UP News: उत्तर प्रदेश की सियासी जमीन पर एक बार फिर हलचल तेज हो गई है. आजमगढ़ से सांसद और समाजवादी पार्टी (सपा) के प्रमुख अखिलेश यादव के भाई धर्मेंद्र यादव ने शनिवार, 22 फरवरी को बदायूं में एक ऐसा बयान दिया, जिसने 2027 के विधानसभा चुनाव की तैयारियों को लेकर सियासी गलियारों में चर्चा छेड़ दी. धर्मेंद्र ने साफ शब्दों में कहा, "2027 का चुनाव केंद्र का नहीं, उत्तर प्रदेश का चुनाव है. इसका नेतृत्व सिर्फ और सिर्फ अखिलेश यादव को करना है. कांग्रेस के लोग हमारे सहयोगी हैं. मुझे उम्मीद है कि जैसे शानदार गठबंधन हमारा लोकसभा चुनाव में चला, वैसे ही उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में भी चलेगा."
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सपा का दम, अखिलेश का नेतृत्व
धर्मेंद्र यादव का यह बयान संकेत देता है कि पार्टी 2027 के यूपी विधानसभा चुनाव को अपनी ताकत का असली इम्तिहान मान रही है. 2024 के लोकसभा चुनाव में सपा-कांग्रेस गठबंधन ने उत्तर प्रदेश में शानदार प्रदर्शन करते हुए भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) को कड़ी टक्कर दी थी. सपा ने 37 सीटें जीतीं, जबकि कांग्रेस ने 6 सीटों पर कब्जा जमाया. इस जीत ने अखिलेश यादव को न केवल यूपी में विपक्ष के सबसे बड़े चेहरे के रूप में स्थापित किया, बल्कि इंडिया गठबंधन के भीतर उनकी स्थिति को भी मजबूत किया.
अब धर्मेंद्र यादव के बयान से साफ है कि सपा इस सफलता को 2027 में विधानसभा की सत्ता तक ले जाने के लिए प्रतिबद्ध है.
धर्मेंद्र का यह कहना कि "नेतृत्व सिर्फ और सिर्फ अखिलेश यादव को करना है," सपा के भीतर और बाहर एक संदेश है. यह न केवल पार्टी कार्यकर्ताओं को एकजुट करने की कोशिश है, बल्कि सहयोगी दलों, खासकर कांग्रेस को यह भी बताने का प्रयास है कि यूपी में सपा ही गठबंधन की धुरी होगी.
कांग्रेस के साथ गठबंधन मजबूरी या रणनीति?
धर्मेंद्र ने कांग्रेस को "सहयोगी" बताकर गठबंधन की निरंतरता पर भरोसा जताया, लेकिन उनके बयान में एक छिपा हुआ संदेश भी है. 2024 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस ने सपा के साथ मिलकर बेहतर तालमेल दिखाया था, लेकिन हाल के विधानसभा उपचुनावों में सीट बंटवारे को लेकर दोनों दलों के बीच तनाव की खबरें भी सामने आई थीं. कांग्रेस ने जहां उपचुनाव में पांच सीटों की मांग की थी, वहीं सपा ने उसे महज दो सीटें दीं, जिससे गठबंधन में दरार की अटकलें लगाई जाने लगी थीं. हालांकि, धर्मेंद्र का बयान इस बात का संकेत है कि सपा कांग्रेस को साथ लेकर चलने को तैयार है, बशर्ते नेतृत्व पर उसका दावा बरकरार रहे.
कांग्रेस के लिए यूपी में सपा के साथ गठबंधन एक मजबूरी भी है और रणनीति भी. 2022 के विधानसभा चुनाव में पार्टी का प्रदर्शन बेहद खराब रहा था, जहां उसे सिर्फ दो सीटें मिली थीं. ऐसे में सपा के बिना कांग्रेस का यूपी में पैर जमाना मुश्किल है. लेकिन धर्मेंद्र के बयान से यह सवाल भी उठता है कि क्या कांग्रेस अखिलेश के नेतृत्व को पूरी तरह स्वीकार करेगी, या फिर वह 2027 तक अपनी संगठनात्मक ताकत बढ़ाकर सौदेबाजी की स्थिति में आने की कोशिश करेगी?
क्या है बीजेपी के लिए चुनौती?
धर्मेंद्र यादव का बयान बीजेपी के लिए भी एक चेतावनी के रूप में दिखा जा रहा है. 2024 के लोकसभा चुनाव में यूपी में बीजेपी को 33 सीटों पर संतोष करना पड़ा था, जो 2019 के 62 के मुकाबले एक बड़ा झटका था. सपा-कांग्रेस गठबंधन ने न केवल बीजेपी के वोट बैंक में सेंध लगाई, बल्कि पिछड़े, दलित और अल्पसंख्यक (पीडीए) वोटों को एकजुट करने में भी सफलता हासिल की. अब अगर यह गठबंधन 2027 में भी इसी तरह मजबूती से मैदान में उतरता है, तो मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के लिए सत्ता बचाना आसान नहीं होगा.
हालांकि, बीजेपी भी खामोश नहीं बैठेगी. पार्टी ने हाल के उपचुनावों में 10 में से 8 सीटें जीतकर अपनी ताकत दिखाई है. इसके अलावा, बीजेपी ओबीसी और हिंदुत्व के अपने पुराने फॉर्मूले को और धार देने की कोशिश कर सकती है. लेकिन सपा का पीडीए (पिछड़ा, दलित, अल्पसंख्यक) फॉर्मूला और अखिलेश की रणनीति बीजेपी के लिए बड़ी चुनौती बनकर उभर रही है.
फिलहाल, धर्मेंद्र के बयान ने यूपी की सियासत में गर्माहट ला दी है. 2027 का चुनाव भले ही अभी दो साल दूर हो, लेकिन सपा और अखिलेश यादव ने अपनी मंशा साफ कर दी है- यूपी की सत्ता पर कब्जा, और वह भी अखिलेश के नेतृत्व में. अब गेंद कांग्रेस और बीजेपी के पाले में है. आने वाले दिन बताएंगे कि यह सियासी जंग किस ओर जाती है.
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