Kasganj Sadar election 2027: उत्तर प्रदेश की राजनीति में कासगंज सदर विधानसभा सीट एक ऐसी सीट मानी जाती है जहां जीत-हार का फैसला कोई एक तरफा हवा या लहर नहीं करती. यहां का नतीजा तय करते हैं स्थानीय मुद्दे, जातीय समीकरण और प्रत्याशी की धरातल पर पकड़. लोध-राजपूत और शाक्य मतदाताओं के दबदबे वाली इस सीट पर गैर-यादव ओबीसी वोट बैंक को नतीजों का रुख मोड़ने वाला माना जाता है.
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2017 और 2022 के चुनावों में लगातार जीत दर्ज कर चुकी भारतीय जनता पार्टी जहां 2027 में जीत की हैट्रिक लगाने के दावे कर रही है. वहीं 2012 के बाद से जीत का इंतजार कर रही समाजवादी पार्टी पीडीए और नए समीकरणों के सहारे वापसी की जुगत में है. यूपी Tak के खास शो यूपी किसका में आज हम टटोलेंगे कासगंज सदर का पूरा सियासी गणित.
जनसंघ-बीजेपी का गढ़ और मुलायम-मानपाल का दौर
कासगंज सदर का राजनीतिक इतिहास बेहद दिलचस्प रहा है.
शुरुआती दौर: आजादी के बाद 1952 के पहले चुनाव में कांग्रेस के कालीचरण अग्रवाल विधायक बने. लेकिन बाद में यह सीट जनसंघ और बीजेपी के मजबूत गढ़ के रूप में उभरी. बीजेपी के नेताराम सिंह वर्मा यहाँ से सबसे ज्यादा बार विधायक रहे.
सपा और पूर्व मंत्री मानपाल सिंह: पूर्व मंत्री मानपाल सिंह वर्मा ने कांग्रेस और समाजवादी पार्टी के टिकट पर चुनाव जीतकर क्षेत्र में अपनी मजबूत पहचान बनाई.
पिछले तीन चुनावों का रिपोर्ट कार्ड
2012: सपा के मानपाल सिंह ने बीएसपी के हसरत उल्ला शेरवानी को करीब 10,000 वोटों से हराकर जीत दर्ज की.
2017: बीजेपी के देवेंद्र सिंह राजपूत ने करीब 1,01,000 वोट हासिल कर सपा के हसरत उल्ला शेरवानी को 52,000 से अधिक वोटों से हराया.
2022: बीजेपी के देवेंद्र सिंह राजपूत ने फिर जीत दर्ज की और सपा उम्मीदवार मानपाल सिंह को मात दी.
बीजेपी का डबल इंजन विकास का दावा बनाम सपा का 'पीडीए' कार्ड
2027 के चुनाव को लेकर दोनों मुख्य दलों के दावे एक-दूसरे से काफी अलग हैं.
बीजेपी की तैयारी: पार्टी नेताओं का कहना है कि 9 वर्षों में शत-प्रतिशत गांवों में विद्युतीकरण, सड़कों का जाल, स्टेडियम और स्कूलों का विकास हुआ है. डबल इंजन सरकार की जनकल्याणकारी योजनाओं और मजबूत बूथ प्रबंधन के दम पर बीजेपी इस सीट पर प्रचंड बहुमत से हैट्रिक लगाने के लिए आश्वस्त है.
सपा की रणनीति
सपा जिलाध्यक्ष का दावा है कि एटा-कासगंज लोकसभा सीट से देवेश शाक्य के सांसद बनने के बाद शाक्य समाज और गैर-यादव ओबीसी का बड़ा हिस्सा सपा से जुड़ा है. पार्टी हारे हुए सेक्टर्स और बूथों पर पीडीए की स्ट्रेटेजी के तहत काम कर रही है जिससे 2027 में सपा की जीत तय होगी.
कासगंज सदर सीट का जातीय समीकरण
कासगंज सदर को मुख्यतः लोधी बाहुल्य सीट माना जाता है. यहां का अनुमानित जातीय गणित कुछ इस प्रकार है.
लोधी राजपूत: 25%
मुस्लिम: 12%
ठाकुर/राजपूत: 12%
ब्राह्मण: 10%
शाक्य: 8%
जाटव (दलित): 8%
यादव: 5%
धीमर/प्रजापति: 4%
पाल/बघेल: 3%
तेली/वैश्य: 2%
अन्य जातियां: 11%
क्या कहते हैं स्थानीय पत्रकार?
स्थानीय पत्रकारों का मानना है कि कासगंज सदर सीट पर हमेशा से ही लोधी प्रत्याशियों का वर्चस्व रहा है. 1993 में बीजेपी के दिग्गज नेता कल्याण सिंह ने भी यहां से चुनाव जीता था. हालांकि हालिया लोकसभा चुनाव में समाजवादी पार्टी द्वारा शाक्य प्रत्याशी (देवेश शाक्य) पर खेला गया दांव सफल रहा था.
विश्लेषकों का कहना है कि अखिलेश यादव की नजर बीजेपी के पारंपरिक लोधी और शाक्य वोट बैंक में सेंध लगाने पर है. यदि 2027 के चुनाव में सपा किसी मजबूत लोधी या शाक्य चेहरे पर दांव लगाती है तो बीजेपी को एकतरफा जीत के बजाय बेहद कड़े और नजदीकी मुकाबले का सामना करना पड़ सकता है.
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