Vidhan Sabha 2027: उत्तर प्रदेश के जौनपुर जिले की शाहगंज विधानसभा सीट का सियासी मिजाज बेहद दिलचस्प और चौंकाने वाला रहा है. साल 2022 के विधानसभा चुनाव में यहां एक ऐसी कहानी लिखी गई जिसने सबको हैरान कर दिया. लगातार 20 साल से विधायक रहे समाजवादी पार्टी (सपा) के कद्दावर नेता को असदुद्दीन ओवैसी की पार्टी AIIMIM के एक दांव के कारण बेहद मामूली अंतर से हार का सामना करना पड़ा. अब साल 2027 के चुनावी समर को लेकर ओवैसी की पार्टी एक बार फिर दम भर रही है. ऐसे में सवाल बड़ा है कि क्या 2027 में शाहगंज का इतिहास खुद को दोहराएगा या सपा अपनी इस पारंपरिक सीट पर वापसी करेगी? आइए समझते हैं इस सीट का पूरा सियासी और जातीय गुणा-गणित.
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20 साल का सपा का राज और 2022 का बड़ा उलटफेर
अगर शाहगंज सीट का पिछले दो दशकों का इतिहास उठाकर देखें तो यह इलाका समाजवादी पार्टी का अभेद्य किला माना जाता था. साल 2002 और 2007 में यहां से सपा के जगदीश नारायण सोनकर चुनाव जीते. इसके बाद परिसीमन में सीट सामान्य हुई तो जगदीश सोनकर मछली शहर चले गए (जो बाद में भाजपा में शामिल हो गए)। इसके बाद 2012 और 2017 में सपा के दिग्गज नेता शैलेंद्र यादव उर्फ ललई यहां से विधायक चुने गए. ललई यादव लगातार 20 साल तक विधायक रहे (परिसीमन से पहले और बाद में मिलाकर).
2022 का निषाद पार्टी का दांव
साल 2022 के चुनाव में भाजपा-निषाद पार्टी गठबंधन के तहत यह सीट निषाद पार्टी के खाते में गई. निषाद पार्टी ने रमेश सिंह को अपना उम्मीदवार बनाया. इस कड़े मुकाबले में रमेश सिंह ने सपा के ललई यादव को मात्र 719 वोटों के बेहद मामूली अंतर से हराकर इतिहास बदल दिया.
विकास के दावे बनाम धांधली के आरोप
चुनाव नजदीक आते ही मौजूदा विधायक और पूर्व विधायक के बीच जुबानी जंग तेज हो गई है. निषाद पार्टी के मौजूदा विधायक रमेश सिंह का पक्ष है कि '2022 से पहले शाहगंज एक बीमारू विधानसभा था. सड़कें जर्जर थीं, स्टेशन बदहाल था और पुराने जनप्रतिनिधियों ने बस डिपो पर कब्जा कर रखा था. लेकिन आज शाहगंज विकासशील बन चुका है. केंद्रीय मंत्री नितिन गडकरी के आशीर्वाद से हजारों करोड़ की लागत से बाईपास बन रहा है. ₹131 करोड़ की लागत से इथेनॉल प्लांट का काम 90% पूरा हो चुका है. 50 बेड का अस्पताल तैयार है और जनता इस विकास को देखकर 2027 में भी हमें ही जिताएगी.'
सपा के पूर्व विधायक शैलेंद्र यादव 'ललई' का पलटवार
'2022 के चुनाव में भारी हेरफेर और धांधली की गई. हमारे वोटर्स के नाम काटे गए जिसके कारण सिर्फ 700 वोटों का अंतर रहा. अखिलेश यादव जी के निर्देश पर हमारा पूरा संगठन पिछले साढ़े चार साल से बूथ स्तर पर ग्रास रूट पर काम कर रहा है. आज जनता तहसील, ब्लॉक, पुलिस और बिजली विभाग के भ्रष्टाचार से त्रस्त है. 2027 के चुनाव में समाजवादी पार्टी शाहगंज सीट पर कम से कम 25,000 से ज्यादा वोटों के अंतर से ऐतिहासिक जीत दर्ज करने जा रही है.'
क्या था हार का मुख्य कारण? ओवैसी फैक्टर और जातीय समीकरण
शाहगंज मूल रूप से यादव और मुस्लिम बाहुल्य सीट मानी जाती है जो सपा का मुख्य वोट बैंक (पीडीए) है. लेकिन 2022 में सपा की हार की सबसे बड़ी वजह मुस्लिम वोटों का बिखराव बना. एआईएमआईएम (AIIMIM) के प्रत्याशी ने इस सीट पर करीब 8,000 वोट हासिल किए. माना जाता है कि यह पूरा मुस्लिम वोट बैंक था जो सपा के पाले से छिटक गया.
बसपा की सेंधमारी: बहुजन समाज पार्टी (बसपा) ने यहाँ से इंद्रदेव यादव को टिकट दिया था, जो कुछ यादव और मुस्लिम वोट अपनी तरफ खींचने में कामयाब रहे. इसी त्रिकोणीय मुकाबले का सीधा फायदा निषाद पार्टी के रमेश सिंह को मिल गया.
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