कौन हैं कांग्रेस के नए प्रभारी राजेंद्र पाल गौतम जिनपर कभी देवी देवताओं का अपमान करने का लग चुका है आरोप?

Rajendra Pal Gautam: उत्तर प्रदेश कांग्रेस के नए प्रभारी राजेंद्र पाल गौतम ने आते ही सपा और इंडिया गठबंधन को लेकर बड़ा बयान देकर सियासी हलचल बढ़ा दी. जानिए उनका राजनीतिक सफर, विवादित बयान, मायावती कनेक्शन और यूपी में कांग्रेस की नई रणनीति.

Rajendra Pal Gautam

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रजत सिंह

• 02:07 PM • 30 Jun 2026

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Rajendra Pal Gautam: उत्तर प्रदेश की सियासत में इन दिनों राजेंद्र पाल गौतम का नाम सबसे ज्यादा सुर्खियों में है. कांग्रेस ने जैसे ही उन्हें उत्तर प्रदेश का नया प्रभारी नियुक्त किया सूबे की राजनीति का पारा अचानक बढ़ गया है. राजेंद्र पाल गौतम ने जिम्मेदारी संभालते ही एक ऐसा तीखा बयान दे दिया है जिसने समाजवादी पार्टी से लेकर इंडिया गठबंधन के भीतर सीट-शेयरिंग की चर्चाओं को हवा दे दी है. राहुल गांधी के सामाजिक न्याय के नैरेटिव के तहत यूपी भेजे गए इस दलित चेहरे का इतिहास जितना दिलचस्प है, उतना ही विवादों से भरा भी रहा है. आम आदमी पार्टी के कद्दावर मंत्री रहे राजेंद्र पाल गौतम अब यूपी में कांग्रेस की खोई हुई जमीन तलाशने और सहयोगियों को अपनी ताकत का अहसास कराने के मिशन पर निकल पड़े हैं.

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आते ही दिखाए तेवर: "बराबरी और सम्मान तो चाहिए ना"

यूपी का प्रभार मिलते ही राजेंद्र पाल गौतम ने साफ कर दिया कि कांग्रेस उत्तर प्रदेश में जूनियर पार्टनर की भूमिका में दबकर नहीं रहने वाली. जब उनसे गठबंधन और सीटों को लेकर सवाल किया गया, तो उन्होंने दोटूक लहजे में कहान 'बीजेपी देश के लोकतंत्र के लिए खतरा है और उसके खिलाफ सबको एकजुट होना होगा. लेकिन कांग्रेस एक राष्ट्रीय पार्टी है जिसने आजादी का आंदोलन लड़ा. आज पूरा देश फिर कांग्रेस की तरफ देख रहा है. ऐसे में बराबरी और सम्मान तो चाहिए ना. हमारा वोट बैंक कौन सा है, यह इसी बार का चुनाव परिणाम बता देगा.'

क्या है इस बयान के सियासी मायने?

यूपी में भले ही समाजवादी पार्टी खुद को बड़े भाई की भूमिका में देखती है. लेकिन राजेंद्र पाल गौतम ने राष्ट्रीय फलक का हवाला देकर कान घुमाकर पकड़ा और जता दिया कि कांग्रेस बड़ी पार्टी है. इस बयान के बाद सियासी गलियारों में यह चर्चा तेज हो गई है कि क्या आगामी चुनावों में सपा और कांग्रेस का गठबंधन बरकरार रहेगा या बात बिगड़ेगी.

'इंडिया अगेंस्ट करप्शन' से निकले और पहली ही बार में बने मंत्री

राजेंद्र पाल गौतम मूल रूप से दिल्ली के रहने वाले हैं और दिल्ली विश्वविद्यालय से एलएलबी की पढ़ाई करने के बाद उन्होंने वकालत शुरू की. वकालत के दौरान ही वे दलित अधिकारों और सामाजिक न्याय की लड़ाई से जुड़े रहे. 

साल 2014: अन्ना आंदोलन (इंडिया अगेंस्ट करप्शन) के बाद जब आम आदमी पार्टी (AAP) बनी, तो राजेंद्र पाल गौतम भी उसमें शामिल हो गए.

साल 2015: 'आप' ने उन्हें दिल्ली की सीमापुरी विधानसभा सीट से टिकट दिया. वे पहली ही बार में चुनाव जीतकर विधायक बने और अरविंद केजरीवाल सरकार में समाज कल्याण, अनुसूचित जाति/जनजाति कल्याण और जल मंत्रालय जैसे भारी-भरकम विभागों के मंत्री बने.

वो विवादित शपथ जिसने बदल दी सियासी राह

राजेंद्र पाल गौतम की छवि का एक दूसरा पहलू विवादों से भरा है. अक्टूबर 2022 में एक बड़े धार्मिक कार्यक्रम का वीडियो वायरल होने के बाद वे भाजपा (BJP) के सीधे निशाने पर आ गए. राजेंद्र पाल ने इस वीडियो में कहा था कि 'आप ऐसी चीजों पर भरोसा मत करो जो आपको नुकसान पहुंचाती हो. एक बात बताइए कि अगर कहीं मंदिर में जाने से हमारे लोगों की हत्या होती हो, अगर कहीं मूर्ति छू लेने से हमारे युवाओं की हत्या हो गई हो, तो आप ऐसी जगह क्यों जाते हो, जहां आपका अपमान हो...'

राजेंद्र पाल का तर्क

इस चौतरफा विवाद के बाद उन्होंने 'आप' के मंत्री पद से इस्तीफा दे दिया था. उनका कहना था कि उन पर लगे आरोप राजनीतिक हैं और वे केवल उस जगह जाने से मना कर रहे थे जहां दलितों और वंचितों का अपमान या उत्पीड़न होता है. बाद में वे आम आदमी पार्टी छोड़कर कांग्रेस में शामिल हो गए.

मायावती के दरवाजे पर दी दस्तक

यूपी का प्रभारी बनने से ठीक पहले राजेंद्र पाल गौतम की एक और गतिविधि ने सबको चौंका दिया था. वे कांग्रेस सांसद तनुज पुनिया को साथ लेकर अचानक बसपा प्रमुख मायावती का हालचाल जानने उनके आवास पर पहुंच गए थे. हालांकि, मायावती ने उनसे मुलाकात नहीं की और कांग्रेस ने भी खुद को इस मुलाकात से अलग कर लिया था.

सियासी गलियारे की चर्चा

जानकारों का मानना है कि मायावती के घर जाना महज एक शिष्टाचार नहीं बल्कि समाजवादी पार्टी को एक सीधा संदेश था कि कांग्रेस के पास 'बसपा' के रूप में दूसरा विकल्प भी खुला है. कांग्रेस एक दलित चेहरे को प्रभारी बनाकर कहीं न कहीं बसपा के छिटके हुए वोट बैंक को अपने पाले में लाने की कोशिश में है.

क्या टिकेगी राहुल-अखिलेश की केमिस्ट्री?

भले ही दिल्ली में राहुल गांधी और अखिलेश यादव की केमिस्ट्री बहुत शानदार नजर आती हो, लेकिन उत्तर प्रदेश की जमीनी हकीकत और सीटों का गणित हमेशा से जटिल रहा है. राजेंद्र पाल गौतम के आने के बाद यह साफ हो गया है कि कांग्रेस अब बैकफुट पर रहकर राजनीति नहीं करेगी. अब देखना यह होगा कि गौतम का यह आक्रामक रुख गठबंधन को मजबूती देता है या फिर सीटों के बंटवारे में कोई नई रार खड़ी करता है. यूपी की सियासत का यह खेल अब बेहद दिलचस्प मोड़ पर है.