वाराणसी के उदय प्रताप कॉलेज में बीते 20 मार्च को हुई सनसनीखेज वारदात ने पूरे प्रदेश को झकझोर कर रख दिया था. बीएससी सेकेंड ईयर के छात्र सूर्य प्रताप सिंह की उसी के साथी मंजीत चौहान ने दिनदहाड़े गोली मारकर हत्या कर दी थी. इस घटना के बाद से ही कॉलेज प्रशासन और सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े हो रहे थे. एक हफ्ते की चुप्पी के बाद UP कॉलेज के प्रिंसिपल डॉ. धर्मेंद्र कुमार सिंह ने यूपी Tak से खास बातचीत की और उन सभी सवालों के जवाब दिए जो अब तक रहस्य बने हुए थे.
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देरी से बयान देने पर सफाई- पुलिस जांच में कर रहे थे सहयोग
घटना के एक हफ्ते बाद सामने आने के सवाल पर प्रिंसिपल डॉ. सिंह ने कहा कि यह समय देरी का नहीं, बल्कि व्यवस्थाओं को संभालने और पुलिस जांच में सहयोग करने का था. उन्होंने कहा, "घटना के बाद महाविद्यालय दो दिन तक बंद रहा और हमने शोक मनाया. पुलिस सीसीटीवी फुटेज, हार्ड डिस्क और गवाहों के बयान दर्ज कर रही थी, जिसमें हमारा पूरा सहयोग रहा. संवेदनशील मामले में गलत जानकारी बाहर न जाए, इसलिए हम फूंक-फूंक कर कदम रख रहे थे."
'कभी नहीं मिली कोई शिकायत'
सबसे बड़ा सवाल यह था कि क्या कॉलेज को दोनों छात्रों के बीच चल रही रंजिश का पता नहीं था? इस पर प्रिंसिपल ने स्पष्ट किया कि न तो प्रॉक्टोरियल बोर्ड और न ही उनके कार्यालय को कभी इन दोनों के विवाद की जानकारी मिली.
उन्होंने बताया, "ये दोनों छात्र इंटरमीडिएट से ही साथ पढ़ रहे थे. अगर इनके बीच कोई पुरानी रंजिश थी, तो उन्होंने कभी इसकी शिकायत कॉलेज प्रशासन से नहीं की. छात्र सोशल मीडिया (इंस्टाग्राम, फेसबुक) पर क्या कर रहे हैं, इसकी जानकारी रखना कॉलेज के लिए संभव नहीं है. यह एक मनोवैज्ञानिक पहलू भी हो सकता है कि किसी बात पर छात्र इतना हिंसक हो गया."
कॉल डिटेल और चिकन पॉक्स का विवाद
मृतक सूर्य प्रताप के परिजनों का आरोप था कि उसे कॉलेज से फोन करके बुलाया गया था, जबकि उसे चिकन पॉक्स था. प्रिंसिपल ने इन आरोपों को पूरी तरह निराधार बताया. उन्होंने चुनौती देते हुए कहा, "पुलिस सीडीआर निकलवा ले. हमारे ऑफिस या किसी स्टाफ ने उसे फोन नहीं किया था. वह उस दिन मिड टर्म बैक का फॉर्म भरने खुद आया था. उसी दौरान उसे 17 तारीख की एक अन्य घटना के संबंध में काउंसलिंग के लिए रोका गया था, जिसका आरोपी मंजीत से कोई लेना-देना नहीं था."
उस दिन क्या हुआ? शिक्षक न होते तो हत्यारा और गोलियां चलाता
प्रिंसिपल ने घटना के समय की बहादुरी का जिक्र करते हुए बताया कि जब गोली चली, तो प्रॉक्टोरियल बोर्ड के सदस्यों मनोज सिंह, विजय सिंह और चंद्रशेखर ने अपनी जान की परवाह किए बिना हत्यारे मंजीत को दौड़ाया.
"मंजीत अपनी रिवॉल्वर को रीलोड करने की कोशिश कर रहा था. अगर हमारे शिक्षक उसे नहीं दौड़ाते, तो वह और भी गोलियां चला सकता था. शिक्षकों के पीछा करने के कारण ही वह छत से कूदकर भागा और अपना हथियार फेंक दिया, जिसे बाद में पुलिस ने बरामद किया."
उन्होंने उन आरोपों को भी गलत बताया कि घायल छात्र को गाड़ी नहीं दी गई. उन्होंने कहा कि कॉलेज की आधिकारिक बोलेरो गाड़ी से ही सूर्य प्रताप को तत्काल अस्पताल ले जाया गया था.
'अभिभावक भी लें जिम्मेदारी'
डॉ. सिंह ने इस पूरी घटना के लिए केवल प्रशासन को दोषी ठहराने पर आपत्ति जताई. उन्होंने कहा कि अभिभावकों को भी अपने बच्चों की परवरिश और उनकी सोशल मीडिया गतिविधियों पर नजर रखनी चाहिए.
उन्होंने तीखे शब्दों में कहा, "जब हम छोटी शिकायतों पर माता-पिता को फोन करते हैं, तो वे अक्सर आने से मना कर देते हैं. बच्चा इंस्टाग्राम पर क्या पोस्ट डाल रहा है, वह माफिया बनने का स्टेटस लगा रहा है या अपराध की दुनिया से प्रभावित है, यह देखना परिवार का काम है। कॉलेज केवल पढ़ाई का माहौल दे सकता है, घर की परवरिश का विकल्प नहीं."
जातिवाद और भेदभाव के आरोपों का खंडन
कॉलेज में जातिगत भेदभाव (SC/ST छात्रों को परेशान करने) के आरोपों पर प्रिंसिपल ने डेटा पेश किया. उन्होंने बताया कि कॉलेज में लगभग 60% छात्र ओबीसी श्रेणी के हैं और 65-70% छात्राएं हैं. कॉलेज प्रमाण पोर्टल पर नंबर वन है और हाल ही में कई छात्रों ने गेट (GATE) और नेट (NET) जैसी परीक्षाएं पास की हैं. उन्होंने कहा कि कुछ अराजक तत्व कॉलेज की छवि खराब करने के लिए ऐसे निराधार आरोप लगाते हैं.
'माफिया नहीं, अच्छे नागरिक बनें'
बातचीत के अंत में प्रिंसिपल डॉ. धर्मेंद्र कुमार सिंह ने समस्त छात्र समुदाय से शांति बनाए रखने की अपील की. उन्होंने कहा, "राजर्षि जी ने यह कॉलेज माफिया बनाने के लिए नहीं खोला था. मेरा छात्रों से आग्रह है कि वे अपनी ऊर्जा पढ़ाई और करियर बनाने में लगाएं. अपराधी मंजीत चौहान को कॉलेज से निष्कासित किया जा रहा है और कानून अपना काम करेगा."
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