UP News: यूपी Tak का खास शो 'आज का यूपी' हाजिर है. इस शो में हम राज्य की तीन बड़ी और महत्वपूर्ण खबरों का गहन विश्लेषण करते हैं. आज के इस खास एपिसोड में हमारी पहली बड़ी खबर एसआईआर (SIR) के उन चौंकाने वाले आंकड़ों को लेकर है, जिसने उत्तर प्रदेश के सियासी गलियारों और खासकर बीजेपी के खेमे में खलबली मचा दी है, जहां मुस्लिम मतदाताओं और युवाओं की संख्या में अप्रत्याशित बढ़ोतरी दर्ज की गई है. दूसरी बड़ी खबर बिहार में हुए भरत तिवारी एनकाउंटर मामले पर है, जिसे लेकर समाजवादी पार्टी के मुखिया अखिलेश यादव ने बीजेपी सरकार की एनकाउंटर नीति को पूरी तरह से कटघरे में खड़ा कर दिया है. वहीं, तीसरी बड़ी खबर चुनाव आयोग के उस बड़े कदम पर है, जिसके तहत उत्तर प्रदेश के मतदाता सूचियों में मौजूद बड़े पैमाने पर डुप्लीकेसी और गड़बड़ियों को लेकर नए सिरे से समीक्षा और जांच शुरू कर दी गई है.
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एसआईआर (SIR) आंकड़ों का विश्लेषण: मुस्लिम वोटर्स की संख्या ने बढ़ाई बीजेपी की चिंता
भारतीय जनता पार्टी (BJP) को उम्मीद थी कि एसआईआर के बाद उत्तर प्रदेश में अवैध घुसपैठियों और डुप्लीकेट नामों के हटने से विपक्षी दलों (सपा-कांग्रेस) के वोट बैंक को नुकसान होगा, लेकिन सामने आए आंकड़ों के विश्लेषण ने बीजेपी को हैरान कर दिया है.
आबादी और वोटर्स में उछाल: पहले जहां उत्तर प्रदेश में मुस्लिम आबादी लगभग 18.6% मानी जाती थी, वहीं एसआईआर के आंकड़ों के विश्लेषण के बाद यह बढ़कर करीब 19.5% (लगभग 20% के करीब) पहुंच गई है.
युवा मतदाताओं में रिकॉर्ड बढ़ोतरी: सबसे चौंकाने वाला आंकड़ा नए वोटर्स का है. 18 से 21 वर्ष के नए मतदाताओं में अकेले मुस्लिम युवाओं की हिस्सेदारी 35% पाई गई है. वहीं 18 से 40 वर्ष के आयु वर्ग में मुस्लिम वोटर्स की संख्या 22% बढ़ी है.
विश्लेषण के अनुसार, एसआईआर और फॉर्म-6 भरने की प्रक्रिया के दौरान मुस्लिम समुदाय के भीतर नागरिकता या वोट कटने का डर फैला, जिसके चलते उन्होंने मस्जिदों और धर्मगुरुओं को शामिल कर बकायदा अभियान चलाया और बढ़-चढ़कर नए वोट बनवाए. इसके विपरीत, हिंदू मतदाताओं में एक तरह की उदासीनता देखी गई, जिसके कारण कई लोगों के नाम शहरों से कट गए या गांवों में ही दर्ज रह गए. चूंकि मुस्लिम समुदाय का करीब 90% वोट बीजेपी के खिलाफ जाता है, इसलिए हर पांचवें व्यक्ति के मुस्लिम बिरादरी से होने का यह अनुमान आगामी चुनावों के मद्देनजर बीजेपी के माथे पर चिंता की लकीरें खींच रहा है.
भरत तिवारी एनकाउंटर पर अखिलेश यादव का हमला: 'एनकाउंटर संस्कृति' पर खड़े किए सवाल
बिहार के भोजपुर में हुए ब्राह्मण युवक भरत तिवारी के एनकाउंटर ने न केवल बिहार बल्कि उत्तर प्रदेश की सियासत में भी भूचाल ला दिया है. विपक्ष के साथ-साथ खुद बीजेपी के भीतर भी इस एनकाउंटर को 'फर्जी' बताते हुए दो फाड़ की स्थिति बनी हुई है. अब इस मुद्दे को लेकर समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव ने कन्नौज से सरकार पर सीधा निशाना साधा है.
अखिलेश यादव ने दो टूक शब्दों में कहा कि लोकतंत्र और संविधान कभी भी एनकाउंटर की इजाजत नहीं देते. उन्होंने कहा, "न्याय हमेशा न्यायालय से मिलता है, एनकाउंटर कभी किसी जस्टिस का नाम नहीं हो सकता." सपा मुखिया का आरोप है कि पुलिस और प्रशासन को मिली शक्तियों का इस कदर दुरुपयोग हो रहा है कि अपराधियों के बाद अब आम आदमी भी इसकी चक्की में पिसने लगा है. उत्तर प्रदेश में योगी सरकार जहां एनकाउंटर को अपनी फ्लैगशिप पॉलिसी मानकर कानून-व्यवस्था सुधारने का दावा करती है, वहीं अखिलेश यादव को इस घटना के बाद ब्राह्मण समुदाय की नाराजगी में वर्ष 2027 के विधानसभा चुनाव का राजनीतिक समीकरण दिखाई दे रहा है.
चुनाव आयोग का बड़ा कदम: मतदाता सूची में भारी गड़बड़ी के बाद दोबारा शुरू हुई समीक्षा
एसआईआर आंकड़ों के विश्लेषण और चुनाव आयोग के पास पहुंची जानकारियों के मुताबिक, उत्तर प्रदेश की मतदाता सूची में अभी भी बहुत बड़ी संख्या में डुप्लीकेट वोटर्स (एक ही व्यक्ति का कई जगह नाम होना) दर्ज हैं.
गहन पड़ताल और मैपिंग में यह बात सामने आई है कि बड़े पैमाने पर पारिवारिक मैपिंग में गड़बड़ियां हुई हैं, जहां दादा-दादी, माता-पिता या नाना-नानी जैसे एक ही शख्स के नाम अलग-अलग बूथों या विधानसभाओं में पाए गए हैं. इसके अलावा हर बूथ पर डुप्लीकेसी की समस्या काफी गंभीर पाई गई है. इन तमाम विसंगतियों को देखते हुए चुनाव आयोग ने अब एसआईआर डेटा के इस विश्लेषण के बाद बेहद कड़ा रुख अपनाया है और पूरी मतदाता सूची की नए सिरे से समीक्षा शुरू कर दी है. इसके आधार पर आयोग जल्द ही उत्तर प्रदेश में डुप्लीकेट नामों को हटाने और नई शुद्धिकरण कार्रवाई करने की तैयारी में है.
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