Mankapur Assembly Election 2027: उत्तर प्रदेश की सियासत में गोंडा जिले का अपना एक अलग और बेहद दिलचस्प मिजाज रहा है. यहां एक तरफ बाहुबली बृजभूषण शरण सिंह का अपना सियासी दबदबा है तो दूसरी तरफ मनकापुर राजघराना है, जिसकी कमान कभी राजा आनंद सिंह के हाथ में थी और अब उनके बेटे व मोदी सरकार में केंद्रीय मंत्री कुंवर कीर्तिवर्धन सिंह उर्फ राजा भैया इसे संभाल रहे हैं. इसी राजघराने के प्रभाव वाली सुरक्षित विधानसभा सीट है 'मनकापुर', जहां पिछले दो चुनावों (2017 और 2022) से भाजपा के वरिष्ठ दलित नेता और पूर्व मंत्री रमापति शास्त्री विधायक हैं. लेकिन बदलते दौर में जहां एक तरफ बृजभूषण शरण सिंह अपनी ही पार्टी को रह-रहकर चेतावनी दे रहे हैं. वहीं दूसरी तरफ समाजवादी पार्टी का 'पीडीए' (पिछड़ा, दलित, अल्पसंख्यक) फॉर्मूला जमीन पर पैर पसार रहा है. ऐसे में सवाल उठता है कि क्या साल 2027 के रण में भी यहां भाजपा का 'माहौल टाइट' रहेगा या सियासी समीकरण कोई नया मोड़ लेने वाले हैं?
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सपा की हैट्रिक बनाम भाजपा का गढ़
मनकापुर विधानसभा सीट के इतिहास को देखें तो यहां का मतदाता समय-समय पर करवट बदलता रहा है. इस सीट पर अब तक सबसे ज्यादा 8 बार भाजपा को जीत मिली है, तो वहीं समाजवादी पार्टी भी यहां जीत की हैट्रिक लगा चुकी है.
2017 और 2022: भाजपा के दिग्गज नेता रमापति शास्त्री ने जीत दर्ज की.
2012: सपा के बाबूलाल ने बाजी मारी.
2002 और 2007: सपा के राम आजाद यहां से विधायक चुने गए थे.
2027 के चुनावी दावों को लेकर मौजूदा विधायक रमापति शास्त्री बेहद आश्वस्त नजर आते हैं. उनका कहना है कि गोंडा की जनता ने उन्हें 8 बार जिताकर जो सम्मान दिया है, वह उसका कर्ज विकास से चुका रहे हैं. उन्होंने दावा किया कि जनता को योगी-मोदी की डबल इंजन सरकार पर पूरा भरोसा है और विकास की इसी गति के दम पर 2027 में फिर भाजपा की सरकार बनेगी.
सपा का 'PDA' दांव: "इस बार सब साफ हो जाएगा"
दूसरी तरफ भाजपा के इस किले को ढहाने के लिए समाजवादी पार्टी ने अभी से एड़ी-चोटी का जोर लगा दिया है. सपा के स्थानीय नेता रमेश गौतम का कहना है कि इस बार मनकापुर में पीडीए का जलवा चलेगा. सपा सुप्रीमो अखिलेश यादव के निर्देश पर क्षेत्र में 'पीडीए पंचायत' और विभिन्न कार्यक्रमों के जरिए बड़े पैमाने पर जनसंपर्क किया जा रहा है, जिससे विपक्षी खेमे में हलचल तेज है.
जातीय समीकरण
मनकापुर भले ही एक दलित बाहुल्य सुरक्षित सीट है. लेकिन यहां हार-जीत की चाबी सवर्ण मतदाताओं, खासकर ब्राह्मणों के हाथ में होती है. भाजपा की जीत का मुख्य आधार दलित उम्मीदवार के अपने व्यक्तिगत वोट के साथ ब्राह्मण, क्षत्रिय और गैर-यादव ओबीसी वोटों का एकमुश्त जुड़ना रहा है.
क्षेत्र के एक अनुमानित जातीय समीकरण पर नजर डालें तो:
ब्राह्मण: लगभग 80,000
दलित: लगभग 65,000
क्षत्रिय: लगभग 25,000
यादव: लगभग 30,000
मुस्लिम व अन्य ओबीसी: लगभग 30,000
अन्य छोटी जातियां: लगभग 40,000
क्या कहते हैं स्थानीय पत्रकार? क्या बदलेगा माहौल?
मनकापुर की जमीनी हकीकत को लेकर जब स्थानीय पत्रकारों से बात की गई, तो दिलचस्प पहलू सामने आए. पत्रकारों का मानना है कि यदि भाजपा दोबारा रमापति शास्त्री पर भरोसा जताती है, तो उनकी सौम्य छवि और जनता से सीधा जुड़ाव पार्टी को बढ़त दिला सकता है.विशेष रूप से नवाबगंज का इलाका उनका गृह क्षेत्र है, जहां लोग जाति-बिरादरी से ऊपर उठकर शास्त्री जी के साथ खड़े होते हैं.
हालांकि, 2027 की राह में भाजपा के लिए कुछ चुनौतियां भी हैं:
उम्र का तकाजा: रमापति शास्त्री की ढलती उम्र को देखते हुए मुमकिन है कि भाजपा किसी नए चेहरे को मैदान में उतार दे.
सपा की मजबूत घेराबंदी: विभिन्न मुद्दों को लेकर यदि सवर्ण या अन्य वर्गों में थोड़ी भी नाराजगी रही, तो उसका सीधा फायदा सपा को मिल सकता है.
बसपा का फैक्टर: मायावती द्वारा आगामी चुनाव अकेले (इंडिविजुअल) लड़ने के एलान के बाद सुरक्षित सीट होने के नाते दलित वोटों में बिखराव तय है, जिससे मुकाबला त्रिकोणीय और बेहद कांटे का हो जाएगा.
निश्चित रूप से, मनकापुर की धरती पर 2027 की सियासी बिसात बिछ चुकी है, जहां राजघरानों की प्रतिष्ठा और जमीनी आक्रोश के बीच मुकाबला बेहद दिलचस्प होने वाला है.
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