UP DGP Brijlal News: अगर बिना लाग-लपेट मुझे अपनी बात कहनी हो तो पहले मैं पूछूंगा- क्यों, मुख्यमंत्री के तार्किक बयान का आखिर विरोध क्यों? क्या इस देश में नागरिक अधिकारों की रक्षा नहीं की जाएगी और कौन सा कानून यह अधिकार देता है कि सड़कों पर नमाज पढ़ी जाए? मैंने लंबे समय तक पुलिस अधिकारी का दायित्व निभाया है और कानून व्यवस्था की हजारों स्थितियां देखी हैं. इसलिए यह कहने में मुझे रंच मात्र भी हिचक नहीं कि सार्वजनिक सड़कों पर नमाज का मुद्दा न तो धर्म का है, न आस्था का, यह विशुद्ध रूप से कानून-व्यवस्था, अनुशासन और राज्य की संप्रभुता का प्रश्न है. मैं उत्तर प्रदेश सरकार और विशेष तौर पर मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ का धन्यवाद करना चाहूंगा, जिन्होंने धर्म के नाम पर होने वाली अराजकता पर अंकुश लगाया. उन्होंने जो रुख अपनाया है, वह न केवल संवैधानिक दृष्टि से सही है, बल्कि किसी भी सभ्य और विधि-सम्मत समाज को यह रुख अपनाना ही चाहिए.
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वोटबैंक की राजनीति में विरोध
तुष्टिकरण की राजनीति करनेवालों के बारे में मेरी यह धारणा रही है कि या तो वे भ्रमित हैं या फिर अपने वोटबैंक की राजनीति में न सच्चाई देखना चाहते हैं और न संविधान या कानून. ऐसे लोग मानवीय मूल्यों की भी अनदेखी करते हैं. क्या विरोध करने वालों ने कभी सोचा है कि एक एंबुलेंस जब किसी मरीज को लेकर जा रही हो और सड़क पर सैकड़ों लोग नमाज में बैठे हों, तो उस
मरीज के परिजनों की क्या मनःस्थिति होगी? क्या उनकी पीड़ा कम महत्वपूर्ण है? क्या एक नागरिक, जो हिंदू, सिख, ईसाई या मुसलमान भी हो सकता है, जो उस सड़क से गुजरना चाहता है, उसका अधिकार किसी की सामूहिक धार्मिक गतिविधि से कमतर है? यह प्रश्न असुविधाजनक हैं, लेकिन इनका उत्तर उन्हें देना होगा जो विरोध का झंडे उठाए घूम रहे हैं.
स्वीकार नहीं तुष्टिकरण की राजनीति
भारतीय न्याय संहिता और भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता दोनों स्पष्ट हैं. सार्वजनिक मार्ग को बाधित करना एक दंडनीय अपराध है. ऐसे कार्य जो आम जनता के आवागमन में बाधा डालें, कानूनी रूप से प्रतिबंधित हैं. यह कानून किसी एक धर्म के लिए नहीं बना, यह सबके लिए है. इसका उल्लंघन करने वालों का यदि कोई राजनीतिक दल समर्थन करता है तो यह मान लिया जाना चाहिए कि इसके मूल में तुष्टिकरण ही है. किसी विशेष धर्म के लिए अलग कानून.. यह सोच ही खतरनाक है और तुष्टिकरण के ठेकेदारों का खोखलापन उजागर करती है. पूरे देश में तुष्टिकरण करने वालों को जनता ने नकारा है. पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी, तमिलनाडु में स्टालिन, बिहार में आरजेडी व महाराष्ट्र में उद्धव ठाकरे की हार में स्पष्ट संदेश निहित है कि जनता अब तुष्टीकरण, ध्रुवीकरण व परिवारवाद की राजनीति को बर्दाश्त नहीं करने वाली. वह राष्ट्रवाद के साथ खड़ी है.
अतिक्रमण को मिला था सरकारी संरक्षण
मैंने उत्तर प्रदेश में वर्षों तक पुलिस सेवा की है. मैंने देखा है कि किस प्रकार धीरे-धीरे सार्वजनिक स्थानों पर धार्मिक अतिक्रमण होता है. पहले एक छोटा समूह एक कोने में नमाज पढ़ता है, फिर संख्या बढ़ती है, फिर सड़क का एक
हिस्सा घिर जाता है, फिर पूरी सड़क. यह क्रमिक अतिक्रमण की प्रक्रिया है, जिसे प्रारंभ में ही न रोका जाए तो बाद में रोकना कठिन या असंभव जैसा हो जाता है. विडंबना यह कि उत्तर प्रदेश में पहले की सरकारों ने इस प्रवृत्ति को रोकने के बजाए, इसे संरक्षण देने का ही प्रयास किया. समाजवादी और कांग्रेस सरकारों में राष्ट्रपति भवन, प्रधानमंत्री आवास और मुख्यमंत्रियों के सरकारी बंगलों में इफ्तार पार्टियां होती थीं और नमाज़ पढ़ी जाती थी. केंद्रीय और राज्य सरकारों के मंत्रियों में रोजा इफ्तार करने की होड़ लगी रहती थी. इन लोगों के यहां हिंदू त्योहारों पर कोई समारोह आयोजित करने की कल्पना करना भी महा पाप था.
हनुमान गढ़ी के सामने इफ्तार का प्रयास
मैंने वह दिन भी देखा है जब सपा सरकार (स्व. मुलायम सिंह यादव के नेतृत्व वाली) में एक आईजी ने अयोध्या में हनुमान गढ़ी के ठीक सामने इफ्तार आयोजित करने का प्रयास किया और इसके लिए वहां के महंतजी को राजी भी कर लिया. लेकिन, एक कर्मठ, निष्ठावान आईपीएस अधिकारी जो वहां एसएसपी के रूप में तैनात थे, ने ऐसा नहीं होने दिया. अब जो लोग यह कह रहे हैं कि यह आदेश मुसलमानों को निशाना बनाने के लिए है, उनसे मैं पूछना चाहता हूं कि क्या मस्जिदें नहीं हैं? क्या ईदगाहें नहीं हैं? मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने सुझाव दिया है कि जगह की कमी है तो शिफ्टों में नमाज पढ़ें. इसमें गलत क्या है? यह एक व्यावहारिक और सम्मानजनक समाधान है. इसमें आपत्ति किसे है और क्यों है? मौलाना खालिद रशीद फरंगी महली और शिया धर्मगुरु मौलाना यासूब को तो इसमें कुछ भी गलत नहीं दिखाई देता और वह खुद मुस्लिमों से अपील कर रहे हैं कि सड़कों पर नमाज न पढ़ें. विरोध ऐसे लोगों को है, जो पूरे मुस्लिम समुदाय को अपने वोटबैंक के रूप में देखते हैं. जिन्हें इसके बहाने तुष्टिकरण की राजनीति को हवा देने का मौका मिलता है.
धर्म की स्वतंत्रता असीमित नहीं
संविधान का अनुच्छेद-25 धर्म की स्वतंत्रता देता है, लेकिन यह असीमित नहीं है. संविधान यह भी कहता है कि यह स्वतंत्रता सार्वजनिक व्यवस्था, नैतिकता और स्वास्थ्य के अधीन होगी. सड़क पर नमाज पढ़ना और यातायात बाधित करना निश्चित रूप से सार्वजनिक व्यवस्था को प्रभावित करता है. इसलिए जो लोग संविधान की दुहाई देते हैं, वे पूरा संविधान पढ़ें, केवल वह हिस्सा नहीं जो उनके एजेंडे के अनुकूल हो. ऐसे लोगों के लिए यह मुद्दा धर्म का नहीं चुनाव का है. उत्तर प्रदेश पुलिस व प्रशासन ने इस विषय में जो सख्ती दिखाई है, वह केवल कानून-व्यवस्था की बहाली नहीं है, यह एक सांकेतिक संदेश भी है कि इस राज्य में कोई भी समूह यह नहीं मान सकता कि उसके लिए कानून अलग है. यह संदेश आवश्यक है, क्योंकि जब कानून की धार कुंद पड़ती है, जब प्रशासन राजनीतिक दबाव में झुकता है, तो समाज में एक वर्ग मान लेता है कि वह कानून से ऊपर है. और जिस दिन यह धारणा बन जाती है, उस दिन से कानून-व्यवस्था की नींव हिलने लगती है. इसलिए मेरा स्पष्ट मत है कि योगी सरकार के इस निर्णय को दृढ़ता से लागू किया जाना चाहिए. कानून का राज स्थापित करना किसी के विरुद्ध नहीं होता, वह सबके पक्ष में, सबके हित में होता है. विडंबना यह है कि कुछ लोग यह जानते हुए भी इसे समझना नहीं चाहते.
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