Panchayat Chunav Update: उत्तर प्रदेश में ग्राम प्रधानों को ही उनके गांवों का प्रशासक नियुक्त करने के योगी सरकार के फैसले को इलाहाबाद हाईकोर्ट में कड़ी चुनौती मिली है. इस मामले पर सुनवाई करते हुए हाईकोर्ट ने कहा है कि कार्यकाल खत्म होने के बाद प्रधानों को प्रशासक के रूप में बने रहने की इजाजत नहीं दी जा सकती. कोर्ट ने सरकार के इस कदम को अदालत की अवमानना की श्रेणी में माना है. हालांकि कोर्ट ने अभी सरकार के आदेश पर कोई अंतरिम रोक नहीं लगाई है. लेकिन इस फैसले पर विपक्षी दल समाजवादी पार्टी के मुखिया अखिलेश यादव ने सरकार को आड़े हाथों लिया है.
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क्या है मामला?
उत्तर प्रदेश में त्रिस्तरीय पंचायतों का कार्यकाल 26 मई 2026 को पूरी तरह समाप्त हो चुका है. नियम के मुताबिक कार्यकाल खत्म होने पर चुनाव होने चाहिए या सरकारी अधिकारियों को प्रशासक बनाना चाहिए. लेकिन यूपी सरकार ने एक आदेश जारी कर पुराने ग्राम प्रधानों को ही उनके गांवों का प्रशासक नियुक्त कर दिया था. सरकार के इसी फैसले के खिलाफ अरविंद राठौर नाम के व्यक्ति ने हाईकोर्ट में याचिका दाखिल कर मांग की है कि इन प्रशासकों को तुरंत हटाया जाए और राज्य में जल्द से जल्द पंचायत चुनाव कराए जाएं.
हाईकोर्ट ने क्या कहा और क्यों लगी फटकार?
जस्टिस सिद्धार्थ नंदन की सिंगल बेंच में हुई इस सुनवाई के दौरान कोर्ट ने सरकार के फैसले पर गंभीर सवाल उठाए. कोर्ट ने कहा कि प्रधानों को ही प्रशासक बना देना डिवीजन बेंच (बड़ी बेंच) के पुराने आदेश का सीधा उल्लंघन है और यह अदालत की अवमानना (Contempt of Court) की श्रेणी में आता है.
हाईकोर्ट ने राज्य सरकार को आखिरी मौका देते हुए एक विस्तृत हलफनामा दाखिल करने का निर्देश दिया है. कोर्ट ने कहा है कि अगर सरकार ने ओबीसी आरक्षण के लिए कोई आयोग गठित किया है तो उसकी पूरी रिपोर्ट और जानकारी कोर्ट में पेश करे. साथ ही सरकार को यह साफ-साफ बताना होगा कि वह चुनाव कब तक कराएगी. इस मामले की अगली सुनवाई अब 13 जुलाई को दोपहर 2 बजे होगी.
अखिलेश यादव का तीखा हमला
सपा प्रमुख अखिलेश यादव ने एक्स पर लिखा 'एक तरफ झूठी तारीफ के प्रायोजित कार्यक्रम करवाये जा रहे हैं तो उसी समय माननीय इलाहाबाद हाईकोर्ट की फटकार ने ये कहकर रंग मे भंग कर दिया कि ‘कार्यकाल ख़त्म होने के बावजूद ग्राम प्रधानों को प्रशासक बनाने का यूपी सरकार का फ़ैसला असंवैधानिक है’. जनता पूछ रही है कि ‘असंवैधानिक’ काम करने की सज़ा क्या होती है?’
अब यही ग्राम प्रधान भाजपाइयों को इसलिए गांवों में घुसने नहीं देंगे क्योंकि इस तरह के आदेश ने उनमें कुछ नये काम करने की उम्मीद जगाई थी, जिसका वादा वो जनता से कर चुके थे. अब जनता तो तकनीकी पक्ष समझती नहीं है कि क्या हुआ वो तो यही मानेगी कि प्रधान जी ने अपना वादा पूरा नहीं किया और सारा फंड-बजट-पैसा डबल इंजन के साथ मिल बांटकर खा गये. प्रधानों में इस बात का भी डर है कि कहीं इन बीच के दिनों के खर्चे का खामियाजा उनको अपनी जेब से न भरना पड़े.'
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