Opinion: शिवपाल को सपा की कमान देने की मांग कितनी जायज...कभी मुलायम के लिए लाठियां खाईं, जमीन से पार्टी को अर्श तक पहुंचाया

सपा में नेतृत्व को लेकर नई बहस छिड़ गई है. शिवपाल यादव को पार्टी की कमान सौंपने की मांग तेज हो रही है. कार्यकर्ताओं के बीच उनकी पकड़, संगठनात्मक अनुभव और जमीनी जुड़ाव को 2027 चुनाव से पहले अहम माना जा रहा है.

शिवपाल यादव. (फाइल फोटो)

यूपी तक

• 04:53 PM • 23 May 2026

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Opinion: समाजवादी पार्टी (सपा) में एक बार फिर से नेतृत्व और पीढ़ीगत संक्रमण की बहस छिड़ गई है. सुल्तानपुर में सपा नेता जितेंद्र वर्मा ने एक कार्यक्रम के दौरान जो बयान दिया उसने न केवल पार्टी के अंदरूनी तनाव को उजागर किया बल्कि 2027 के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव से पहले एक नई खींचतान की नींव भी रख दी. वर्मा ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि पार्टी की कमान अब शिवपाल सिंह यादव के हाथों में जानी चाहिए. उनकी इस मांग पर मौजूद कार्यकर्ताओं ने इतनी जोरदार तालियां बजाईं कि पूरा कार्यक्रम एक तरह से शिवपाल यादव के समर्थन में मुनादी बन गया. उत्तर प्रदेश की राजनीति को समझने वाले जानते हैं कि यह तालियां बिना कारण नहीं बजीं.
 
2017 के बाद की सपा को देखने वाला जेन-ज़ी पीढ़ी का का एक बड़ा वर्ग मुख्य रूप से अखिलेश यादव के चेहरे को ही पार्टी का प्रतीक मानता है. सोशल मीडिया, रैलियां और आधुनिक छवि के कारण अखिलेश की नेतृत्व शैली नई पीढ़ी के एक वर्ग को आकर्षित करती हैं. लेकिन सपा का असली इतिहास मुलायम सिंह यादव के साथ खड़े उन नेताओं की मेहनत से लिखा गया है जिन्होंने पार्टी को अपने खून-पसीने से सींचा और इनमें सबसे प्रमुख नाम है शिवपाल सिंह यादव-मुलायम के छोटे भाई, अखिलेश के चाचा और पार्टी के सबसे अनुभवी ग्रासरूट संगठक.

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मुलायम की सफलता के पीछे शिवपाल का फील्ड वर्क

शिवपाल यादव का राजनीतिक सफर सिर्फ पदों और चुनावी जीत का नहीं बल्कि बलिदान और अथक सेवा का है. मुलायम सिंह यादव जब यूपी और देश की राजनीति के शीर्ष तक पहुंचे तो उसके पीछे शिवपाल की रणनीतिक समझ और फील्ड वर्क का अहम योगदान था. 1990 के दशक में जब सपा का गठन हुआ तब शिवपाल ने जिला स्तर से लेकर गांव-गांव तक पार्टी को मजबूत किया. उन्होंने पर्चे बांटे, बैठकें कीं, कार्यकर्ताओं को जोड़ा और संकट के समय बड़े भाई का साथ कभी नहीं छोड़ा. 

इतना ही नहीं मुलायम सिंह यादव ने खुद भावुक होकर एक बार कहा था, 'पार्टी बनाने के लिए हमने बहुत संघर्ष किया है. हमने और शिवपाल ने बहुत लाठियां खाई हैं। मैं साढ़े तीन साल जेल में रहा हूं. यह जो आज हवा में उछल रहे हैं, वे एक लाठी भी नहीं झेल पाएंगे. शिवपाल ने जनता के लिए बहुत संघर्ष किया है और मैं और शिवपाल कभी अलग नहीं हो सकते.' यह उद्धरण सपा के इतिहास में स्वर्ण अक्षरों में दर्ज है. यह कोई साधारण वाक्य नहीं था बल्कि यह उस विश्वास और बलिदान की कहानी था, जब शिवपाल ने बड़े भाई की सुरक्षा और राजनीतिक अस्तित्व के लिए खुद को झोंक दिया.

मुलायम पर राजनीतिक कार्रवाई और शिवपाल का साथ

वीपी सिंह के मुख्यमंत्री काल में मुलायम सिंह यादव पर डकैतों से संबंध के शक में CID जांच और कार्रवाई का खतरा मंडरा रहा था. उस दौरान परिवार के सदस्यों, जिनमें शिवपाल सिंह यादव भी शामिल थे, ने मुलायम को बचाने और राजनीतिक संरक्षण दिलाने में अहम भूमिका निभाई. बाद में जब मुलायम मुख्यमंत्री बने, तो शिवपाल उनके सबसे भरोसेमंद सहयोगी बने. 

कई अहम जिम्मेदारियां संभाल चुके हैं शिवपाल

1996 में जसवंतनगर से पहली बार विधायक चुने गए शिवपाल ने तब से लगातार छह बार इसी सीट पर जीत हासिल की. उन्होंने मंत्री पद संभाला, विपक्ष के नेता बने और पार्टी के उत्तर प्रदेश इकाई के अध्यक्ष के रूप में संगठन को मजबूत किया. 2007-2012 के मायावती शासन में जब सपा विपक्ष में थी तब शिवपाल ने विधानसभा में आक्रामक अंदाज में पार्टी की आवाज बुलंद की.

सपा में शिवपाल यादव के कद का कोई दूसरा नेता नजर नहीं आता

आज सपा में शिवपाल यादव के कद का कोई दूसरा नेता नजर नहीं आता. उनका अनुभव, समाजवादी विचारधारा के प्रति अडिग वफादारी और कार्यकर्ताओं से सीधा जुड़ाव बेमिसाल है. जानकार बताते हैं कि शिवपाल यादव पार्टी के गली-मोहल्ले के कार्यकर्ताओं के नाम भी याद रखते हैं. यह कोई छोटी बात नहीं है. आज की बड़ी राजनीतिक पार्टियों में शीर्ष नेता अक्सर मंच से भाषण देते हैं. लेकिन जमीनी स्तर पर कार्यकर्ता का नाम भूल जाते हैं. शिवपाल इसमें अपवाद हैं। कोई साधारण कार्यकर्ता जब उनसे मिलने पहुंचता है तो वे न सिर्फ उसका नाम लेते हैं बल्कि उसके परिवार की कुशलक्षेम भी पूछते हैं. यही कारण है कि जसवंतनगर और आसपास के इलाकों में उनका जनाधार आज भी अटूट है.

धर्मेंद्र यादव में दिखती है शिवपाल की छाप

शिवपाल की राजनीतिक शैली की छाप उनके भतीजे धर्मेंद्र यादव में भी साफ दिखती है. धर्मेंद्र यादव आज भी स्कूल-कॉलेज के पुराने दोस्तों और यूनिवर्सिटी साथियों के लिए नंगे पैर दौड़ पड़ते हैं. आजमगढ़ हो या बिजनौर, कोई सामान्य व्यक्ति उनके पास पहुंच जाए तो वे खड़े होकर उसका स्वागत करते हैं. पूरे प्रदेश में युवजन सभा को खड़ा करने का श्रेय भी मुख्य रूप से धर्मेंद्र को जाता है. हर जिले में उनके हजारों व्यक्तिगत कार्यकर्ता हैं, जो सीधे उनसे संपर्क में रहते हैं. यह ग्रासरूट कनेक्टिविटी शिवपाल यादव की विरासत है, जिसे उन्होंने परिवार के नए सदस्यों में स्थानांतरित किया है.

2017 का पारिवारिक विवाद सपा के लिए एक दर्दनाक अध्याय था। बाद में शिवपाल ने प्रगतिशील समाजवादी पार्टी (लोहिया) बनाई। वर्तमान में सपा को कई चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है. पश्चिम बंगाल चुनाव में भाजपा को मिली प्रचंड जीत का असर उत्तर प्रदेश में भी है. सपा के युवा कार्यकर्ता ऊर्जा चाहते हैं.लेकिन अनुभव की कमी महसूस करते हैं. ऐसे में शिवपाल यादव जैसे नेता, जिनके पास दशकों का संगठनात्मक अनुभव है, पार्टी को नई दिशा दे सकते हैं. जितेंद्र वर्मा की मांग को कुछ लोग हास्यास्पद मान सकते हैं. लेकिन सपा के इतिहास को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता. उनका कोई विकल्प फिलहाल सपा के पास नहीं दिखता.

(लेखक- डॉ. शब्द प्रकाश, दिल्ली विश्वविद्यालय के इतिहास विभाग में असिस्टेंट प्रोफेसर हैं.इसके साथ ही ये सामाजिक और राजनीतिक मुद्दों पर लेखन करते हैं.)

(Disclaimer: यहां व्यक्त विचार लेखक की व्यक्तिगत राय हैं.)