सहारनपुर की गंगोह सीट पर क्या BJP लगाएगी जीत की हैट्रिक या सपा-कांग्रेस गठबंधन बिगाड़ेगा खेल?

UP Kiska: सहारनपुर की गंगोह विधानसभा सीट पर 2027 चुनाव को लेकर सियासी मुकाबला दिलचस्प होता दिख रहा है. भाजपा हैट्रिक की तैयारी में है, जबकि सपा वापसी का दावा कर रही है. जानिए जातीय समीकरण, पिछले चुनाव नतीजे और जीत-हार का पूरा गणित.

CM Yogi And Akhilesh Yadav

CM Yogi And Akhilesh Yadav (File Photo)

सुषमा पांडेय

• 12:48 PM • 27 Jun 2026

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Saharanpur Gangoh seat 2027: सहारनपुर की सात विधानसभा सीटों में गंगोह विधानसभा को सबसे अहम और राजनीतिक रूप से बेहद प्रभावशाली सीट माना जाता है. पहले नकुड़ विधानसभा का हिस्सा रही यह सीट परिसीमन के बाद अस्तित्व में आई और तब से लेकर आज तक यहां का चुनाव हमेशा जातीय ध्रुवीकरण और कड़े मुकाबले के लिए जाना जाता है. साल 2027 के महामुकाबले को लेकर अब यह सवाल बड़ा हो गया है कि क्या भाजपा इस सीट पर अपनी पकड़ मजबूत रखते हुए जीत की हैट्रिक लगा पाएगी, या फिर समाजवादी पार्टी दमदार वापसी करेगी? वहीं कांग्रेस की जमीन यहां किस तरह तैयार हो रही है, इसे स्थानीय पत्रकारों और सियासी आंकड़ों के जरिए समझना बेहद जरूरी है.

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गंगोह सीट का राजनीतिक इतिहास

परिसीमन के बाद वजूद में आई इस सीट पर अलग-अलग दौर में विभिन्न दलों का कब्जा रहा है.

2007: यह सीट बहुजन समाज पार्टी (बसपा) के महिपाल सिंह माजरा के पाले में गई थी.

2012: कांग्रेस के टिकट पर प्रदीप चौधरी ने यहां जीत दर्ज की.

2017: यूपी में भाजपा की लहर के दौरान प्रदीप चौधरी पाला बदलकर भाजपा में आए और फिर से कमल खिलाया.

2019 (उपचुनाव): प्रदीप चौधरी के सांसद बनने के बाद हुए उपचुनाव में भाजपा के कीरत सिंह ने इस सीट पर कब्जा बरकरार रखा.

2022: भाजपा के कीरत सिंह ने करीब 1,16,000 वोट पाकर दोबारा जीत हासिल की. वहीं सपा के इंद्रसेन लगभग 93,000 वोटों के साथ दूसरे नंबर पर रहे.

2022 की हार और 2027 के लिए नेताओं के बड़े दावे

भाजपा विधायक कीरत सिंह का पक्ष: "जनता किसी व्यक्ति को नहीं, बल्कि पीएम मोदी और सीएम योगी आदित्यनाथ की नीतियों, जनकल्याणकारी योजनाओं और जबरदस्त विकास एजेंडे को वोट देती है. डबल इंजन सरकार में एक्सप्रेस-वे, ग्रामीण सड़कों का चौड़ीकरण, सुदृढ़ स्वास्थ्य सेवाएं और बिजली की बेहतरीन आपूर्ति सुनिश्चित की गई है. सुशासन और मजबूत कानून व्यवस्था के दम पर जनता एक बार फिर भाजपा को जिताएगी."

विपक्ष (सपा) का पलटवार और रणनीति: समाजवादी पार्टी के नेताओं का मानना है कि 2022 में सपा और कांग्रेस के अलग-अलग चुनाव लड़ने के कारण मुस्लिम वोटों का बिखराव हो गया, जिसका सीधा फायदा भाजपा को मिला. इसके अलावा लोकल स्तर पर भितरघात भी एक कारण रहा. लेकिन 2027 के लिए सपा का एक-एक कार्यकर्ता एकजुट है. संगठन को मजबूत किया गया है और यदि 'इंडिया अलायंस' (सपा-कांग्रेस गठबंधन) के तहत संयुक्त प्रत्याशी उतरता है तो विपक्षी वोटों के ध्रुवीकरण से सपा की जीत तय है.

गंगोह का दिलचस्प जातीय गणित

गंगोह विधानसभा मूल रूप से एक मुस्लिम बाहुल्य सीट मानी जाती है. लेकिन इसके साथ ही यहां गुर्जर, दलित और राजपूत वोटर्स भी बेहद निर्णायक भूमिका निभाते हैं. आंकड़ों पर नजर डालें तो स्थिति कुछ इस प्रकार है.

मुस्लिम मतदाता: करीब 1,20,000 (सबसे बड़ा और निर्णायक वोट बैंक)

दलित मतदाता: करीब 60,000 से 80,000 के बीच

गुर्जर मतदाता: करीब 45,000 से 50,000 (सीट पर राजनीतिक रूप से बेहद प्रभावी)

राजपूत मतदाता: करीब 30,000 (परिसीमन के बाद देवबंद का कुछ राजपूत बाहुल्य हिस्सा इस सीट में जुड़ा)

अन्य ओबीसी (OBC) जातियां: करीब 70,000

स्थानीय पत्रकारों और राजनीतिक जानकारों का विश्लेषण

क्षेत्र के वरिष्ठ पत्रकारों के अनुसार, गंगोह सीट का एक पुराना ट्रेंड रहा है कि यहां 'काजी परिवार' और 'चौधरी परिवार' के बीच पारंपरिक रूप से सियासी लड़ाई चलती रही है. जब तक विपक्ष के ये बड़े चेहरे आपस में लड़ते रहेंगे तब तक तीसरी ताकत के रूप में भाजपा को सीधा फायदा मिलता रहेगा.

फिलहाल जमीनी स्तर पर भाजपा का संगठन काफी मजबूत है और विधायक कीरत सिंह लगातार जनता के बीच सक्रिय हैं जिससे उनकी स्थिति मजबूत दिखाई देती है. हालांकि अगर अखिलेश यादव का पीडीए (PDA - पिछड़ा, दलित, अल्पसंख्यक) फॉर्मूला पूरी तरह काम कर गया और मुस्लिम मतदाताओं के साथ-साथ गुर्जर व दलित वोटों का एक हिस्सा सपा गठबंधन के पाले में आ गया तो यह समीकरण भाजपा की हैट्रिक की राह में बड़ी मुश्किल खड़ी कर सकता है. अब देखना दिलचस्प होगा कि आगामी चुनाव में ऊंट किस करवट बैठता है और जनता किसके सिर पर जीत का सेहरा बांधती है.