Opinion: जाति आधारित नियुक्तियों से लेकर पीसीएस की कॉपियां नष्ट किए जाने तक... कैसे अखिलेश सरकार में भर्ती प्रक्रिया पर उठे थे गंभीर सवाल?

UP Political News: साल 2012-2017 के बीच अखिलेश सरकार में हुई सरकारी भर्तियों का पूरा विश्लेषण. यूपीपीएससी अध्यक्ष अनिल यादव विवाद, 56 एसडीएम और शिक्षामित्र मामले पर विशेष रिपोर्ट.

Akhilesh Yadav (File Photo)

यूपी तक

18 May 2026 (अपडेटेड: 18 May 2026, 06:18 PM)

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UP Political News: साल 2012 से 2017 तक उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी की सरकार रही, जिसके मुख्यमंत्री अखिलेश यादव थे. इस दौरान सबसे ज्यादा विवाद सरकारी भर्तियों को लेकर सामने आए. शिक्षा, पुलिस और प्रशासनिक सेवाओं की कई भर्तियों में धांधली, पक्षपात और नियमों की अनदेखी के आरोप लगे. विपक्ष और अभ्यर्थियों ने आरोप लगाया कि भर्ती प्रक्रिया में पारदर्शिता नहीं थी और एक विशेष वर्ग को फायदा पहुंचाया गया.

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यूपीपीएससी पर लगे पक्षपात के आरोप

भर्ती विवादों का सबसे बड़ा केंद्र उत्तर प्रदेश लोक सेवा आयोग (UPPSC) रहा. साल 2013 में आयोग के अध्यक्ष के तौर पर अनिल यादव की नियुक्ति के बाद आयोग की कार्यप्रणाली पर लगातार सवाल उठे. उनकी नियुक्ति को लेकर इलाहाबाद हाईकोर्ट में याचिका दायर हुई थी. कोर्ट ने सरकार से पूछा था कि आखिर किस आधार पर उनकी नियुक्ति की गई.

अनिल यादव के कार्यकाल में पीसीएस 2015 की प्रारंभिक परीक्षा का पेपर लीक होने का मामला सामने आया था. इसको लेकर भारी बवाल हुआ था और अभ्यर्थी कोर्ट पहुंचे थे. लेकिन मामला कोर्ट में विचाराधीन होने के बाद भी आयोग ने उत्तर पुस्तिकाओं को नष्ट कर दिया था. जिसे लेकर भारी बवाल हुआ था. आलम ये हुआ था कि लोक सेवा आयोग को तब 'एक जाति' का आयोग तक कहा गया था.

अनिल यादव का कार्यकाल इतना विवादित रहा कि इलाहाबाद हाईकोर्ट ने उनके अध्यक्ष पद की नियुक्ति को अवैध करार देते हुए रद्द कर दिया था. कोर्ट ने अनिल यादव की नियुक्ति प्रक्रिया को लेकर अखिलेश सरकार को भी फटकार लगाई थी. कोर्ट ने सपा सरकार की मंशा पर सवाल खड़े करते हुए पूछा था कि इस पद पर नियुक्ति के लिए 83 अभ्यर्थियों के आवेदन पर विचार और तुलनात्मक आंकलन क्यों नहीं किया गया. और एक व्यक्ति को एक ही दिन में कैसे चुन लिया गया. कोर्ट ने ये भी कहा कि अनिल यादव की नियुक्ति में राज्य सरकार ने सुप्रीम कोर्ट द्वारा निर्धारित मानकों का उल्लंघन किया.

चयन प्रक्रिया पर उठे गंभीर सवाल

उस समय अभ्यर्थियों के आरोपों में कहा गया कि प्रशासनिक सेवाओं की भर्तियों में एक विशेष जाति और क्षेत्र के उम्मीदवारों को अधिक लाभ मिला. आरोप ये भी लगे कि सरकार की शह पर 86 में से 56 एसडीएम केवल एक ही जाति के चुन लिए गए. इसी दौरान प्रभावशाली लोगों को फायदा पहुंचाने के आरोप भी लगे. 

रामगोपाल यादव की बहु रिचा अहलूवालियां का परीक्षा केंद्र बदलने का विवाद

पीसीएस-2013 प्रारंभिक परीक्षा में सपा नेता रामगोपाल यादव की बहू रिचा अहलूवालिया का परीक्षा केंद्र बदले जाने का मामला भी चर्चा में रहा था. दरअसल, अभ्यर्थियों की याचिका में पीसीएस-2013 की प्रारंभिक परीक्षा में सपा नेता राम गोपाल यादव की बहू रिचा का सेंटर गाजियाबाद से बदलने का आरोप लगाया गया था. पहली बार मैनपुरी और इटावा को परीक्षा केंद्र बनाकर सामूहिक नकल कराने का भी आरोप लगाया गया था. तब अभ्यर्थियों ने आरोप लगाए थे कि आयोग के अध्यक्ष अनिल यादव सपा कार्यकर्ता की तरह काम कर रहे हैं.

अखिलेश सरकार में इन भर्तियों को लेकर सबसे ज्यादा हुआ विवाद

पीसीएस और लोअर सबऑर्डिनेट भर्ती

पीसीएस और लोअर सबऑर्डिनेट भर्तियों में बड़े पैमाने पर धांधली और भ्रष्टाचार के आरोप लगे. कई अभ्यर्थियों ने चयन प्रक्रिया में पक्षपात का आरोप लगाया था. बाद में इन मामलों की जांच की मांग उठी और कुछ मामलों में जांच एजेंसियों तक मामला पहुंचा.

पुलिस भर्ती पर विवाद

उत्तर प्रदेश पुलिस में सिपाही और सब-इंस्पेक्टर भर्ती को लेकर भी जमकर विवाद हुआ. पेपर लीक, फिजिकल टेस्ट में गड़बड़ी और चयन में पक्षपात के आरोप लगे. कई बार अभ्यर्थियों ने भर्ती रद्द करने की मांग को लेकर प्रदर्शन भी किए.

शिक्षामित्र मामला

अखिलेश सरकार के दौरान करीब 1.72 लाख शिक्षामित्रों को सहायक अध्यापक के पद पर समायोजित करने का फैसला लिया गया था. यह मामला बाद में अदालत पहुंचा. साल 2017 में सुप्रीम कोर्ट ने इन नियुक्तियों को रद्द कर दिया, जिसके बाद हजारों शिक्षामित्र प्रभावित हुए.

जेई और अन्य सीधी भर्तियां

उत्तर प्रदेश अधीनस्थ सेवा चयन आयोग (UPSSSC) और कई विभागों में हुई सीधी भर्तियों में इंटरव्यू के दौरान मनमाने अंक देने और सिफारिश के आधार पर चयन करने के आरोप लगे. अभ्यर्थियों ने कई मामलों में अदालत का दरवाजा खटखटाया. इन सभी विवादों के चलते उस समय की भर्ती प्रक्रियाओं की पारदर्शिता पर लगातार सवाल उठते रहे.