पूर्वांचल की इस सीट पर दिखेगी तगड़ी फाइट, सपा-बीजेपी या बसपा में कौन मारेगा बाजी?

UP Kiska: गाजीपुर की जमानिया सीट पर 2027 का मुकाबला बेहद दिलचस्प होने वाला है. सपा के ओम प्रकाश सिंह, भाजपा और बसपा के समीकरण चुनावी तस्वीर तय करेंगे. जातीय गणित, विकास के दावे और त्रिकोणीय मुकाबले की संभावना पर सबकी नजरें टिकी हैं.

Zamania Assembly Election 2027

Zamania Assembly Election 2027

सुषमा पांडेय

• 07:49 PM • 26 Jun 2026

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Zamania Assembly Election 2027: गाजीपुर जिले की जमानिया विधानसभा सीट पूर्वांचल की उन चुनिंदा सीटों में शामिल है जहां का चुनाव हमेशा बेहद दिलचस्प होता है. यहां की राजनीति मुख्य रूप से समाजवादी पार्टी (सपा) और भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के इर्द-गिर्द घूमती है. साल 2022 के चुनाव में सपा के कद्दावर नेता और पूर्व मंत्री ओम प्रकाश सिंह ने भाजपा की सुनीता सिंह को हराकर रिकॉर्ड सातवीं बार विधानसभा पहुंचने का गौरव हासिल किया. अब सवाल यह है कि क्या 2027 के चुनाव में ओम प्रकाश सिंह अपना किला बचा पाएंगे या भाजपा अपनी चूक सुधारकर वापसी करेगी? वहीं बहुजन समाज पार्टी (बसपा) का रुख इस बार भी यहां हार-जीत की दिशा तय करने में सबसे बड़ा 'एक्स फैक्टर' साबित होने वाला है.

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उतार-चढ़ाव से भरा रहा है जमानिया का इतिहास

जमानिया विधानसभा सीट का राजनीतिक इतिहास बेहद उतार-चढ़ाव वाला रहा है. यहां की जनता ने समय-समय पर कांग्रेस, बसपा, सपा और भाजपा सभी को मौका दिया है.

2007: बसपा के राजकुमार सिंह गौतम ने यहां से जीत दर्ज की थी.

2012: सपा के ओम प्रकाश सिंह चुनाव जीते.

2017: भाजपा की सुनीता सिंह ने त्रिकोणीय मुकाबले का फायदा उठाते हुए जीत हासिल की और पूरा समीकरण बदल दिया.

2022: सपा के ओम प्रकाश सिंह ने दोबारा इस सीट पर कब्जा किया और वर्तमान में यहीं से विधायक हैं.

नेताओं के अपने-अपने दावे और जुबानी जंग

सपा विधायक ओम प्रकाश सिंह का दावा: "मैं 24 घंटे जनता के लिए ही जीता और जागता हूं. इस उम्र में भी नौजवानों से ज्यादा मेहनत करता हूं. विधायक के तौर पर मेरे सातवें कार्यकाल में मैंने बिजली, नहरों और सड़कों का जाल बिछाया है. बदौरा ब्लॉक में करीब 90% खेतों तक सिंचाई का पानी पहुंचाया है. अगर 2027 में दोबारा मौका मिला तो पंजाब की तर्ज पर बची हुई सभी नहरों का पक्कीकरण (लाइनिंग) करवाऊंगा."

भाजपा की सुनीता सिंह और संगठन का पलटवार

भाजपा का कहना है कि मौजूदा विधायक क्षेत्र में कोई काम नहीं कर रहे हैं, जो भी विकास हुआ है वह योगी और मोदी सरकार के दम पर हुआ है. 2022 में कुछ स्थानीय समीकरणों के चलते भाजपा से जो चूक हुई थी उसे सुधारकर 2027 में योगी सरकार के 9 साल और केंद्र के 12 साल के विकास कार्यों व मजबूत कानून-व्यवस्था के दम पर भारी बहुमत से वापसी करेंगे.

गहमर गांव: एशिया का सबसे बड़ा गांव और फौजियों की ताकत

इस विधानसभा क्षेत्र के अंतर्गत आने वाला 'गहमर' गांव पूरे विश्व में विख्यात है. इसे एशिया का सबसे बड़ा गांव माना जाता है. इस गांव की खासियत यह है कि यहां के लगभग हर परिवार से कोई न कोई व्यक्ति भारतीय सेना (फौज) में है. साल 2017 में भाजपा की सुनीता सिंह को इस फौजी बाहुल्य क्षेत्र से आने का सीधा भावनात्मक और राजनीतिक फायदा मिला था.

क्या कहते हैं जमानिया के जातीय समीकरण?

जमानिया में किसी भी दल की जीत और हार पूरी तरह से सामाजिक संतुलन और टिकट बंटवारे पर निर्भर करती है. यहां का अनुमानित जातीय गणित इस प्रकार है.

मुस्लिम मतदाता: करीब 25% से 30% (सबसे निर्णायक भूमिका में)

दलित मतदाता: करीब 18% से 20%

राजपूत (क्षत्रिय) वोटर: करीब 15%

यादव और कुशवाहा: करीब 10% से 12%

अन्य ओबीसी (OBC) व अन्य जातियां: बाकी बचे प्रतिशत में अपनी मजबूत और निर्णायक उपस्थिति रखती हैं.

राजनीतिक जानकारों और स्थानीय पत्रकारों का विश्लेषण

स्थानीय विश्लेषकों के अनुसार, जमानिया सीट वैसे तो सपा का पारंपरिक जनाधार क्षेत्र मानी जाती है. लेकिन यहां का पूरा खेल इस बात पर तय होता है कि मुकाबला 'आमने-सामने' का है या 'त्रिकोणीय'.

2017 का गणित: बसपा से कद्दावर नेता अतुल राय चुनाव मैदान में थे, जिन्होंने मजबूत टक्कर देते हुए मुस्लिम और स्थानीय वोटों में बड़ी सेंधमारी की थी. इस त्रिकोणीय मुकाबले में वोट बंटने का सीधा फायदा भाजपा की सुनीता सिंह को मिला और वह चुनाव जीत गईं.

2022 का गणित: 2022 में बसपा ने प्रत्याशी बदलकर परवेज खान को उतारा, जिससे मुकाबला आमने-सामने (सपा बनाम भाजपा) का हो गया और कड़े मुकाबले में सपा के ओम प्रकाश सिंह बाजी मार ले गए.

2027 की राह: अगर 2027 के चुनाव में बसपा कोई ऐसा मजबूत उम्मीदवार उतारती है जो दलित और मुस्लिम वोटों को अपने पाले में खींच सके, तो मुकाबला फिर से त्रिकोणीय होगा और इसका सीधा फायदा भाजपा को मिल सकता है. लेकिन अगर सीधा मुकाबला हुआ, तो समाजवादी पार्टी का पलड़ा भारी रह सकता है.