Behat Vidhan Sabha 2027: उत्तर प्रदेश की सियासत में वैसे तो समाजवादी पार्टी और कांग्रेस का गठबंधन इंडिया (INDIA) ब्लॉक के तहत मजबूत नजर आता है. लेकिन जमीनी स्तर पर सीटों को लेकर घमासान शुरू हो चुका है. आज बात यूपी की नंबर-1 विधानसभा सीट बेहट (सहारनपुर) की जहां इतिहास गवाह है कि यहां आज तक केवल सपा, कांग्रेस और बसपा ही जीती हैं और भारतीय जनता पार्टी (BJP) को यहां अपनी पहली जीत का बेसब्री से इंतज़ार है. लेकिन दिलचस्प बात यह है कि आगामी चुनावों को लेकर इस सीट पर असली जंग गठबंधन के सहयोगी दलों-सपा और कांग्रेस के बीच ही छिड़ गई है. वर्तमान सपा विधायक उमर अली खान जहां अपने कामों के दम पर दोबारा दावेदारी ठोक रहे हैं. वहीं कांग्रेस के नवनिर्वाचित सांसद इमरान मसूद इस सीट को अपने पाले में लाने के लिए पूरा जोर लगा रहे हैं. दोनों तरफ से मची इस खींचतान के बीच बीजेपी भी इस कमजोर कड़ी पर सेंध लगाने के लिए एड़ी-चोटी का जोर लगा रही है. आइए समझते हैं बेहट सीट का पूरा सियासी और जातीय गणित.
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सीट का इतिहास और इमरान मसूद की नाराजगी की वजह
परसीमन से पहले साल 2007 में इमरान मसूद इस क्षेत्र से चुनाव जीत चुके हैं. हालांकि परसीमन के बाद के पिछले तीन चुनावों पर नज़र डालें तो इतिहास कुछ इस तरह रहा है.
2012: महावीर सिंह राणा (बसपा)
2017: नरेश सैनी (कांग्रेस - इमरान मसूद के करीबी)
2022: उमर अली खान (सपा)
दरअसल, 2022 के विधानसभा चुनाव में इमरान मसूद यह सीट अपने पाले में चाहते थे. लेकिन सपा ने यहां से उमर अली खान को टिकट दे दिया. इसी नाराजगी के चलते इमरान मसूद ने समाजवादी पार्टी का साथ छोड़ दिया था और बसपा होते हुए फिर से कांग्रेस में शामिल हुए जहां से वे अब सांसद हैं. अब सांसद बनने के बाद इमरान मसूद का दावा है कि सहारनपुर की सभी सीटों पर कांग्रेस ही लड़ेगी, जिसने सपा खेमे की चिंता बढ़ा दी है.
"सत्ता के विधायकों को 7 करोड़, विपक्ष को सिर्फ 95 लाख"
सीट पर मचे घमासान के बीच सपा के मौजूदा विधायक उमर अली खान का कहना है कि वे चुनाव के लिए पूरी तरह तैयार हैं, चाहे चुनाव अक्टूबर में हों या फरवरी में. विपक्षी विधायक होने के बावजूद अपने कार्यकाल के कार्यों को गिनाते हुए उमर अली खान ने कहा 'हमने इस क्षेत्र में सात से आठ प्रमुख पुलों का काम कराया है. शाकुंभरी देवी क्षेत्र में बाढ़ आने पर श्रद्धालु बह जाते थे, मैंने विधानसभा में पुल की मांग उठाई और उसे पूरा कराया. हालांकि भेदभाव यह है कि सत्तापक्ष के विधायकों को 7 करोड़ रुपये का फंड मिल रहा है और हमें (विपक्ष को) महज 90-95 लाख रुपये दिए जा रहे हैं. इसके बावजूद हमने 'खूनी सड़क' कही जाने वाली बेहट रोड का काम चालू करवाया. गंदेवर से चिलकाना मार्ग की हालत बेहद दयनीय है जिस पर चार राज्यों (यूके, हिमाचल, हरियाणा, यूपी) की जनता चलती है. मैंने विधानसभा में दो बार यह मुद्दा उठाया, मंत्री ने बजट पास होने की बात कही थी. लेकिन डेढ़ साल बाद भी स्थिति जस की तस है.'
सपा-कांग्रेस की रार पर बीजेपी की नजर
कहने को तो लड़ाई सपा और कांग्रेस के बीच दिख रही है, लेकिन पिछले चुनावों में बीजेपी यहां दूसरे नंबर पर रही है. बीजेपी के जिला अध्यक्ष का कहना है कि मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी समेत पूरी पार्टी बेहट सीट को लेकर बेहद संजीदा है. जिला अध्यक्ष ने बताया 'जब से मैं जिला अध्यक्ष बना हूँ, मेरा मुख्य फोकस बेहट विधानसभा पर है क्योंकि यहां हमारा विधायक नहीं है. हम मंडल अध्यक्ष, सेक्टर प्रभारी और ब्लॉक प्रमुखों के साथ मिलकर लगातार जनसंपर्क अभियान चला रहे हैं. केंद्र सरकार के सफल कार्यकाल को लेकर हमने बेहट में कई कार्यक्रम किए हैं और हमारी तैयारी पुख्ता है.'
क्या कहता है बेहट सीट का जातीय समीकरण और जमीनी माहौल?
बेहट सीट का जातीय समीकरण पूरी तरह से गठबंधन (सपा-कांग्रेस) के मुफीद माना जाता है, बशर्ते दोनों मिलकर लड़ें। इस सीट पर मतों का गणित कुछ इस प्रकार है.
मुस्लिम वोटर: लगभग 1,56,000
दलित वोटर (जाटव व वाल्मीकि): लगभग 80,000
सैनी वोटर: लगभग 60,000
क्षत्रिय वोटर: लगभग 15,000
गुर्जर वोटर: लगभग 9,000
जाट वोटर: लगभग 7,000
स्थानीय पत्रकारों का विश्लेषण है कि राष्ट्रीय स्तर पर अखिलेश यादव और राहुल गांधी के बीच कोई मतभेद नहीं हैं. लेकिन क्षेत्रीय स्तर पर नेताओं की बयानबाजी से कार्यकर्ताओं में भ्रम है. यह सीट दलित-मुस्लिम बाहुल्य है जहां चंद्रशेखर आज़ाद की पार्टी का भी प्रभाव है. अगर सपा और कांग्रेस का गठबंधन अटूट रहता है तो यहां गठबंधन को भारी बढ़त (एज) हासिल है. लेकिन अगर इमरान मसूद और उमर अली खान की यह आपसी लड़ाई नहीं थमी और वोटों का बिखराव हुआ तो इसका सीधा फायदा भारतीय जनता पार्टी को मिल सकता है. अब देखना यह होगा कि क्या शीर्ष नेतृत्व इस सीट के लिए 'सिंबल सपा का प्रत्याशी कांग्रेस का' जैसा कोई बीच का रास्ता निकालता है या फिर यह रार गठबंधन के लिए नई मुसीबत बनेगी.
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