UP Election: उत्तर प्रदेश में 2027 के विधानसभा चुनाव की सियासी बिसात अभी से बिछनी शुरू हो गई है. पिछले कई महीनों से पीडीए (पिछड़ा, दलित, अल्पसंख्यक) के नारे को धार दे रहे समाजवादी पार्टी के मुखिया अखिलेश यादव ने अचानक लखनऊ में ब्राह्मण सांसदों और विधायकों की एक बड़ी बैठक बुलाई थी. इस बैठक के बाद से ही यूपी के सियासी गलियारों में हलचल तेज है.
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राजनीतिक जानकारों का मानना है कि अखिलेश यादव अब भाजपा के सबसे मजबूत वोट बैंक यानी ब्राह्मण समुदाय को अपने पाले में लाने की गंभीर तैयारी कर रहे हैं. सपा की इस बैठक में उन मुद्दों को हवा दी गई जो इस समय ब्राह्मण समाज के बीच चर्चा का विषय बने हुए हैं.
भाजपा ने सपा की इस मुहिम को 'चुनावी ढोंग' करार दिया है और पलटवार करते हुए कारसेवकों पर हुए गोलीकांड की याद दिलाई है.
अखिलेश का नया दांव
वरिष्ठ पत्रकार विजय उपाध्याय ने यूपी तक पर सीनियर एडिटर नीरज गुप्ता के साथ बातचीत में बताया कि अखिलेश यादव इस बार बेहद सधे हुए कदम उठा रहे हैं. उनके इस नए दांव को हम कुछ अहम बिंदुओं से समझ सकते हैं...
- माता प्रसाद पांडे को आगे करना: अखिलेश यादव ने जब विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष का पद छोड़ा तो पूर्वी यूपी के वरिष्ठ नेता माता प्रसाद पांडे को जिम्मेदारी सौंपी. हालांकि, उनकी छवि जातिवादी नेता की नहीं है, लेकिन इस कदम से सपा ने संदेश दिया कि उनके पीडीए (PDA) के 'A' का मतलब अब 'अगड़ा' भी हो सकता है.
- 2012 का इतिहास: हालांकि इतिहास गवाह है कि ब्राह्मण समुदाय पारंपरिक रूप से सपा का कोर वोटर नहीं रहा है, लेकिन 2012 के विधानसभा चुनाव में इस वर्ग के एक ठीक-ठाक हिस्से ने सपा को वोट दिया था.
- विश्वसनीय चेहरे की तलाश: सपा के पास जनेश्वर मिश्रा के बाद कोई बड़ा ब्राह्मण चेहरा नहीं रहा. अगर सपा राजनीति से अलग पृष्ठभूमि वाले किसी पढ़े-लिखे और साफ-सुथरे नए चेहरे को आगे लाती है, तो उसे उम्मीदों के इस खेल में बड़ा फायदा मिल सकता है.
राम मंदिर चंदा विवाद और जमीनी असर
आजकल राम मंदिर के चंदे में घोटाले के आरोपों का मुद्दा गर्म है. एक्सपर्ट्स का मानना है कि ये मामला सिर्फ ब्राह्मण ही नहीं, बल्कि आम जनता के सेंटीमेंट को भी प्रभावित कर रहा है. ट्रस्ट की तरफ से डैमेज कंट्रोल में हुई देरी और अधिकारियों के कथित रवैये को लेकर लोगों में अंदरूनी नाराजगी है, जिसका सियासी फायदा उठाने की कोशिश विपक्ष जरूर करेगा.
भाजपा के 'सॉफ्टवेयर' से ही भाजपा को मात?
लोकसभा चुनाव 2024 के आंकड़ों को देखें तो सपा ने अपनी रणनीति में बड़ा बदलाव किया है. सपा पर हमेशा प्रो-मुस्लिम होने के आरोप लगते थे, लेकिन पिछले चुनाव में उन्होंने सिर्फ 5 मुस्लिम और 5 यादव उम्मीदवारों को टिकट दिया. इसके बजाय अन्य ओबीसी जातियों (कुर्मी, लोध, पासी) पर दांव खेला और कामयाबी पाई.
मायावती वाला फॉर्मूला
अखिलेश यादव अब मायावती के 2007 वाले सोशल इंजीनियरिंग के फॉर्मूले या भाजपा के 'सबका साथ' वाले मॉडल की राह पर हैं, जहां चुनाव जीतने के लिए हर बिरादरी का वोट जरूरी होता है.
क्या बदलेगा 2027 का नतीजा?
यूपी में करीब 12% ब्राह्मण मतदाता हैं. सीएसडीएस के पुराने आंकड़े बताते हैं कि 2007 में मायावती की सरकार बनने के पीछे भी ब्राह्मण वोटों में हुआ महज 10-11% का इजाफा था.
यूपी की राजनीति में मुकाबला इतना कड़ा है कि अगर भाजपा के इस पारंपरिक वोट बैंक में से महज 2 से 4 फीसदी वोट भी सपा की तरफ शिफ्ट होते हैं, तो भाजपा के लिए सत्ता की राह मुश्किल हो सकती है और सपा के लिए जीत का गणित बेहद आसान हो सकता है. मतलब साफ है कि जीत का गणित पूरी तरह बदल सकता है.
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