मेरठ की इस मुस्लिम बाहुल्य सीट पर सपा की लगेगी हैट्रिक या BJP की होगी वापसी?

सुषमा पांडेय

• 02:02 PM • 06 Jul 2026

UP Kiska: मेरठ शहर विधानसभा सीट पर 2027 चुनाव दिलचस्प होने वाला है. सपा जीत की हैट्रिक लगाने की कोशिश में है जबकि भाजपा वापसी का दावा कर रही है. जानिए जातीय समीकरण, स्थानीय मुद्दे और ग्राउंड रिपोर्ट क्या संकेत दे रही है.

CM Yogi and Akhilesh Yadav

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Meerut Election 2027: पश्चिमी उत्तर प्रदेश की सियासत में जब भी किसी शहरी विधानसभा सीट का जिक्र होता है तो मेरठ शहर विधानसभा सीट का नाम सबसे ऊपर आता है. 1857 की क्रांति की गूंज समेटे यह ऐतिहासिक और सामाजिक रूप से बेहद संवेदनशील सीट सूबे की सत्ता की दिशा तय करने वाली मानी जाती रही है. आगामी विधानसभा चुनाव की बिसात बिछने के साथ ही इस हाई-प्रोफाइल सीट पर चर्चाएं और सियासी पारा दोनों गरमा गए हैं. सवाल बड़ा है कि क्या समाजवादी पार्टी (सपा) यहां लगातार तीसरी बार साइकिल दौड़ाकर जीत की हैट्रिक लगाएगी या फिर भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) अपनी इस परंपरागत शहरी सीट को वापस छीनने की रणनीति में कामयाब होगी? आइए स्थानीय पत्रकारों और धरातल के समीकरणों के जरिए समझते हैं इस सीट का पूरा मिजाज.

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कांग्रेस का गढ़ फिर भाजपा की पकड़ और अब 'साइकिल' की धमक

मेरठ शहर सीट राजनीतिक इतिहास के कई दिलचस्प पड़ावों से गुजरी है. 1977 से 1985 तक यह सीट कांग्रेस का मजबूत किला हुआ करती थी. इसके बाद राम मंदिर आंदोलन के उभार के साथ भाजपा ने शहरी वोटर्स के दम पर यहाँ अपना संगठन मजबूत किया.

लक्ष्मीकांत वाजपेयी का दौर: साल 1989 में भाजपा के कद्दावर नेता लक्ष्मीकांत वाजपेयी यहां से पहली बार विधायक बने. इसके बाद वे 1996, 2002 और 2012 में भी यहां से जीतकर कुल चार बार विधायक रहे और वे पश्चिमी यूपी की राजनीति की धुरी बन गए.

2017 में हुआ बड़ा उलटफेर: साल 2017 के चुनाव में जब पूरे प्रदेश में भाजपा की प्रचंड लहर (सुनामी) थी, तब इस सीट पर बड़ा उलटफेर हुआ. सपा के रफीक अंसारी ने भाजपा के दिग्गज नेता लक्ष्मीकांत वाजपेयी को पटखनी दे दी.

2022 में भी दौड़ी साइकिल: साल 2022 के चुनाव में भाजपा ने तत्कालीन प्रदेश अध्यक्ष रहे लक्ष्मीकांत वाजपेयी का टिकट काटकर कमल दत्त शर्मा को मैदान में उतारा. लेकिन नतीजा फिर भी भाजपा के खिलाफ गया। सपा के रफीक अंसारी ने करीब 26,000 वोटों के बड़े अंतर से दोबारा जीत दर्ज की.

सपा और भाजपा के अपने-अपने दावे

चुनावी समर नजदीक आते ही दोनों ही दलों के नेता जनता के बीच अपने-अपने दावों के साथ ताल ठोक रहे हैं.

सपा विधायक रफीक अंसारी का पक्ष है कि 'अगर प्रदेश में हमारी सरकार होती तो हम इस शहर को चमन बना देते. इस सरकार में भेदभाव हुआ है और विकास का पहिया रुक गया है. मैंने ओडियन नाले को पक्का कराने का मुद्दा विधानसभा में कई बार उठाया. अपनी विधायक निधि और मुख्यमंत्री खाते से मिले करीब ₹12 करोड़ मैंने पूरी ईमानदारी से जनता और सड़कों पर लगाए हैं. गरीबों के चेहरे पर मुस्कुराहट लाना ही मेरा सपना है और जनता हमारे काम को देखकर तीसरी बार भी हमें चुनेगी.'

भाजपा के पूर्व प्रत्याशी कमल दत्त शर्मा का पलटवार

"अगर मेरठ शहर से भाजपा का विधायक बनेगा तो यहां से हिंदू-मुस्लिम का मुद्दा हमेशा के लिए समाप्त हो जाएगा. विपक्षी दल सिर्फ संप्रदाय की बात करके मुस्लिम समाज को डराने की कोशिश करते हैं. अगर जनता भाजपा पर विश्वास करेगी तो उन्हें विकास की गंगा नजर आएगी. मौजूदा विधायक पिछले कई सालों से शहर में कहीं नजर नहीं आए, उनकी कोई योजना धरातल पर नहीं उतरी है. इस बार हमारी दमदार वापसी तय है.'

जातीय और सामाजिक समीकरण

मेरठ शहर विधानसभा सीट का जातीय समीकरण हमेशा से नतीजों को सीधे प्रभावित करता रहा है. यह एक मुस्लिम बाहुल्य सीट है जो पिछले दो चुनावों से सपा के लिए सबसे बड़ा प्लस पॉइंट साबित हुई है.

अनुमानित जातीय आंकड़े

मुस्लिम मतदाता: 35% से 40% (सबसे बड़ा निर्णायक वर्ग)

वैश्य (बनिया) वोटर: 15% से 18% (भाजपा का पारंपरिक कोर वोटर)

ब्राह्मण वोटर: 8% से 10%

पंजाबी/खत्री: 8% से 10%

दलित मतदाता: 10% से 12%

अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC): 12% से 15%

जाट मतदाता: 5% से 7%

वरिष्ठ पत्रकारों का विश्लेषण

सीट के भविष्य को लेकर स्थानीय राजनीतिक विश्लेषकों और पत्रकारों का मानना है कि इस बार मुकाबला सिर्फ सपा और भाजपा के बीच सीधा नहीं होने वाला है. इस सीट के भाग्य विधाता कई अन्य मोर्चों पर तय होंगे.

मुस्लिम वोटों में बिखराव का खतरा: अगर असदुद्दीन ओवैसी की पार्टी, बहुजन समाज पार्टी और पश्चिमी यूपी में युवाओं के बीच तेजी से उभर रहे चंद्रशेखर रावण की 'आजाद समाज पार्टी' अपने मजबूत उम्मीदवार उतारती हैं तो मुस्लिम और दलित वोटों में बड़ा बिखराव होगा. मुस्लिमों का वोट प्रतिशत इस सीट पर करीब 48-52% के अनुपात में रहता है जो अभी तक सपा के पक्ष में एकजुट रहा है. अगर इसमें डेंट लगता है, तो इसका सीधा फायदा भाजपा को मिलेगा.

एंटी-इनकंबेंसी फैक्टर: मौजूदा सपा विधायक रफीक अंसारी की छवि बेदाग है और अपनी बिरादरी में पकड़ मजबूत है. लेकिन लगातार दो बार विधायक रहने के कारण उनके खिलाफ कुछ स्थानीय स्तर पर जनता की नाराजगी भी देखने को मिल सकती है.

भाजपा के भीतर की सुगबुगाहट: भाजपा के भीतर भी इस बात को लेकर मंथन चल रहा है कि किसी मजबूत ब्राह्मण या वैश्य चेहरे को उतारा जाए. साथ ही, लक्ष्मीकांत वाजपेयी की इस चुनाव में क्या भूमिका और सक्रियता रहती है, यह भी भाजपा के शहरी वोट बैंक को एकजुट करने के लिए बेहद अहम होगा.

फिलहाल जमीनी और सांख्यिकी लिहाज से समाजवादी पार्टी को मेरठ शहर सीट पर बढ़त  हासिल है. लेकिन यदि विपक्षी मतों का ध्रुवीकरण टूटा और छोटे दलों ने सेंधमारी की तो भाजपा अपने मजबूत शहरी और संगठनात्मक वोट बैंक के सहारे इस सीट पर भगवा लहराकर पुरानी हार का हिसाब चुकता कर सकती है.