Opinion: स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती की 'गविष्ठि यात्रा' अब अपने 19वें दिन में पहुंच चुकी है. पूर्वांचल और अवध क्षेत्र की 90 से अधिक विधानसभा सीटों को कवर कर चुकी यह यात्रा फिलहाल अमेठी में है. लेकिन यात्रा के विस्तार के साथ अब एक नई राजनीतिक चर्चा तेजी से आकार ले रही है, क्या बिहार विधानसभा चुनाव 2025 की तर्ज पर उत्तर प्रदेश में भी कोई नया चुनावी प्रयोग तैयार किया जा रहा है?
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यह सवाल इसलिए उठ रहा है क्योंकि यात्रा के लगभग हर पड़ाव पर समाजवादी पार्टी और कांग्रेस से जुड़े जिला स्तरीय नेता, पूर्व प्रत्याशी, स्थानीय पदाधिकारी और दूसरी-तीसरी पंक्ति के क्षेत्रीय चेहरे सबसे ज्यादा सक्रिय दिखाई दे रहे हैं. दिलचस्प बात यह है कि विपक्ष के बड़े चेहरे इस यात्रा से दूरी बनाए हुए हैं, लेकिन जिलास्तर के नेता लगातार अविमुक्तेश्वरानंद के मंच पर नजर आ रहे हैं.
बिहार मॉडल ने बढ़ाई राजनीतिक हलचल
राजनीतिक चर्चाओं के केंद्र में बिहार विधानसभा चुनाव 2025 का वह प्रयोग है, जिसमें स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद ने 'गौ-भक्त उम्मीदवार' मॉडल के तहत करीब 198 निर्दलीय प्रत्याशियों को समर्थन दिया था. भले ही एक भी सीट नहीं आई और लगभग सभी की जमानत जब्त हो गई, लेकिन कुल मिलाकर 5 से 6 लाख वोट जरूर मिले. राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यही वह बिंदु है जिसने यूपी की राजनीति में नई आशंकाओं को जन्म दिया है. क्योंकि उत्तर प्रदेश में अब अविमुक्तेश्वरानंद 403 विधानसभा क्षेत्रों तक पहुंचने की कोशिश कर रहे हैं. ऐसे में यह सवाल स्वाभाविक हो गया है कि क्या भविष्य में तथकथित 'गौ-भक्त' या 'सनातन समर्थक' उम्मीदवारों के नाम पर कुछ क्षेत्रों में ऐसे प्रत्याशी उतारे जा सकते हैं जो मुख्य मुकाबले को प्रभावित करें?
'वोट कटवा' राजनीति की आशंका क्यों?
उत्तर प्रदेश की राजनीति में हिंदुत्व और गोरक्षा लंबे समय से भाजपा का मजबूत वैचारिक आधार माने जाते हैं. राजनीतिक पर्यवेक्षकों का कहना है कि यदि किसी क्षेत्र में 'गोरक्षा' या 'सनातन' के नाम पर निर्दलीय उम्मीदवार उतारे जाते हैं, तो उनका सीधा असर भाजपा के पारंपरिक वोट बैंक पर पड़ सकता है, भले ही वे चुनाव न जीतें. यही कारण है कि अब यह चर्चा तेज हो रही है कि क्या विपक्षी दलों के कुछ स्थानीय नेता स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद के मंच को भविष्य की 'वोट मैनेजमेंट स्ट्रेटजी' के रूप में देख रहे हैं?
जिलास्तर के नेताओं की सक्रियता ने बढ़ाए सवाल
यात्रा के विभिन्न चरणों में जिन नेताओं की सक्रियता सामने आई, उसने इन चर्चाओं को और हवा दी है. गोरखपुर में यात्रा की शुरुआत के दौरान विनय शंकर तिवारी से मुलाकात चर्चा में रही. कुशीनगर में पूर्व सपा मंत्री राधेश्याम सिंह सक्रिय दिखे. देवरिया में कांग्रेस से जुड़े वशिष्ठ गोस्वामी और सपा नेता मुरली मनोहर जायसवाल यात्रा से जुड़े रहे. बलिया में सपा नेता संजय उपाध्याय, अनिल राय और कांग्रेस नेता ओमप्रकाश पांडे प्रमुख भूमिका में दिखाई दिए. मऊ में सपा जिलाध्यक्ष दूधनाथ यादव और कांग्रेस प्रवक्ता रमन पांडे सक्रिय रहे, जबकि गाजीपुर में कांग्रेस जिलाध्यक्ष सुनील राम और सपा नेता मुन्नन यादव यात्रा आयोजन से जुड़े नजर आए. राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह केवल धार्मिक श्रद्धा का मामला नहीं लगता. क्योंकि जिन नेताओं की मौजूदगी सबसे ज्यादा दिख रही है, उनमें से अधिकांश वे चेहरे हैं जो स्थानीय स्तर पर राजनीतिक महत्वाकांक्षा रखते हैं और भविष्य में टिकट या प्रभाव की तलाश में रहते हैं.
मोदी-योगी विरोधी इन्फ्लुएंसर्स और राजनीतिक कंटेंट क्रिएटर्स का भी मिल रहा साथ
यात्रा को लेकर एक और दिलचस्प पहलू यह भी सामने आ रहा है कि सोशल मीडिया पर सक्रिय कुछ मोदी-योगी विरोधी इन्फ्लुएंसर्स और राजनीतिक कंटेंट क्रिएटर्स भी लगातार अविमुक्तेश्वरानंद की यात्रा को एम्पलिफाई कर रहे हैं. यात्रा के भाषणों के छोटे-छोटे क्लिप, मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ पर अप्रत्यक्ष हमलों वाले बयान और ‘सच्चा सनातनी कौन’ जैसे संवाद तेजी से उन्हीं नेटवर्क्स द्वारा वायरल किए जा रहे हैं जो सामान्यतः भाजपा और हिंदुत्व राजनीति के खिलाफ आक्रामक नैरेटिव चलाते रहे हैं. सवाल उठने लगा है कि आखिर अविमुक्तेश्वरानंद की यात्रा को सबसे ज्यादा डिजिटल समर्थन उन्हीं समूहों से क्यों मिल रहा है जो लंबे समय से मोदी-योगी विरोधी नैरेटिव खड़ा करते रहे हैं.
क्या अविमुक्तेश्वरानंद नया राजनीतिक स्पेस बना रहे हैं?
अब यह सवाल भी उठ रहा है कि आखिर स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद की यात्राओं का केंद्र उत्तर प्रदेश ही क्यों बन रहा है? पश्चिम बंगाल, केरल या तमिलनाडु जैसे राज्यों में उनकी यात्राएं नहीं हुईं, जबकि यूपी में लगातार विधानसभा-वार यात्रा चल रही है. राजनीतिक हलकों में इसे 'सॉफ्ट हिंदुत्व स्पेस' की नई लड़ाई के रूप में भी देखा जा रहा है. खासकर ऐसे समय में जब मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ पहले से हिंदुत्व और गोरक्षा के सबसे प्रभावशाली चेहरों में गिने जाते हैं.
मंचों पर गाय कम, राजनीति ज्यादा?
यात्रा को लेकर एक और बड़ा सवाल यह है कि अब तक 90 से अधिक विधानसभा क्षेत्रों का दौरा करने के बावजूद अविमुक्तेश्वरानंद ने गोआश्रय स्थलों, गोपालन योजनाओं या सरकार की गोसेवा नीतियों पर बहुत कम चर्चा की है. इसके बजाय मंचों पर मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ पर अप्रत्यक्ष हमले, 'सच्चा सनातनी कौन?' जैसे बयान और राजनीतिक संकेत ज्यादा दिखाई देते हैं. यही वजह है कि अब यह धारणा मजबूत होती जा रही है कि गविष्ठि यात्रा केवल धार्मिक जनजागरण नहीं, बल्कि भविष्य की राजनीतिक जमीन तैयार करने का प्रयास भी हो सकती है.
सबसे बड़ा सवाल
अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या विपक्षी दलों के स्थानीय नेता स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद के मंच को भविष्य की चुनावी रणनीति के रूप में देख रहे हैं? और क्या बिहार में उनके तथाकथित 'गौ-भक्त उम्मीदवार' मॉडल के बाद उत्तर प्रदेश में भी ऐसा कोई प्रयोग दोहराने की तैयारी चल रही है? फिलहाल यह केवल राजनीतिक चर्चाएं और आशंकाएं हैं, लेकिन जिस तरह से जिलास्तर का विपक्षी नेटवर्क स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद के साथ लगातार सक्रिय दिखाई दे रहा है, उसने इन सवालों को और गंभीर बना दिया है.
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