Opinion: 23 दिन. 118 विधानसभा क्षेत्र. सैकड़ों सभाएं. लगातार सोशल मीडिया प्रचार, लेकिन फिर भी उत्तर प्रदेश में कहीं वैसा जनआंदोलन जैसा माहौल क्यों नहीं बन पाया, जैसा स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद की गविष्ठि यात्रा के समर्थक शुरुआत में दावा कर रहे थे? यह सवाल अब केवल राजनीतिक गलियारों में ही नहीं, बल्कि आम लोगों के बीच भी तेजी से उठने लगा है. यात्रा लगातार आगे बढ़ रही है, लेकिन उसके साथ स्वतःस्फूर्त जनसमर्थन का विस्तार वैसा दिखाई नहीं दे रहा, जैसा किसी बड़े सामाजिक या धार्मिक आंदोलन में सामान्यतः देखने को मिलता है.
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गविष्ठि यात्रा फिलहाल प्रयागराज में है और इस यात्रा के 23 दिन पूरे हो चुके हैं और अब तक 118 विधानसभा क्षेत्रों का दौरा किया जा चुका है. लेकिन सबसे दिलचस्प बात यह है कि यात्रा के दौरान सबसे ज्यादा चर्चा किसकी हो रही है? गौशालाओं की? गोपालन की? किसानों की? प्राकृतिक खेती की? या फिर लगातार राजनीतिक टकराव, सरकार पर हमले और मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ पर अप्रत्यक्ष निशानों की?
यदि यह यात्रा वास्तव में गोमाता और गोरक्षा के लिए है, तो फिर अब तक कितनी प्रमुख गौशालाओं का औपचारिक दौरा हुआ? कितने गोपालकों के बीच बैठकर उनकी समस्याओं पर चर्चा की गई? कितनी सभाओं में उत्तर प्रदेश की गोसेवा योजनाओं, डीबीटी मॉडल, प्राकृतिक खेती या गोआधारित अर्थव्यवस्था पर विस्तार से बात हुई? और सबसे बड़ा सवाल, आखिर यात्रा का केंद्र गाय क्यों नहीं दिखाई दे रही?
जमीन पर जो तस्वीर उभर रही है, उसमें आम ग्रामीणों और किसानों की तुलना में स्थानीय राजनीतिक कार्यकर्ताओं की मौजूदगी ज्यादा दिखाई देती है. कई जिलों में समाजवादी पार्टी और कांग्रेस से जुड़े स्थानीय नेता स्वागत, मंच प्रबंधन और भीड़ जुटाने में सक्रिय दिखे. प्रयागराज में तो कांग्रेस से जुड़े मुस्लिम भी गविष्ठि यात्रा में शामिल हुए, लेकिन आम जनता का स्वतःस्फूर्त जुड़ाव सीमित नजर आया. यही कारण है कि अब यह धारणा तेजी से बन रही है कि गविष्ठि यात्रा का सबसे बड़ा आधार वास्तविक जनलहर नहीं, बल्कि राजनीतिक नेटवर्क और डिजिटल एम्प्लिफिकेशन बनता जा रहा है.और यही स्थिति लोगों को बिहार विधानसभा चुनाव 2025 की याद दिला रही है.
बिहार में भी स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद ने कथित 'गौ-भक्त उम्मीदवार' मॉडल के जरिए बड़ा राजनीतिक-सामाजिक प्रयोग करने की कोशिश की थी. करीब 198 निर्दलीय उम्मीदवारों को समर्थन मिला. पूरा नैरेटिव बनाया गया कि गौ-रक्षा नया चुनावी मुद्दा बनेगा. लेकिन परिणाम क्या रहा? एक भी सीट नहीं आई. लगभग सभी उम्मीदवारों की जमानत जब्त हो गई. कुल मिलाकर 5-6 लाख वोट जरूर मिले, लेकिन कोई जनलहर नहीं बनी.
सोशल मीडिया पर यात्रा को जिस तरह प्रोजेक्ट किया जा रहा है, वह भी अब सवालों के घेरे में आने लगा है. भाषणों के छोटे-छोटे क्लिप, सरकार पर हमले, 'सच्चा सनातनी कौन' जैसे संवाद और टकराव वाले हिस्से लगातार वायरल किए जा रहे हैं. लेकिन जमीन पर यात्रा के वीडियो और सभाओं की वास्तविक तस्वीरों में वैसी भारी भीड़ या आंदोलनकारी ऊर्जा दिखाई नहीं देती. इससे यह सवाल और गहरा हो गया है कि क्या डिजिटल दुनिया में गविष्ठि यात्रा की ऐसी छवि बनाई जा रही है, जो वास्तविक जनसमर्थन से कहीं बड़ी दिखाई दे?
राजनीतिक जानकारों का मानना है कि किसी भी बड़े जनआंदोलन की पहचान केवल सोशल मीडिया नहीं होती. उसका असर गांवों, किसानों, सामाजिक संगठनों और सामान्य जनता के बीच स्वतः दिखाई देता है. लेकिन गविष्ठि यात्रा के 23 दिन बाद भी वैसी जनचेतना या सामाजिक उबाल नहीं दिखाई दे रहा, जिसकी अपेक्षा की जा रही थी.
इसके पीछे एक बड़ी वजह यात्रा का लगातार राजनीतिक स्वर भी माना जा रहा है. मंचों पर गोसेवा की तुलना में राजनीतिक संदेश ज्यादा दिखाई देते हैं. मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ पर अप्रत्यक्ष टिप्पणियां और विपक्षी नेटवर्क की सक्रियता ने यात्रा को धार्मिक से ज्यादा राजनीतिक फ्रेम में ला खड़ा किया है. अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि यदि यह यात्रा वास्तव में गोमाता के लिए है, तो फिर उसका सबसे बड़ा असर गौशालाओं, गोपालकों और किसानों के बीच क्यों नहीं दिख रहा? और यदि 118 विधानसभा क्षेत्रों के बाद भी जनता स्वतः बड़ी संख्या में नहीं जुड़ रही, तो क्या यह मान लिया जाए कि लोगों ने यात्रा के वास्तविक राजनीतिक स्वर को समझ लिया है?
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