UP Kiska: उत्तर प्रदेश की राजनीति में फतेहपुर जिले की जहानाबाद विधानसभा सीट का इतिहास बेहद दिलचस्प रहा है. यह एक ऐसी सीट है जहां साल 2017 तक भारतीय जनता पार्टी को अपनी पहली जीत का इंतजार करना पड़ा था. 2017 में जब सहयोगी दल 'अपना दल (सोनीलाल)' की मदद से एनडीए को यहां पहली बार सफलता मिली तो उत्साहित बीजेपी ने 2022 में अपना खुद का प्रत्याशी उतारा और जीत का परचम लहरा दिया.
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इस जीत ने बीजेपी को उम्मीद दी थी कि 2027 में भी राह आसान होगी. लेकिन साल 2024 के लोकसभा चुनाव ने जहानाबाद के जमीनी सियासी खेल को पूरी तरह पलट दिया है. समाजवादी पार्टी का पीडीए (PDA) फॉर्मूला यहां मजबूत होकर उभरा है. ऐसे में सवाल उठता है कि क्या 2027 के रण में बीजेपी 2022 का करिश्मा दोहरा पाएगी या फिर सपा इस सीट पर अपनी पुरानी बादशाहत वापस पा लेगी?
जहानाबाद का राजनीतिक सफरनामा
जहानाबाद विधानसभा सीट पर लंबे समय तक सपा, बसपा और कांग्रेस का ही दबदबा रहा है. अगर पिछले कुछ चुनावों पर नजर डालें.
2002 और 2012: समाजवादी पार्टी के मदन गोपाल वर्मा ने जीत दर्ज की थी.
2007: बहुजन समाज पार्टी (बसपा) के आदित्य पांडे यहां से विधायक बने.
2017: बीजेपी के नेतृत्व वाले एनडीए गठबंधन से अपना दल (एस) के जय कुमार सिंह जैकी ने चुनाव जीता. यह सीट कुर्मी बाहुल्य होने के कारण अपना दल के मैदान में उतरने से बीजेपी गठबंधन को सीधा फायदा मिला था.
2022: बीजेपी ने बड़ा दांव खेलते हुए बगल की सीट से लड़ने वाले राजेन्द्र सिंह पटेल को टिकट दिया और उन्होंने सपा के दिग्गज नेता मदन गोपाल वर्मा को हराकर यह सीट बीजेपी के पाले में डाल दी.
बीजेपी विधायक का दावा
वर्तमान बीजेपी विधायक राजेन्द्र सिंह पटेल अपनी जीत और दोबारा टिकट मिलने को लेकर पूरी तरह आश्वस्त हैं. उनका कहना है कि '2022 में जब से जनता ने मुझे आशीर्वाद दिया, मैंने जहानाबाद की जटिल समस्याओं को सदन में उठाया. साल 1985 से लटकी 'घाटमपुर जहानाबाद परियोजना' के कारण अमौली ब्लॉक डार्क जोन घोषित हो चुका था जिससे किसान परेशान थे. मैंने मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ से मिलकर 80 करोड़ 41 लाख रुपये की लागत से 'रेन नदी पंप कैनाल' स्वीकृत कराई. इससे 8000 हेक्टेयर असिंचित भूमि सिंचित होगी और करीब 1 लाख किसानों को सीधा लाभ मिलेगा. हमारी सरकार ने लटकी-भटकी योजनाओं को धरातल पर उतारा है. आगामी चुनाव में पार्टी जनता के सर्वे और मेरे विकास कार्यों के आधार पर ही दोबारा टिकट देगी और हम फिर जीतेंगे.'
सपा का पलटवार
दूसरी तरफ, समाजवादी पार्टी जहानाबाद को अपना मजबूत गढ़ मानती है. सपा नेताओं का साफ कहना है कि 2022 में वे चुनाव हारे नहीं थे बल्कि बीजेपी के 'मैनेजमेंट और सरकारी तंत्र के दुरुपयोग' का शिकार हुए थे.
सपा पदाधिकारियों के अनुसार, 2022 में अति-उत्साह और कुछ क्षेत्रों में मतदाताओं तक न पहुंच पाने की कमी रह गई थी. लेकिन राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव के नेतृत्व में पार्टी ने इस कमी को सुधारा और 2024 के लोकसभा चुनाव में 'पीडीए' (पिछड़ा, दलित, अल्पसंख्यक) फॉर्मूले को धरातल पर उतारा जिसका नतीजा सबके सामने है. सपा का दावा है कि जिला अध्यक्ष सुरेंद्र यादव के नेतृत्व में पार्टी 2027 में फतेहपुर की सभी छह सीटों के साथ-साथ जहानाबाद सीट पर भी प्रचंड जीत दर्ज करेगी. गौरतलब है कि सपा के पूर्व विधायक मदन गोपाल वर्मा के निधन के बाद अब सपा नए सिरे से इस सीट पर अपनी रणनीति बना रही है.
जहानाबाद का जातीय गणित
जहानाबाद की सियासत मुख्य रूप से ब्राह्मण और कुर्मी मतदाताओं के इर्द-गिर्द घूमती है. यहां अमूमन इन्हीं दो बिरादरियों का विधायक चुना जाता रहा है. एक अनुमान के मुताबिक यहां का जातीय समीकरण इस प्रकार है.
| मतदाता वर्ग | अनुमानित संख्या |
|---|---|
| ब्राह्मण | 80,000 |
| कुर्मी | 70,000 |
| मुस्लिम | 35,000 |
| जाटव | 30,000 |
| यादव | 10,000 |
| निषाद | 10,000 |
| क्षत्रिय | 10,000 |
सियासी गुणा-गणित: यदि ब्राह्मण वोट बैंक में बिखराव होता है और कुर्मी वोट बैंक किसी एक तरफ एकजुट हो जाता है, तो बाजी पलट जाती है. 2024 के लोकसभा चुनाव में यही देखने को मिला, जब सपा प्रत्याशी नरेश उत्तम पटेल (कुर्मी) के पक्ष में यह वोट बैंक एकजुट हुआ और बीजेपी को भारी नुकसान उठाना पड़ा था.
क्या कहते हैं स्थानीय पत्रकार?
स्थानीय पत्रकारों और राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि 2027 के विधानसभा चुनाव में बीजेपी के लिए राह बेहद कांटों भरी होने वाली है.
पत्रकारों के अनुसार, जहानाबाद में जातीय समीकरण बहुत हावी रहता है. यदि मैदान में कुर्मी प्रत्याशी आता है, तो बिरादरी का झुकाव उसकी तरफ तेजी से होता है. 2024 के लोकसभा चुनाव में सपा के 'पीडीए' नारे ने जमीन पर बीजेपी को काफी पीछे धकेल दिया था. वर्तमान जमीनी परिस्थितियों और पुराने समीकरणों को देखते हुए इस बार समाजवादी पार्टी का पलड़ा थोड़ा भारी दिखाई दे रहा है और बीजेपी के सामने अपनी इस नई जीती हुई सीट को बचाने की बड़ी चुनौती होगी.
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