रायबरेली सदर सीट पर सालों से एक ही परिवार का राज, 2027 में राहुल गांधी के गढ़ में अपनी सीट बचा पाएंगी अदिति सिंह?

UP Kiska: रायबरेली सदर विधानसभा सीट पर 1993 से एक ही परिवार का दबदबा कायम है. 2027 चुनाव से पहले अदिति सिंह जीत की हैट्रिक का दावा कर रही हैं. जबकि सपा-कांग्रेस गठबंधन इस बार राजनीतिक समीकरण बदलने की तैयारी में जुटा है.

Rahul Gandhi and Aditi Singh

Rahul Gandhi and Aditi Singh

रजत सिंह

• 02:19 PM • 02 Jul 2026

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Rae Bareli Sadar Vidhan Sabha 2027 : उत्तर प्रदेश की सियासत में कई ऐसी सीटें हैं जहां पार्टियां बदल जाती हैं, लहरें बदल जाती हैं, सरकारें बदल जाती हैं लेकिन एक ही परिवार का कब्जा बरकरार रहता है. आज 'यूपी किसका' में बात एक ऐसी ही हाई-प्रोफाइल विधानसभा सीट की जो साल 1993 से यानी पिछले 33 सालों से एक ही परिवार का अभेद्य किला बनी हुई है. हम बात कर रहे हैं रायबरेली की 'सदर विधानसभा सीट' की जो कभी बाहुबली अखिलेश सिंह और अब उनकी बेटी अदिति सिंह की वजह से जानी जाती है. राहुल गांधी के संसदीय क्षेत्र रायबरेली की यह वो दिलचस्प सीट है जहां लोकसभा चुनाव में तो कांग्रेस और विपक्ष का पलड़ा भारी रहता है. लेकिन विधानसभा आते ही 'पारिवारिक रसूख' सब पर भारी पड़ जाता है. सवाल अब 2027 का है कि क्या इस बार इस गढ़ में परिवर्तन होगा या परिवार का परचम लहराता रहेगा?

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बदला सिंबल लेकिन नहीं बदला परिवार

अगर रायबरेली सदर सीट का पिछला इतिहास उठाकर देखें तो यहां की जनता ने दल से ज्यादा हमेशा चेहरे पर भरोसा किया है.

2022: अदिति सिंह (बीजेपी से विजयी)

2017: अदिति सिंह (कांग्रेस के टिकट पर पहली बार जीतीं)

2012: अखिलेश कुमार सिंह (पीस पार्टी से विधायक बने)

2007: अखिलेश कुमार सिंह (निर्दलीय चुनाव जीते)

2002: अखिलेश कुमार सिंह (कांग्रेस से चुनाव जीते)

साल 2002-2003 के दौरान एक हत्याकांड (मनोज पांडे, जो अब बीजेपी सरकार में मंत्री हैं, उनके भाई की हत्या) में अखिलेश सिंह का नाम आने के बाद उन्हें कांग्रेस से निष्कासित कर दिया गया था. इसके बावजूद उनका दबदबा कम नहीं हुआ और वह निर्दलीय तथा पीस पार्टी से भी चुनाव जीतते रहे. साल 2017 के चुनाव से पहले जब उन्हें कैंसर डिटेक्ट हुआ तो उन्होंने अपने पुराने संबंधों के दम पर बेटी अदिति सिंह को कांग्रेस से लॉन्च किया. बाद में साल 2020 में मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के विकास कार्यों की तारीफ करते हुए अदिति ने कांग्रेस छोड़ दी और 2022 में बीजेपी के सिंबल पर शान से जीत दर्ज की.

अदिति सिंह को जीत की हैट्रिक का भरोसा

2027 के महामुकाबले को लेकर जब मौजूदा बीजेपी विधायक अदिति सिंह से बात की गई तो वह अपनी जीत को लेकर पूरी तरह आश्वस्त दिखीं. अदिति सिंह ने कहा 'रायबरेली जनपद और सदर विधानसभा की जनता ने हमेशा मेरे परिवार और मुझ पर अपनी बिटिया की तरह आशीर्वाद बनाए रखा है. मुझे पूरा भरोसा है कि यह सिलसिला आगे भी बरकरार रहेगा. पिछले 5 वर्षों में जो रोडमैप मैंने अपनी विधानसभा के विकास के लिए तैयार किया था उसमें मैं काफी हद तक सफल रही हूं. मैं अपने काम से संतुष्ट हूं और मेरी जनता भी मुझसे संतुष्ट है.'

लोकसभा की '1 लाख+' की बढ़त से गदगद सपा, गठबंधन के दम पर पलटेंगे बाजी?

सदर सीट पर समाजवादी पार्टी लगातार टक्कर तो देती रही है. लेकिन कभी जीत का स्वाद नहीं चख पाई. हालांकि, इस बार सपा और इंडिया गठबंधन के हौसले बुलंद हैं. सपा नेताओं का कहना है 'संगठनात्मक मजबूती के कारण साल 2024 के लोकसभा चुनाव में इंडिया गठबंधन के प्रत्याशी (राहुल गांधी) को अकेले सदर विधानसभा क्षेत्र से 1 लाख से अधिक वोटों की रिकॉर्ड बढ़त मिली थी.

सपा नेताओं का मानना है कि इस बार लोकसभा चुनाव वाली यही बढ़त 2027 के विधानसभा चुनाव में भी बरकरार रहेगी और वे इस बार रायबरेली सदर सीट जीतकर इतिहास बदल देंगे.

ठाकुर बाहुल्य सीट पर सोशल इंजीनियरिंग का गणित

सदर विधानसभा सीट के अनुमानित जातिगत आंकड़ों पर नजर डालें तो यहां हर वर्ग की अच्छी मौजूदगी है.

क्षत्रिय (ठाकुर): लगभग 40,000 (अदिति सिंह इसी समुदाय से आती हैं और उन्हें यहां मजबूत स्वजातीय समर्थन मिलता है)

ब्राह्मण: करीब 35,000

यादव, पासी, वैश्य, कायस्थ, मुस्लिम: प्रत्येक वर्ग की आबादी लगभग 30,000-30,000 के आसपास है.

लोध: लगभग 20,000, कुर्मी और जाटव (दलित): करीब 15,000-15,000. सोनकर: लगभग 12,000

बीजेपी के पारंपरिक वोट बैंक (ब्राह्मण, वैश्य, कायस्थ) के साथ जब ठाकुर समुदाय और अखिलेश सिंह के परिवार का व्यक्तिगत प्रभाव जुड़ता है, तो अदिति सिंह का पलड़ा भारी हो जाता है.

क्या कहते हैं स्थानीय पत्रकार? 

अदिति सिंह की जमीनी पकड़ और विपक्ष की तैयारियों को लेकर स्थानीय पत्रकारों की राय बंटी हुई नजर आती है. एक स्थानीय पत्रकार के मुताबिक, "सपा के पास यहां अदिति सिंह का मुकाबला करने के लिए कोई मजबूत चेहरा नहीं है. सपा से पहले लड़ चुके आरपी यादव कई बार हार चुके हैं. अगर सपा चेहरा नहीं बदलती या सोशल मीडिया के स्वघोषित उम्मीदवारों (जैसे योगेंद्र सिंह या शशिकांत शर्मा) पर दांव खेलती है तो बीजेपी और अदिति सिंह के लिए यह सीट निकालना बेहद आसान होगा.'

वहीं दूसरे पत्रकार का मानना है कि इस बार मुकाबला कड़ा है. 'सदर विधानसभा में इस समय संघर्ष की स्थिति है. विधायक जनता के बीच जाती जरूर हैं, लेकिन उनके काम धरातल पर कम दिख रहे हैं. आरपी यादव (सपा) और कांग्रेस के भी कुछ चेहरे सोशल मीडिया पर सक्रिय हैं. अगर 2027 में सपा और कांग्रेस का गठबंधन मजबूती से जमीन पर लड़ा, तो गठबंधन बीजेपी पर भारी पड़ सकता है.'

सवाल अब यही है कि क्या आगामी चुनाव में बीजेपी एक बार फिर अदिति सिंह पर ही दांव खेलेगी? और अगर टिकट मिलता है, तो क्या वह अपने पिता स्वर्गीय अखिलेश सिंह की इस राजनीतिक विरासत को आगे बढ़ाते हुए जीत की हैट्रिक लगा पाएंगी? क्या 1993 से चला आ रहा यह पारिवारिक किला अभेद्य रहेगा या फिर रायबरेली की जनता इस बार 'परिवर्तन' की नई इबारत लिखेगी, इस पर सबकी निगाहें टिकी हैं.