Jayant Chaudhary News: 80 लोकसभा सीटों वाले राज्य उत्तर प्रदेश के सियासी गलियारों से एक बड़ी खबर सामने आई है. आपको बता दें कि बीते दिनों दिल्ली में इंडिया गठबंधन की चौथी बैठक हुई. इस बैठक से यह बात निकलकर आई कि सपा चीफ अखिलेश यादव नहीं चाहते हैं कि बसपा मुखिया मायावती इंडिया गठबंधन का हिस्सा बनें. वहीं, अब इसी से जुड़ी एक और खबर पता चली है. सूत्रों के हवाले से पता चला है कि बैठक में अखिलेश यादव ही नहीं बल्कि जयंत चौधरी ने भी मायावती के गठबंधन में आने का विरोध किया था. बकौल रिपोर्ट्स, जयंत ने कहा था कि मायावती को लाने की कोशिश हुई तो वह गठबंधन से अलग हो जाएंगे.
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जयंत ने मायावती से लिया बदला?
गौरतलब है कि 2019 के लोकसभा चुनाव में मायावती ने सपा-बसपा गठबंधन में आरएलडी को तवज्जो और ना ही गठबंधन में जगह दी थी. ऐसे में सपा ने अपने कोटे से आरएलडी को सीटें दी थीं. ऐसा कहा जा रहा है कि जयंत ने इंडिया गठबंधन की बैठक में मौके पर चौका मारकर अपना पुराना हिसाब किताब बराबर कर लिया है.
सियासी गलियारों में ऐसी चर्चा है कि इन दोनों नेताओं द्वारा बसपा को गठबंधन में लाने की कोशिशें को रोक देने से कांग्रेस बैक फुट पर आ गई है. अब कांग्रेस के पास इस गठबंधन में उत्तर प्रदेश में खुद को सरेंडर करने के अलावा बहुत ज्यादा विकल्प नहीं बचा है.
अखिलेश ने बैठक में कही ये बात
हालिया दिल्ली में हुई इंडिया गठबंधन की बैठक में अखिलेश यादव ने मायावती को लेकर कांग्रेस से दो टूक सवाल किया और यूपी को लेकर दो शर्तें भी रख दीं. अखिलेश यादव ने पूछा कि क्या इस गठबंधन के इधर कांग्रेस पार्टी बीएसपी के साथ बातचीत कर रही है? क्या वह बीएसपी को इस गठबंधन में लाना चाहती है सबसे पहले कांग्रेस इस पर अपना रुख स्पष्ट करे? अखिलेश यादव ने तल्ख भाव में यह पूछ लिया था कि अगर कांग्रेस ऐसा चाहती है तो वह साफ कर दे क्योंकि तब समाजवादी पार्टी को भी अपना स्टैंड इस गठबंधन को लेकर साफ करना पड़ेगा.
मायावती ने दिया दो टूक जवाब
मायावती ने कहा, “विपक्ष के गठबंधन में बीएसपी समेत जो भी विपक्षी पार्टियां शामिल नहीं हैं, उनके बारे में किसी को भी बेफिजूल कोई भी टीका टिप्पणी करना उचित नहीं है. तथा इससे इनको बचना चाहिए…क्योंकि भविष्य में देश में जनहित में कब किस को किसी की भी जरुरत पड़ जाए, यह कुछ भी कहा नहीं जा सकता है. अर्थात फिर ऐसे लोगों और पार्टियों को काफी शर्मिंदगी उठानी पड़े, यह ठीक नहीं है. इस मामले में समाजवादी पार्टी जीता जागता उदहारण भी है.”
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