Chillupar Assembly seat: उत्तर प्रदेश के गोरखपुर जिले की सबसे हॉट और चर्चित सीटों में शुमार चिल्लू पार विधानसभा का सियासी पारा 2027 के चुनाव नजदीक आते ही चढ़ने लगा है. पूर्वांचल की राजनीति का केंद्र बिंदु मानी जाने वाली यह सीट दशकों तक बाहुबली राजनीति और ब्राह्मण नेतृत्व के मजबूत दबदबे के लिए जानी जाती रही है. पिछले चार दशकों से इस सीट पर लगातार ब्राह्मण प्रत्याशी ही जीत का परचम लहराते आ रहे हैं. कभी यह सीट पूर्वांचल के दिग्गज बाहुबली नेता स्वर्गीय पंडित हरिशंकर तिवारी के परिवार का अभेद्य किला हुआ करती थी. लेकिन 2022 के चुनाव में यहाँ समीकरण बदले और पहली बार भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) ने यहां कमल खिलाकर इतिहास रच दिया. ऐसे में सवाल उठ रहा है कि क्या 2027 में बीजेपी अपनी इस पकड़ को और मजबूत करेगी या समाजवादी पार्टी इस सीट पर दोबारा वापसी का रास्ता तलाश पाएगी? आइए स्थानीय पत्रकारों और ग्राउंड रियलिटी के जरिए समझते हैं चिल्लू पार का पूरा चुनावी और जातीय समीकरण.
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हरिशंकर तिवारी के साम्राज्य से बीजेपी के उदय तक
चिल्लू पार विधानसभा सीट का राजनीतिक इतिहास बेहद दिलचस्प और उतार-चढ़ाव से भरा रहा है.
1985 से 2002 का दौर: इस अवधि में यहां बाहुबली नेता पंडित हरिशंकर तिवारी का एकछत्र राज रहा. उन्होंने लगातार कई चुनाव जीतकर इस सीट को अपना राजनीतिक गढ़ बना लिया था.
2007 से 2017 का बदलाव: साल 2007 में बसपा (BSP) के टिकट पर राजेश त्रिपाठी ने हरिशंकर तिवारी को हराकर एक बड़ा उलटफेर किया. इसके बाद 2012 और 2017 में भी राजेश त्रिपाठी ने यहां अपनी जीत का सिलसिला बरकरार रखा.
2022 का ऐतिहासिक मोड़: राजेश त्रिपाठी बाद में भाजपा में शामिल हो गए. 2022 के चुनाव में बीजेपी ने उन पर बड़ा दांव खेला. राजेश त्रिपाठी ने सपा के टिकट पर चुनाव लड़ रहे हरिशंकर तिवारी के बेटे विनय शंकर तिवारी को पटखनी दी और चिल्लू पार के इतिहास में पहली बार भाजपा का खाता खोला.
बीजेपी और सपा के अपने-अपने दावे
2027 के चुनाव की तैयारियों के बीच दोनों ही मुख्य दल अपनी-अपनी जीत को लेकर आश्वस्त नजर आ रहे हैं.
बीजेपी अपनी मौजूदा जीत और मजबूत संगठन के दम पर लगातार दूसरी बार परचम लहराने का दावा कर रही है. पार्टी नेताओं का कहना है कि मोदी-योगी सरकार के कार्यकाल में चिल्लू पार में रिकॉर्ड विकास कार्य हुए हैं. 24 घंटे बिजली, सड़कों और ओवरब्रिज का जाल, पुलों का निर्माण और बाढ़ से गांवों को बचाने के लिए करोड़ों-अरबों के प्रोजेक्ट्स चल रहे हैं. इसके अलावा अडानी, रिलायंस और टाटा जैसी बड़ी कंपनियों के आने से नौजवानों के लिए रोजगार के नए रास्ते खुल रहे हैं. संगठन बूथ स्तर से लेकर विधानसभा तक पूरी तरह चुस्त-दुरुस्त है.
दूसरी तरफ सपा प्रमुख अखिलेश यादव लगातार जनता के बीच जाकर बड़ा संदेश दे रहे हैं. सपा का दावा है कि चिल्लू पार की जनता इस बार बदलाव चाहती है. पार्टी के जिला संगठन का कहना है कि वे अखिलेश यादव की 'पीडीए' (पिछड़ा, दलित, अल्पसंख्यक) नीति को घर-घर तक पहुंचाकर सभी वर्गों को जोड़ रहे हैं और मजबूती से चुनाव जीतकर वापसी करेंगे.
1 लाख से ज्यादा ब्राह्मण वोटर तय करते हैं दिशा
चिल्लू पार में जातीय समीकरण हमेशा से चुनावी नतीजों का सबसे बड़ा आधार रहे हैं. यहां का सामाजिक ताना-बाना कुछ इस प्रकार है.
कुल वोटर्स: करीब 4,31,000
ब्राह्मण मतदाता: 1,00,000 से अधिक (सबसे निर्णायक भूमिका में, यही वजह है कि 41 सालों से यहाँ सिर्फ ब्राह्मण प्रत्याशी ही जीत रहा है)
दलित मतदाता: करीब 1,00,000
निषाद मतदाता: काफी निर्णायक और बड़ी संख्या में
अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) व मुस्लिम: यह वर्ग भी हार-जीत तय करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है.
बीजेपी का वैश्य, ठाकुर और ब्राह्मण मतदाताओं के रूप में एक मजबूत कोर वोटर बैंक तैयार हो चुका है. जबकि विपक्ष ओबीसी और पीडीए के सहारे इस वोट बैंक में सेंध लगाने की फिराक में है.
क्या कहते हैं स्थानीय पत्रकार और जनता?
ग्राउंड पर माहौल को करीब से देख रहे स्थानीय पत्रकारों और जानकारों की राय बंटी हुई है.
स्थानीय पत्रकार राहुल कुमार के मुताबिक, 'चिल्लू पार में कई दशकों तक हरिशंकर तिवारी का वर्चस्व था. लेकिन 2022 में राजेश त्रिपाठी ने कमल खिलाया. सीएम योगी आदित्यनाथ के आने के बाद से गोरखपुर के साथ-साथ चिल्लू पार में भी फ्लाईओवर्स और सड़कों का बड़ा विकास हुआ है. विकास कार्य तो हुए हैं. लेकिन जनता परिवर्तन चाहती है या नहीं और क्या वह दल बदलेगी या प्रत्याशी, यह आने वाला वक्त ही तय करेगा.'
स्थानीय जानकार डीके गुप्ता का कहना है कि 'यूपी के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की कार्यशैली और विकास कार्यों को बिल्कुल भी नकारा नहीं जा सकता. गोरखपुर में ओवरब्रिज और सड़कों का जाल बिछा है. हालांकि मौजूदा राजनीतिक उठापटक को देखते हुए जनता के मन में थोड़ा असमंजस जरूर है. मुकाबला बेहद कांटे का होने वाला है.'
कांटे की टक्कर के आसार
फिलहाल के सियासी हालातों को देखा जाए तो चिल्लू पार विधानसभा सीट पर भारतीय जनता पार्टी अपने इस नए राजनीतिक कब्जे को बरकरार रखने के लिए पूरी ताकत झोंक रही है, तो वहीं समाजवादी पार्टी अपने सभी तिकड़मों और पीडीए फॉर्मूले के सहारे अपनी खोई हुई जमीन वापस पाने की जद्दोजहद में लगी है. विकास की साख और जातीय समीकरणों के इस महामंथन में 2027 की बाजी किसके हाथ लगेगी, यह देखना बेहद दिलचस्प होगा.
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