Mood kya hai Etah: एटा में बढ़ सकती है बीजेपी की मुश्किलें? पत्रकारों ने बता दिया सभी सीटों का हाल

देवेश सिंह

• 01:19 PM • 09 Aug 2026

2027 विधानसभा चुनाव से पहले एटा की चारों सीटों पर सियासी समीकरण बदलते दिख रहे हैं. बीजेपी की एंटी-इंकंबेंसी, सपा का PDA दांव, जातीय समीकरण और स्थानीय मुद्दे मुकाबले को कांटे का बना रहे हैं.

Mood kya hai Etah

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Mood kya hai Etah: साल 2017 और 2022 के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनावों में एटा जनपद की चारों सीटों (एटा सदर, मारहरा, जलेसर और अलीगंज) पर भारतीय जनता पार्टी (BJP) ने क्लीन स्वीप किया था. हालांकि 2024 के लोकसभा चुनाव में समीकरण पूरी तरह बदल गए. जब समाजवादी पार्टी (SP) ने बीजेपी के दिग्गज नेता राजवीर सिंह उर्फ राजू भैया को एटा लोकसभा सीट से शिकस्त दी. अब सवाल यह है कि 2027 में होने वाले विधानसभा चुनावों में जनता का मूड किस करवट बैठेगा? एटा के वरिष्ठ और दिग्गज पत्रकारों के अनुसार, 10 साल की सत्ता की एंटी-इंकंबेंसी, विधायकों से स्थानीय नाराजगी, जंतर-मंतर पर हालिया आंदोलनों से बना माहौल और अखिलेश यादव की पीडीए सोशल इंजीनियरिंग के चलते 2027 में बीजेपी के लिए एटा की कोई भी सीट आसान नहीं रहने वाली है.

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1. एटा सदर विधानसभा: एंटी-इंकंबेंसी और टिकट बदलाव की चर्चा

एटा सदर सीट पर लगातार दो बार से बीजेपी के विपिन वर्मा डेविड विधायक हैं, जिनका परिवार लंबे समय से राजनीति में है.

समीकरण और स्थिति: 2012 में इस सीट पर सपा ने जीत दर्ज की थी, लेकिन 2017 से यह बीजेपी के पास है. पत्रकारों के मुताबिक, लगातार दो बार से सत्ता में होने के कारण विधायक के प्रति कुछ स्थानीय नाराजगी और एंटी-इंकंबेंसी देखने को मिल रही है.

फैक्टर: वर्तमान में नीट विरोध प्रदर्शनों और अन्य जन-मुद्दों पर अखिलेश यादव की सक्रियता से बीजेपी के पक्ष वाले माहौल में कुछ कमी आई है. बीजेपी यहां टिकट बदलने या बहुत माथापच्ची के बाद उम्मीदवार उतारने की रणनीति बना सकती है. वहीं सपा के प्रत्याशी का चेहरा ही इस सीट का सबसे बड़ा टर्निंग पॉइंट साबित होगा.

2. मारहरा विधानसभा: लोधी बाहुल्य सीट पर सपा का 'पीडीए' दांव

मारहरा सीट से बीजेपी के वीरेंद्र लोधी दो बार से विधायक हैं और उन्होंने क्षेत्र में विकास कार्य भी कराए हैं. लेकिन इस बार मुकाबला बेहद कड़ा होने की उम्मीद है.

समीकरण और स्थिति: नए परिसीमन के बाद मारहरा लोधी बाहुल्य सीट बन चुकी है. 2024 के लोकसभा चुनाव में सपा ने यादव-मुस्लिम से इतर अन्य जातियों को जोड़कर सफलता हासिल की थी.

फैक्टर: चर्चा है कि सपा इस बार मारहरा सीट से किसी लोधी प्रत्याशी को ही मैदान में उतार सकती है. अगर ऐसा होता है, तो बीजेपी के बेस वोट बैंक में सेंधमारी हो सकती है. हालांकि योगी सरकार की जीरो टॉलरेंस नीति और भयमुक्त समाज का नैरेटिव बीजेपी के पक्ष में मजबूत ढाल बना हुआ है.

3. जलेसर विधानसभा (सुरक्षित सीट): लोकल बनाम बाहरी का मुद्दा

जलेसर एक आरक्षित (सुरक्षित) विधानसभा सीट है जहां बीजेपी के संजीव दिवाकर विधायक हैं.

समीकरण और स्थिति: यहां सवर्ण (ठाकुर, ब्राह्मण), लोधी, यादव और दलित वोट बैंक हार-जीत तय करते हैं. विधायक संजीव दिवाकर के स्थानीय होने और लगातार जनता के बीच रहने का फायदा उन्हें मिलता रहा है.

फैक्टर: पत्रकारों का मानना है कि आरक्षित सीट होने के कारण सपा के स्थानीय सांगठनिक जुड़ाव और बसपा के कैडर वोट बैंक के रुझान पर जीत निर्भर करेगी. सपा के उम्मीदवार की सक्रियता कम रहने पर बीजेपी की स्थिति यहां मजबूत नजर आती है.

4. अलीगंज विधानसभा: शाक्य-ठाकुर-यादव वोटों का भारी प्रभाव

अलीगंज विधानसभा क्षेत्र को राजनीतिक रूप से सबसे क्रिटिकल माना जा रहा है.

समीकरण और स्थिति: इस सीट पर यादव, ठाकुर (राजपूत) और शाक्य वोट बैंक बहुत ज्यादा प्रभाव रखता है. वर्तमान में बीजेपी के सत्यपाल सिंह राठौर विधायक हैं, जिन्होंने क्षेत्र में काफी विकास कार्य कराए हैं.

फैक्टर: 2024 के लोकसभा चुनाव में एटा से देवेश शाक्य को टिकट देकर सपा ने बीजेपी के पारंपरिक शाक्य वोट बैंक में बड़ी सेंध लगाई थी. चर्चा है कि सपा इस बार पूर्व सांसद प्रत्याशी डॉ. नवल किशोर शाक्य की पत्नी या किसी अन्य मजबूत जातीय चेहरे को उतार सकती है. अलीगंज में विधायक के खिलाफ स्थानीय नाराजगी और शाक्य वोटों का झुकाव बीजेपी के लिए चिंता का विषय बन सकता है.

2027 के चुनाव पर असर डालने वाले प्रमुख बड़े मुद्दे

धनगर और शाक्य समाज का रुख: एटा जिले में शाक्य और धनगर समाज की बड़ी आबादी है. शाक्य वोट बैंक का झुकाव सपा की तरफ दिखने लगा है, वहीं धनगर समाज एससी प्रमाणपत्र (SC Certificate) की मांग को लेकर नाराजगी जता रहा है. ये दोनों समाज चारों सीटों पर निर्णायक भूमिका निभाएंगे.

योगी सरकार का लॉ एंड ऑर्डर और बुलडोजर एक्शन: मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की सख्त कानून व्यवस्था, अपराधियों के खिलाफ एनकाउंटर और बुलडोजर कार्रवाई को लेकर जनता में एक सकारात्मक माहौल है. सुशासन और क्राइम कंट्रोल का यह मुद्दा बीजेपी के लिए सबसे बड़ा प्लस पॉइंट है.

सपा का पीडीए कार्ड और सोशल इंजीनियरिंग: सपा अब केवल पारंपरिक यादव-मुस्लिम समीकरण पर निर्भर न रहकर गैर-यादव ओबीसी और अन्य वर्गों को साध रही है जो 2024 के चुनाव में कारगर साबित हुआ था.

एटा की चारों विधानसभा सीटों पर 2027 का चुनाव बेहद दिलचस्प और 'नेक-टू-नेक' (कांटे की टक्कर) होने वाला है. जहां बीजेपी अपने लॉ एंड ऑर्डर, बुलडोजर मॉडल और राष्ट्रवाद के मुद्दे पर चुनावी मैदान में उतरेगी. वहीं समाजवादी पार्टी अपने 'पीडीए' दांव और स्थानीय एंटी-इंकंबेंसी का फायदा उठाकर अपना पुराना गढ़ वापस पाने की पुरजोर कोशिश करेगी.