यूपी चुनाव 2027 में सपा-कांग्रेस के बीच कैसे होगा सीट बंटवारा? पता चल गई पार्टी के अंदर की बात

यूपी तक

• 08:04 PM • 02 Jul 2026

यूपी तक के कार्यक्रम 'मुद्दे की बात' में वरिष्ठ पत्रकार डॉ. उत्कर्ष सिन्हा ने 2027 विधानसभा चुनाव से पहले समाजवादी पार्टी और कांग्रेस के गठबंधन की संभावनाओं का विश्लेषण किया.

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Mudde Ki Baat: उत्तर प्रदेश की राजनीति में इन दिनों एक दिलचस्प खिचड़ी पक रही है. मौका था 1 जुलाई को समाजवादी पार्टी प्रमुख अखिलेश यादव के जन्मदिन का. जब राहुल गांधी ने उन्हें बधाई दी, तो अखिलेश ने भी हजारों बधाइयों के बीच राहुल के इस संदेश को खास तवज्जो देते हुए बड़े ही विनम्र भाव से शुक्रिया अदा किया. ऊपरी तौर पर देखने में तो लगता है कि कांग्रेस और सपा के 'जय-वीरू' के बीच सब कुछ ऑल इज वेल है, लेकिन क्या वाकई यह दोस्ती इतनी ही आसान है?

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यूपी Tak पर 'मुद्दे की बात' शो में सीनियर एडिटर नीरज गुप्ता और वरिष्ठ पत्रकार डॉ. उत्कर्ष सिन्हा के बीच इसे लेकर गहराई से बातचीत की गई.  सियासत का कड़वा सच सोशल मीडिया की इस मिठास से कोसों दूर है. जहां एक तरफ दोनों पार्टियों की टॉप लीडरशिप में कमाल की ट्यूनिंग दिख रही है, वहीं जमीनी हकीकत यह है कि कांग्रेस के भीतर का एक धड़ा अब 'बराबर के हक' की मांग पर अड़ गया है. 

इमरान मसूद जैसे कद्दावर नेता तो अभी से खुलेआम कह रहे हैं कि पुरानी 80-17 वाली गणित को खारिज करो और 2027 में नया फॉर्मूला लाओ. अब मूल सवाल यही उठता है कि क्या राहुल की 'गुडविल' उत्तर प्रदेश में कांग्रेस को मनमुताबिक सीटें दिलवा पाएगी? या फिर अखिलेश यादव केवल उतनी ही जमीन छोड़ेंगे जितने में कांग्रेस सिमट कर रह जाए?

'टीम प्रियंका' गायब, कमान पूरी तरह राहुल के हाथ में

डॉ. उत्कर्ष सिन्हा के विश्लेषण के मुताबिक, कांग्रेस के भीतर इस समय एक बड़ा सांगठनिक बदलाव देखने को मिल रहा है. पिछले विधानसभा चुनाव तक यूपी में 'टीम प्रियंका' का जो भारी-भरकम दबदबा हुआ करता था, वह इस समय पार्टी दफ्तर के आसपास भी नजर नहीं आ रहा है.

राहुल गांधी ने उत्तर प्रदेश की कमान अब पूरी तरह से अपने हाथ में और अपनी खास टीम के पास रखी है. वे किसी भी बाहरी दबाव या सिफारिश के आगे झुकने वाले नहीं हैं.

 

 

— डॉ. उत्कर्ष सिन्हा

यही वजह है कि राहुल गांधी खुद यूपी की राजनीति पर पैनी नजर रख रहे हैं. जब इमरान मसूद जैसे स्थानीय नेता सीट बंटवारे पर बयानबाजी करते हैं, तो अखिलेश यादव भी इसे गंभीरता से नहीं लेते. जब पत्रकारों ने अखिलेश से इस बारे में पूछा तो उन्होंने चुटकी लेते हुए कहा,

'403 सीटों पर वो भी तैयारी करें और 403 पर हम भी, तो मिलकर 806 सीटें हो जाएंगी.' 

साफ है कि अखिलेश भी सिर्फ दिल्ली की टॉप लीडरशिप से ही डील करना चाहते हैं, स्थानीय नेताओं की बयानबाजी से उन्हें कोई फर्क नहीं पड़ता.

मायावती को घेरने के लिए कांग्रेस का 'मास्टरस्ट्रोक'

चर्चा के दौरान एक और अहम पहलू सामने आया- राजेंद्र पाल गौतम को प्रभारी बनाया जाना. डॉ. सिन्हा इसे कांग्रेस की एक सोची-समझी रणनीति मानते हैं. यह सीधा संदेश मायावती और चंद्रशेखर आजाद के लिए है कि कांग्रेस अब दलित लीडरशिप को अपने दम पर खड़ा करेगी.

यूपी के दलित वोट बैंक (लगभग 21%) के समीकरण को देखें तो इसमें दो बड़े हिस्से हैं-

  1. गैर-जाटव दलित (पासी, वाल्मीकि आदि): इस हिस्से को 2024 के चुनाव में अखिलेश यादव ने अवधेश प्रसाद, आर.के. चौधरी और इंद्रजीत सरोज जैसे नेताओं के जरिए काफी हद तक अपने पाले में कर लिया था.
  2. जाटव दलित: यह मायावती का सबसे कोर वोटर माना जाता है, जहां अखिलेश की पकड़ अभी भी ढीली थी.

आम आदमी पार्टी से कांग्रेस में आए राजेंद्र पाल गौतम इसी जाटव समाज से आते हैं और उनकी इस समाज में अच्छी पकड़ है. ऐसे में कांग्रेस ने जाटव वोट बैंक को साधने की जिम्मेदारी खुद ले ली है.

170 सीटों का दावा

जब बात सीटों की संख्या पर आकर टिकती है, तो कई रिपोर्ट्स में दावा किया जा रहा है कि कांग्रेस को 170 सीटों की 'A-कैटेगरी' लिस्ट थमा दी गई है. लेकिन पत्रकारिता के दशकों के अनुभव के आधार पर डॉ. सिन्हा इस दावे को पूरी तरह खारिज करते हैं. 

यूपी के पिछले 30 साल के इतिहास में कांग्रेस ने कभी इतनी सीटें नहीं जीती हैं. 2009 के लोकसभा चुनाव को छोड़ दें, तो कांग्रेस का ग्राफ लगातार गिरा ही है. उत्तर प्रदेश के बैटल ग्राउंड में 'बड़ा भाई' हमेशा समाजवादी पार्टी ही रही है.

2027 का चुनाव सीटों की संख्या से ज्यादा 'क्वालिटी ऑफ सीट्स' यानी जिताऊ सीटों का होगा. सपा उन सीटों को कभी नहीं छोड़ेगी जहां उसके मौजूदा विधायक हैं या जहां वह पिछले चुनावों में दूसरे नंबर पर रही है. 

हां, अमेठी और रायबरेली जैसी पारंपरिक सीटों पर कांग्रेस का दावा मजबूत रहेगा, लेकिन बाकी जगहों पर दोनों पार्टियों का शीर्ष नेतृत्व उम्मीदवारों के चेहरे और उनकी जातिगत केमिस्ट्री को देखकर ही आखिरी फैसला लेगा.

मुद्दे की बात यह है:

गठबंधन होना पहली लेयर है, सीटों का सम्मानजनक बंटवारा होना दूसरी लेयर है, लेकिन सबसे महत्वपूर्ण तीसरी लेयर यह है कि क्या यह गठबंधन 2027 में जमीन पर बीजेपी के विजय रथ को रोक पाएगा? चुनाव जैसे-जैसे करीब आएंगे, इस आखरी और सबसे बड़े सवाल की तस्वीर भी साफ होती जाएगी.