Opinion: उत्तर प्रदेश में हर चुनाव से पहले ऐसे परिदृश्य दखने को मिलते हैं जो न सिर्फ हास्यास्पद होते हैं, बल्कि कुछ राजनीतिक दलों की वैचारिक प्रतिबद्धता के खोखलेपन को पूरी तरह उजागर कर देते हैं. दशकों तक जिस राजनीति ने 'अल्पसंख्यक तुष्टीकरण' को अपनी सत्ता की चाबी माना, वही राजनीति जब चुनाव की आहट सुनती है, तो रातों-रात अपना चोला बदलने के लिए व्याकुल हो उठती है. यह देखना बेहद दिलचस्प और विचारोत्तेजक है कि जो नेता और दल कभी बहुसंख्यक समाज की आस्थाओं, प्रतीकों और त्योहारों से दूरी बनाए रखने में ही अपनी धर्मनिरपेक्षता की सार्थकता समझते थे, वे अब माथे पर त्रिपुंड लगाकर, हाथ में पूजा की थाली थामकर और भंडारे का प्रसाद बांटते हुए कैमरों के सामने सहज दिखने का असफल प्रयास कर रहे हैं. जो बहुसंख्यकों की भावनाओं को 'सांप्रदायिकता' कह कर खारिज करते हैं, जो मंदिरों और धार्मिक अनुष्ठानों पर व्यंग्य की मुद्रा रखते हैं, वही नेता अचानक ही जनेऊधारी, भंडाराप्रेमी और मंदिरगामी हो जाते हैं. उन्हें लगता है कि जनता आस्था और अवसरवाद के फर्क को नहीं समझ पाएगी.
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तुष्टिकरण की प्रयोगशाला बनाया गया यूपी
आज जब 2027 के विधानसभा चुनाव की आहट सुनाई दे रही है, तब यह प्रश्न और भी तीखा हो उठता है कि क्या उत्तर प्रदेश का मतदाता ऐसे नेताओं के छलावे में आएगा? क्या वह भूल जाएगा कि जो नेता आज उनके देवी-देवताओं के सामने हाथ जोड़ रहा है, उसने सत्ता में रहते हुए उसकी आस्था के साथ क्या किया? भक्त शिरोमणि हनुमान जी के मंदिर में प्रसाद वितरण करने से क्या यह इतिहास बदल जाएगा कि इनकी तुष्टिकरण की नीति ने कभी सत्ता के मद में रामभक्तों पर गोलियां चलवाई थीं.
इन प्रश्नों का उत्तर देने से पहले उस राजनीतिक इतिहास को ठीक से समझना होगा, जिसने यूपी को तुष्टीकरण की प्रयोगशाला बनाया. समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष का ताजा 'सनातनी अवतार' इस पूरे खेल का सबसे ताजा अध्याय है. जिनकी सरकार में मुजफ्फरनगर दंगों की आग भड़की और प्रशासन मूकदर्शक बना रहा, जिनके राज में हिंदू आस्था के प्रतीक पर्व-त्योहारों पर भय का माहौल बना दिया जाता था, शोभायात्राओं के रास्ते बदल दिए जाते थे, वही सपा प्रमुख आज भंडारे में प्रसाद बांटते हैं, सोशल मीडिया पर हनुमान भक्त की मुद्रा में फोटो पोस्ट करते हैं. इसी उम्मीद में कि शायद इसका चुनावी लाभ मिलेगा. लेकिन, क्या वाकई ऐसा होगा?
कांग्रेस ने गढ़ी ‘हिंदू आतंकवाद’ की शब्दावली
जिस समाज ने बहुत कुछ भुगता हो, उसकी स्मृतियां विस्मृत नहीं होतीं. सत्य की स्याही से लिखा इतिहास न तो भंडारे के प्रसाद से मिटता है, न चुनावी तिलक से. हालांकि इस कतार में सपा प्रमुख अकेले नहीं हैं. 2019 के लोकसभा चुनाव से ठीक पहले राहुल गांधी का 'जनेऊधारी ब्राह्मण' अवतार याद कीजिए. मंदिर-दर-मंदिर जाना, गोत्र बताना, जनेऊ की डोर दिखाना. यह वह समय था, जब कांग्रेस के मंच से 'हिंदू आतंकवाद' की शब्दावली गढ़ी जा चुकी थी, जब पार्टी के प्रवक्ता हिंदू देवी-देवताओं पर आपत्तिजनक टिप्पणियां करते हिचकते नहीं थे और इस तरह के मामलों में राज्य की शक्ति का बेजा इस्तेमाल भी किसी से छुपा नहीं था. राहुल गांधी की मंदिर-यात्रा तो इतनी कृत्रिम और इतनी गणनापूर्ण थी कि स्वयं कांग्रेस के वरिष्ठ नेता मंच पर असहज दिखते थे. लेकिन, लगातार अपने आराध्यों का अपमान सह रही जनता ने उसी चुनाव में इस दोहरे आचरण का कड़ा उत्तर दे दिया था.
सेकुलरिज्म और सांप्रदायिकता का मतलब
उत्तर प्रदेश की दृष्टि से देखें तो सपा संस्थापक वह केंद्रीय पात्र हैं, जिनके बिना इस इतिहास की कोई व्याख्या पूरी नहीं होती. 1990 में कारसेवकों पर गोलियां चलवाने वाली सपा सरकार ने यूपी में एक ऐसी राजनीति का स्थायी ढांचा खड़ा किया, जिसमें एक समुदाय की हर मांग को बिना जांचे स्वीकार करना 'सेकुलरिज्म' था और बहुसंख्यकों की न्यायसंगत शिकायत को सुनना 'सांप्रदायिकता'. इस विरासत को वर्तमान सपा नेतृत्व ने और परिपक्व व परिष्कृत किया. 2012 से 2017 के बीच यूपी में जो हुआ वह किसी को भूला नहीं है. दंगों में पक्षपातपूर्ण कार्रवाई, अपराधियों का राजनीतिक संरक्षण, और एक ऐसी शासन-संस्कृति जिसमें वर्दी भी समुदाय देखकर काम करती थी. इस अवसरवादी राजनीति ने केवल नेताओं के चरित्र को ही उजागर नहीं किया, बल्कि इसके गहरे और आत्मघाती दुष्परिणामों ने पूरे देश को अपूरणीय क्षति पहुंचाई. शाह बानो मामले में सर्वोच्च न्यायालय के ऐतिहासिक और प्रगतिशील फैसले को संसद के जरिए पलट देना भारतीय राजनीति का वह कलंक है, जिसने यह स्थापित कर दिया कि इस देश में एक विशेष वर्ग की मजहबी कटरपंथी भावनाओं को संविधान और कानून से ऊपर भी रखा जा सकता है. तुष्टीकरण की इसी नीति ने कश्मीर में कश्मीरी पंडितों के भीषण नरसंहार और पलायन पर दिल्ली के हुक्मरानों को आंखें मूंदने पर मजबूर किया, क्योंकि वहां पीड़ितों का कोई वोट बैंक नहीं था.
मुस्लिमों को ही पहुंचाया नुकसान
विख्यात चिंतक और राज्यसभा सांसद रहे स्वपन दासगुप्त ने इस विकृति को बेलाग शब्दों में कहा है- ‘भारत में धर्मनिरपेक्षता का क्रमशः यह अर्थ बन गया कि बहुसंख्यकों के धार्मिक प्रतीकों और सांस्कृतिक भावनाओं के प्रति उदासीनता या सक्रिय शत्रुता रखो, और अल्पसंख्यकों के हर दावे को बिना परीक्षण के स्वीकार कर लो. यह धर्मनिरपेक्षता नहीं है, यह बहुसंख्यक-विरोधी पक्षपात है.’ यह टिप्पणी आज भी तीखी और प्रासंगिक है. यहां एक और गहरी सच्चाई कहनी होगी जिसे तुष्टीकरण के पैरोकार कभी स्वीकार नहीं करते. इस राजनीति ने केवल बहुसंख्यकों को ही नहीं, स्वयं उस समुदाय को भी अपूरणीय क्षति पहुंचाई है जिसके नाम पर यह खेल खेला जाता रहा. यूपी में जो मुस्लिम युवा आईटी सेक्टर में जाना चाहता था, जो मुस्लिम लड़की आधुनिक शिक्षा चाहती थी, उसे वोट-बैंक की राजनीति ने ऐसे दुर्ग में कैद रखा जिसकी दीवारें उनके अपने नेताओं ने खड़ी की थीं. पंडित दीनदयाल उपाध्याय ने कहा था- ‘जो राजनीति समाज को टुकड़ों में बांटकर सत्ता पाती है, वह राजनीति नहीं, राष्ट्र के विरुद्ध षड्यंत्र है.’
दोहरेपन की पहचान अब उजागर
इस पूरी पृष्ठभूमि में जब सपा के मुखिया भंडारे में दिखते हैं या राहुल गांधी शिवलिंग की पूजा करते हैं, तो यह केवल सनातनी धर्मावलंबियों को भरमाने का प्रयास नहीं है. यह उस पूरी राजनीतिक संस्कृति का प्रतिबिंब है, जिसमें हिंदू समाज को वोट लेने के समय जोड़ा जाता है और शेष समय उसकी अस्मिता, उसके प्रतीकों, उसकी परंपराओं को या तो उपेक्षित किया जाता है या उन पर प्रहार किया जाता है. इस दोहरेपन की पहचान धीरे-धीरे व्यापक होती जा रही है. 2014 और 2019 के चुनाव परिणाम, और उसके बाद के राज्य चुनावों के नतीजे बताते हैं कि सनातनी समाज अब इस नाटक से ऊब चुका है. वह नकली 'सनातनी चोले' को पहचानना सीख गया है. वह अपनी सांस्कृतिक पहचान और स्वाभिमान को लेकर सजग हो चुका है. लोग समझ चुके हैं कि जो श्रद्धा केवल चुनावों के समय जागृत होती है, वह चुनाव बीतते ही कपूर की तरह उड़ जाती है.
वास्तविक सनातन धर्म केवल प्रतीकों को धारण करने या भंडारे में पूड़ी बांटने से नहीं आता, बल्कि वह राष्ट्र प्रथम की भावना, न्याय की निष्पक्षता और सभी के लिए समान अधिकारों के प्रति निष्ठा रखने से आता है. चुनावी लाभ के लिए सनातनी चोला ओढ़ने वाले नेताओं को यह याद रखना चाहिए कि सनातन की संस्कृति अंतर्मन के भाव को देखती है, बाहरी स्वांग को नहीं. वैसे भी ये मौसमी बदलाव केवल एक राजनीतिक तमाशा ही हैं. लोग इस छद्म सनातनी अभिनय से दिग्भ्रमित होने वाले नहीं.
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