Akhilesh Yadav: यूं ही नहीं कोई अखिलेश यादव हो जाता है. एक ऐसा नेता जिसे कभी विरोधियों ने राजनीति का नौसिखिया कहा, टीपू कहकर तंज कसे. लेकिन आज वही नेता भारतीय राजनीति में समूचे विपक्ष की बैकबोन बनकर उभरा है. 38 साल की उम्र में उत्तर प्रदेश का सबसे युवा मुख्यमंत्री बनने वाले अखिलेश यादव ने विरासत तो संभाली लेकिन उसके साथ बगावत भी झेली. उन्होंने परिवार भी बचाया और बिखरती पार्टी को भी संभाला। हार के गहरे गर्त को भी देखा और ऐसी ऐतिहासिक वापसी की कि आज देश की राजनीति का रुख बदल गया. शांत, पढ़े-लिखे और टेक्नोलॉजी पसंद युवा नेता जो अक्सर पत्रकारों को भी AI यानी आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस इस्तेमाल करने की सलाह देते हैं. 1 जुलाई को अखिलेश यादव का था. समर्थकों से लेकर विरोधियों तक ने अखिलेश यादव को बधाई दी. आइए जानते हैं अखिलेश यादव के उस सफर की कहानी, जिसने उन्हें एक साधारण राजनेता से भारतीय राजनीति का सबसे बड़ा चेहरा बना दिया.
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हरकिशन सिंह सुरजीत का वो पॉलिटिकल गुरुकुल जहां गढ़े गए अखिलेश
अखिलेश यादव को राजनीति विरासत में जरूर मिली. लेकिन उनका यह सफर आसान नहीं था.बहुत कम लोग जानते हैं कि जब अखिलेश ऑस्ट्रेलिया से अपनी पोस्ट ग्रेजुएशन (MS) की पढ़ाई पूरी कर भारत लौटे तो नेताजी मुलायम सिंह यादव ने उन्हें सीधे चुनावी मैदान में नहीं उतारा. नेताजी ने अखिलेश को गठबंधन की राजनीति के चाणक्य माने जाने वाले मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी (CPM) के दिग्गज नेता कामरेड हरकिशन सिंह सुरजीत के पास भेजा.
साल 1996 से 1998 के बीच करीब डेढ़ साल तक अखिलेश यादव ने कामरेड सुरजीत के पास रहकर मानो एक गुरुकुल की तरह सियासत की दीक्षा ली. गठबंधन कैसे चलाए जाते हैं, अलग-अलग विचारधारा के लोगों को कैसे साधा जाता है, यह सब अखिलेश ने इसी गुरुकुल में सीखा जिसने आगे चलकर उनके भीतर एक गजब का पॉलिटिकल सेंस पैदा किया.
राज बब्बर से पिता-पुत्र का रिश्ता और डिंपल यादव की सियासी एंट्री
अखिलेश के जीवन का एक और दिलचस्प किस्सा अभिनेता और नेता राज बब्बर से जुड़ा है. जब राज बब्बर सपा में थे तब अखिलेश मुंबई में अक्सर उनके घर रुकते थे. दोनों के बीच पिता-पुत्र जैसा रिश्ता था. लेकिन सियासत ने एक दिलचस्प मोड़ लिया साल 2009 के लोकसभा चुनाव में. अखिलेश यादव ने कन्नौज और फिरोजाबाद, दोनों सीटों से चुनाव जीता. बाद में उन्होंने फिरोजाबाद सीट छोड़ दी जहां हुए उपचुनाव में सपा ने अखिलेश की पत्नी डिंपल यादव को उतारा.
डिंपल का यह पहला चुनाव था और उनके सामने कांग्रेस के टिकट पर कोई और नहीं बल्कि खुद राज बब्बर खड़े थे. चुनाव बेहद भावुक था. राज बब्बर चुनाव प्रचार में भी डिंपल को अपनी बहू और अखिलेश को बेटा कहते थे. डिंपल वह चुनाव हार गईं. लेकिन रिश्तों की गरिमा कभी कम नहीं हुई. नेताजी के निधन पर भी राज बब्बर बेहद भावुक नजर आए थे.
धौलपुर मिलिट्री स्कूल का अनुशासन और पारिवारिक मोर्चे पर संकट
अखिलेश यादव की शख्सियत में जो गजब का अनुशासन झलकता है, उसकी नींव धौलपुर के मिलिट्री स्कूल में पड़ी थी. वह आज भी अपने स्कूल के दिनों और अपने खास दोस्त निर्मल को नहीं भूलते. इसी अनुशासन ने उन्हें पारिवारिक संकटों से लड़ना सिखाया.
2012 का साइकिल सफर और मुख्यमंत्री की कुर्सी
साल 2012 में जब अखिलेश ने साइकिल पर सवार होकर पूरा यूपी नाप दिया तो युवाओं में उनका क्रेज बढ़ गया. सपा को पूर्ण बहुमत मिला और अखिलेश सीएम बने. यहीं से परिवार के भीतर मतभेद भी शुरू हुए.
2016 का पारिवारिक टकराव
चाचा शिवपाल यादव से विवाद इस हद तक बढ़ा कि मुलायम सिंह ने अखिलेश पर अनुशासनात्मक कार्रवाई तक कर दी. चुनाव चिह्न साइकिल पर संकट आया, विरोधियों ने उन्हें 'औरंगजेब' तक कह डाला. पिता के अपमान का कलंक झेलते हुए भी अखिलेश डिगे नहीं. उन्होंने विकास कार्य (लखनऊ मेट्रो, एक्सप्रेस-वे, लैपटॉप वितरण) भी किए और सधे अंदाज में परिवार को बिखरने से बचाया. हाल ही में प्रतीक यादव के निधन के समय भी अखिलेश पूरे परिवार को एक धागे में पिरोते और छोटी बच्ची को पुचकारते नजर आए.
हार का सेटबैक, महाप्रयोग और 2024 का कमबैक
साल 2017 के चुनाव में कांग्रेस के साथ गठबंधन के बावजूद सपा महज 47 सीटों पर सिमट गई. अखिलेश को अपरिपक्व कहा गया, लेकिन उन्होंने हार नहीं मानी. 2019 में उन्होंने मायावती के साथ नॉर्थ पोल और साउथ पोल जैसा असंभव गठबंधन कर सबको चौंका दिया. 2022 में वह सपा की सीटें करीब दोगुनी (111 सीटों के पार) ले गए.
जो नेताजी भी नहीं कर पाए वो अखिलेश ने कर दिखाया
साल 2024 के लोकसभा चुनाव में जहां बीजेपी 400 पार का नारा दे रही थी, वहां अखिलेश यादव ने उत्तर प्रदेश में अकेले 37 सांसद जिताकर इतिहास रच दिया. उन्होंने बीजेपी के जीत के रथ को यूपी में ही रोक दिया. यह सपा का स्वर्णिम युग था. आज संसद में लाल टोपी वाले सदस्यों की इतनी बड़ी फौज देखकर इंडिया गठबंधन के हर नेता (चाहे स्टालिन हों, ममता बनर्जी हों या राहुल गांधी) की आंखों के तारे अखिलेश बन चुके हैं.
बता दें कि 1 जुलाई को अखिलेश यादव का जन्मदिन मनाया गया. लेकिन वह असल में सिर्फ कागजी जन्मदिन है. खुद अखिलेश यादव ने एक बार खुलासा किया था कि दस्तावेजों में भले ही 1 जुलाई दर्ज हो, लेकिन असल में उनका वास्तविक जन्मदिन 23 अक्टूबर को होता है.
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