Priya Saroj: भारतीय क्रिकेट के फिनिशर रिंकू सिंह के सिर से पिता का साया उठ गया है. अलीगढ़ की तंग गलियों से निकलकर स्टारडम की बुलंदियों तक पहुंचाने वाले रिंकू के पिता खानचंद्र सिंह का लंबी बीमारी के बाद निधन हो गया. पिता को मुखाग्नि रिंकू सिंह के बड़े भाई सोनू ने दी. हालांकि इस दौरान रिंकू सिंह की मंगेतर और सपा सांसद प्रिया सरोज की गैरमौजूदगी भी चर्चा का विषय बन गई. सोशल मीडिया पर लोग सवाल कर रहे हैं कि आखिर प्रिया सिंह कहां थी और वो क्यों नहीं आईं.
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कहां थीं प्रिया सरोज? सोशल मीडिया पर तेज हुई चर्चा
रिंकू सिंह के पिता खानचंद्र सिंह के अंतिम संस्कार में मछली शहर से समाजवादी पार्टी की सांसद प्रिया सरोज की अनुपस्थिति ने चर्चाओं का बाजार गर्म कर दिया है. बताया जा रहा है कि प्रिया सरोज अस्पताल में मौजूद थीं और एंबुलेंस से पार्थिव देह को घर तक पहुंचाने में मदद की. सूत्रों के अनुसार, हिंदू रीति-रिवाजों और पारिवारिक मान्यताओं के कारण शादी से पहले होने वाली बहू का इस तरह के कार्यक्रमों में शामिल होना वर्जित माना जाता है. इसी वजह से वह और उनका परिवार वहां नजर नहीं आया. कहा जा रहा है कि प्रिया ने ही रिंकू को ढांढस बंधाया और देश के लिए खेलने के लिए प्रोत्साहित किया.
गरीबी से फेम तक की जर्नी
रिंकू सिंह आज करोड़ों में खेल रहे हैं. लेकिन उनके पिता खानचंद्र सिंह की सादगी ने सबका दिल जीत लिया. तीन दशक से ज्यादा समय तक उन्होंने गैस सिलेंडर ढोने (हॉकर) का काम किया. स्थानीय लोगों और उनके संगी-साथियों का कहना है कि बेटा स्टार बन गया और पैसों की भी अब कोई कमी नहीं है. लेकिन पिता ने अपना काम नहीं छोड़ा. वे कहते थे 'अगर काम नहीं करूंगा तो बीमार पड़ जाऊंगा.' शुरुआती दिनों में वे रिंकू के क्रिकेट खेलने के खिलाफ थे और चाहते थे कि बेटा पढ़ाई कर कोई नौकरी करे ताकि गरीबी दूर हो सके.कोच मसूद अमीनी बताते हैं कि रिंकू को कई बार पिता की डांट और मार भी खानी पड़ी. लेकिन आज वही पिता अपने बेटे की कामयाबी पर सबसे ज्यादा गर्व करते थे.
रिंकू ने नहीं दी मुखाग्नि, भाई सोनू सिंह ने निभाया फर्ज
अंतिम संस्कार के दौरान एक बात ने सबका ध्यान खींचा कि रिंकू सिंह ने अपने पिता को मुखाग्नि नहीं दी. उनके भाई सोनू सिंह ने यह रस्म अदा की. इसके पीछे की वजह रिंकू का अपने खेल और देश के प्रति समर्पण बताया जा रहा है. रिंकू सिंह टी-20 वर्ल्ड कप और जिम्बाब्वे दौरे के बीच अपने पिता से मिलने आए थे. लेकिन कर्तव्य की पुकार पर वे वापस लौट गए.सोशल मीडिया पर जहां कुछ लोग उनकी आलोचना कर रहे हैं कि उन्हें अंतिम समय में पिता के पास होना चाहिए था. वहीं बहुत से लोग उनके इस जज्बे को सलाम कर रहे हैं कि दुख की इस घड़ी में भी वे देश के लिए मैदान पर डटे रहे.
रिंकू सिंह के पिता के अंतिम संस्कार में भारी संख्या में मुस्लिम समुदाय के लोग और रोजेदार पहुंचे. रिंकू के बचपन के दोस्त वसीम और उनके कोच मसूद अमीनी ने रिंकू के करियर में उस वक्त साथ दिया जब उनके पास बल्ला खरीदने तक के पैसे नहीं थे. वसीम ही वह शख्स थे जिन्होंने रिंकू को पहला बल्ला दिलाया था.आज उनकी विदाई में उमड़ी यह भीड़ अलीगढ़ के आपसी भाईचारे की गवाह बनी.
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