यूपी चुनाव 2027 में वोट पलट देगी 'राम मंदिर चढ़ावा चोरी'? अयोध्या में अचानक जमीनें खरीदने लगे थे ये लोग

अयोध्या राम मंदिर के चढ़ावे में कथित चोरी का मामला अब कानूनी कार्रवाई से आगे बढ़कर राजनीतिक बहस का विषय बन गया है. एसआईटी की शुरुआती रिपोर्ट के आधार पर एफआईआर दर्ज होने के बाद विपक्ष सरकार और ट्रस्ट पर सवाल उठा रहा है, जबकि सरकार दोषियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई का भरोसा दे रही है.

UP Tak

आयशा शेख़

• 12:06 PM • 29 Jun 2026

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अयोध्या में राम मंदिर के चढ़ावे में चोरी का मामला अब उत्तर प्रदेश की राजनीति का सबसे बड़ा केंद्र बन चुका है. 'यूपी Tak' के खास कार्यक्रम "मुद्दे की बात" में सीनियर एडिटर नीरज गुप्ता और वरिष्ठ पत्रकार ज्ञानेंद्र शुक्ला के बीच इस मुद्दे के हर राजनीतिक और सामाजिक पहलू पर विस्तृत चर्चा हुई. 

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इस पूरे विवाद ने न सिर्फ करोड़ों श्रद्धालुओं की आस्था को ठेस पहुंचाई है, बल्कि 2027 के यूपी विधानसभा चुनाव से पहले एक बड़ा सियासी तूफान भी खड़ा कर दिया है.

सूत्रों के हवाले से खबर है कि एसआईटी की शुरुआती रिपोर्ट और एफआईआर दर्ज होने के बाद, राम मंदिर ट्रस्ट के महासचिव चंपत राय और सदस्य अनिल मिश्रा ने नैतिकता के आधार पर इस्तीफा दे दिया है. 

हालांकि, मंदिर निर्माण प्रभारी गोपाल राव ने इस इस्तीफे की खबर से इनकार किया है. इस उठते विवाद और लगातार बदलते घटनाक्रमों के बीच विपक्ष बेहद हमलावर है और इसे 'बड़ी मछलियों' को बचाने की कोशिश करार दे रहा है.

2027 तक क्या मुद्दा टिकेगा? 

2027 के चुनाव में ये मामला कितना असर डालेगा, यह दो बातों पर निर्भर करेगा...

  1. क्या विपक्ष इस मुद्दे को अगले दो-तीन सालों तक जनता के बीच जिंदा रख पाएगा?
  2. क्या योगी सरकार दोषियों को 'स्पीडी ट्रायल' के जरिए सजा दिलाकर जनता के आक्रोश को शांत कर पाएगी?

क्या 2027 के चुनाव में भाजपा को होगा नुकसान?

राम मंदिर के 'पॉलिटिकल कस्टोडियन' के रूप में हमेशा से भाजपा को देखा जाता रहा है. ऐसे में इस 'आस्था की चोरी' से पार्टी की छवि पर असर पड़ना लाजिमी है.

  • आस्थावानों का आक्रोश: आम जनता, जिसने अपनी सामर्थ्य के अनुसार ₹10 से लेकर करोड़ों रुपये तक का दान दिया, उनकी भावनाएं इस घटना से बुरी तरह आहत हुई हैं. भारतीय परंपरा में मंदिर के धन या धूल तक की चोरी को अक्षम्य पाप माना गया है.
  • भाजपा का पलटवार: मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने जनता के आक्रोश को भांपते हुए सख्त से सख्त कार्रवाई का भरोसा दिया है. हालांकि, धर्म की पिच पर भाजपा के पास पुराने नैरेटिव (जैसे कारसेवकों पर गोली चलना या राम मंदिर का विरोध) के रूप में ऐसे 'तीर' मौजूद हैं, जिनका इस्तेमाल वह विपक्ष के हमलों को कुंद करने के लिए करेगी.

कैसे खुला मामला?

वरिष्ठ पत्रकार ज्ञानेंद्र शुक्ला के अनुसार, इस पूरे मामले की शुरुआत 6 जून को हुई थी, जब समाजवादी पार्टी के नेता और पूर्व मंत्री पवन पांडे ने पहली बार चढ़ावे में चोरी का मुद्दा उठाया था. 

शुरुआत में इसे दबाने और सामान्य बताने की कोशिश की गई, लेकिन जब भाजपा के ही स्थानीय नेता डॉ. रजनीश सिंह ने सीधे प्रधानमंत्री को पत्र लिखकर उच्च स्तरीय जांच की मांग की, तब सरकार एक्शन में आई.

  • 13 जून: लखनऊ के कमिश्नर विश्वास पंत के नेतृत्व में एक उच्च स्तरीय एसआईटी का गठन किया गया, जिसमें वित्त और पुलिस विभाग के आला अधिकारी शामिल थे.
  • 23 जून: एसआईटी ने अपनी 10 दिनों की जांच के बाद प्रारंभिक रिपोर्ट संजय प्रसाद (ACS होम) को सौंपी.
  • 25 जून की रात: मामले में बड़ी कार्रवाई करते हुए 8 लोगों के खिलाफ नामजद एफआईआर दर्ज की गई और गिरफ्तारियां हुईं. इन आरोपियों में चंपत राय का बेहद करीबी और उनका ड्राइवर टिन्नू यादव, मनीष यादव, अनुकल्प मिश्रा और अविनाश शुक्ला जैसे लोग शामिल हैं.

अयोध्या में यह सुगबुगाहट पहले से थी कि मंदिर में पैसे गिनने के लिए रखे गए कुछ निजी लोगों के पास अचानक बहुत पैसा आ गया है और वे तेजी से जमीनें खरीद रहे हैं. सपा ने इसी स्थानीय सुगबुगाहट को पब्लिक फोरम पर लाकर राजनीतिक बढ़त हासिल कर ली.

विपक्ष का आरोप- 'बड़ी मछलियों' को बचाने का खेल?

एसआईटी की रिपोर्ट और एफआईआर के बाद समाजवादी पार्टी के मुखिया अखिलेश यादव ने तीखा हमला बोला है. उन्होंने जनता के हवाले से कहा कि एसआईटी जांच के बहाने सारे अहम सबूत मिटा दिए गए होंगे, ताकि यह तय किया जा सके कि किसे फंसाना है और किन 'बड़ी मछलियों' को बचाना है.

कांग्रेस और आम आदमी पार्टी भी इस मुद्दे पर पूरी तरह मुखर हैं. अरविंद केजरीवाल इस पर लगातार प्रेस कॉन्फ्रेंस कर रहे हैं, वहीं कांग्रेस ने इस मामले को संसद के आगामी मानसून सत्र में उठाने की चेतावनी दी है. विपक्ष का मुख्य एजेंडा इस मुद्दे को राष्ट्रीय स्तर पर बनाए रखना और भाजपा की 'नैरेटिव सेटिंग' को कड़ी टक्कर देना है.

यह देखना बेहद दिलचस्प होगा कि क्या समाजवादी पार्टी और पूरा विपक्ष इस मुद्दे को 2027 के विधानसभा चुनाव तक जिंदा रख पाता है, या फिर योगी सरकार स्पीडी ट्रायल के जरिए दोषियों को कड़ी सजा दिलाकर इस डैमेज को समय रहते कंट्रोल कर लेगी.