Opinion: स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद की गविष्ठि यात्रा मंगलवार को अपने 17वें दिन में प्रवेश कर चुकी है. गोरखपुर से शुरू हुई यह यात्रा अब तक पूर्वांचल के 80 से अधिक विधानसभा क्षेत्रों तक पहुंच चुकी है और मंगलवार को वह अम्बेडकरनगर जिले की पांच विधानसभा क्षेत्रों में सभाएं करने पहुंचे. उनकी यात्रा जैसे-जैसे आगे बढ़ रही है, वैसे-वैसे इसके वास्तविक उद्देश्य को लेकर सवाल और तीखे होते जा रहे हैं. सबसे बड़ा सवाल यही उठ रहा है कि आखिर यह यात्रा गोसेवा के लिए है या कोई नया राजनीतिक नरेटिव गढ़ा जा रहा है?
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17 दिन की यात्रा में स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद लगातार उत्तर प्रदेश सरकार और मुख्यमंत्री पर निशाना साधते रहे हैं. मंचों से वह बिना नाम लिए बार-बार यह कहते दिखाई दिए कि “हम दोनों में केवल एक ही सच्चा सनातनी हिंदू है.” राजनीतिक जानकारों का मानना है कि इस तरह के बयान साफ संकेत देते हैं कि यात्रा का केंद्र अब गाय से ज्यादा मुख्यमंत्री से सीधा राजनीतिक टकराव बनता जा रहा है.
गौशालाओं से दूरी क्यों?
यात्रा को लेकर सबसे ज्यादा चर्चा इस बात की हो रही है कि अब तक 14 जिलों और 80 से अधिक विधानसभा क्षेत्रों का दौरा करने के बावजूद स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद ने किसी भी सरकारी गोआश्रय स्थल का औपचारिक दौरा नहीं किया. जबकि उत्तर प्रदेश सरकार लगातार दावा करती रही है कि प्रदेश में लगभग 7,500 गोआश्रय स्थल संचालित हो रहे हैं और करीब 13 लाख निराश्रित गोवंश का संरक्षण किया जा रहा है. सवाल उठ रहा है कि यदि यात्रा का मूल उद्देश्य वास्तव में गोसेवा और गोसंरक्षण है, तो फिर गोशालाओं की स्थिति, गोपालकों की समस्याओं, जैविक खेती मॉडल या गोआधारित अर्थव्यवस्था पर चर्चा प्राथमिकता में क्यों नहीं दिखाई दे रही?
मंचों पर गाय कम, राजनीति ज्यादा
यात्रा के अधिकांश मंचों पर सरकार पर हमले, राजनीतिक आरोप और वैचारिक टकराव ज्यादा दिखाई दे रहे हैं. स्थानीय स्तर पर कई जगह यह भी चर्चा है कि यात्रा में गोपालन, पशुपालन योजनाओं, सरकारी सहायता, प्राकृतिक खेती मॉडल या गौआश्रय स्थलों की व्यवस्थाओं पर अपेक्षाकृत कम बात हो रही है. राजनीतिक जानकारों का मानना है कि यदि कोई यात्रा वास्तव में सामाजिक और धार्मिक उद्देश्य से प्रेरित हो, तो उसका केंद्र समाधान और जनजागरण होता है. लेकिन यदि उसका सबसे बड़ा हिस्सा राजनीतिक आरोपों और वैचारिक संघर्ष पर केंद्रित हो जाए, तो सवाल उठना स्वाभाविक हो जाता है.
योगी सरकार का गोसंरक्षण मॉडल चर्चा में
यात्रा के बीच उत्तर प्रदेश सरकार का गोसंरक्षण मॉडल भी चर्चा में है. 2020 में लागू उत्तर प्रदेश गो-वध निवारण (संशोधन) अध्यादेश को देश के सबसे कठोर गोवध कानूनों में गिना जाता है. गोतस्करी और गोवध के खिलाफ तमाम कठोर प्रावधान लागू हैं. सरकारी आंकड़ों के अनुसार गोवंश की रक्षा के लिए अबतक प्रदेश में लगभग 36 हजार गिरफ्तारियां हुई हैं. 13,793 आरोपियों पर गुंडा एक्ट, 14,305 मामलों में गैंगस्टर एक्ट और 178 लोगों पर एनएसए लगाया गया है. इसके अलावा सरकार गोपालकों को आर्थिक सहायता भी दे रही है.
इसी वजह से अब यह सवाल और तीखा हो गया है कि जब जमीन पर इतने बड़े स्तर पर संरचनात्मक काम हो रहे हैं, तो यात्रा का मुख्य फोकस उन प्रयासों को मजबूत करने के बजाय राजनीतिक हमला क्यों बन गया है?
विपक्षी सक्रियता ने बढ़ाए संदेह
गोरखपुर से लेकर अम्बेडकरनगर तक यात्रा के कई पड़ावों पर समाजवादी पार्टी और कांग्रेस से जुड़े स्थानीय नेताओं की सक्रिय मौजूदगी भी लगातार चर्चा में बनी हुई है. कई जगह वही मंच प्रबंधन, स्वागत और भीड़ जुटाने में प्रमुख भूमिका में दिखाई दिए. इससे यह धारणा और मजबूत हुई है कि गविष्ठि यात्रा धीरे-धीरे धार्मिक जनजागरण से ज्यादा राजनीतिक विमर्श का मंच बनती जा रही है. अब सबसे बड़ा सवाल यही है, यदि यात्रा वास्तव में गोमाता की चिंता के लिए निकाली गई है, तो उसका केंद्र गौशालाएं, गोपालक, प्राकृतिक खेती और गोसेवा क्यों नहीं हैं? और यदि हर मंच पर सबसे ज्यादा चर्चा मुख्यमंत्री और राजनीतिक आरोपों की ही हो रही है, तो फिर क्या यह मान लिया जाए कि गाय केवल प्रतीक बन चुकी है और असली लड़ाई राजनीतिक है?
लेखक: ऋत्विक जायसवाल (लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं. राजनीतिक-सामाजिक मुद्दों पर लेखन करते हैं.)
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