Raebareli Monsoon Delay: आसमान में बादलों की बेरुखी और सूरज के तीखे तेवरों ने रायबरेली के अन्नदाताओं की रातों की नींद उड़ा दी है. अषाढ़ के महीने में भी जब आसमान से बूंदें टपकनी चाहिए थीं, तब उमस भरी गर्मी पसीने छुड़ा रही है. हालत यह है कि मानसून की इस दगाबाज़ी के चलते जिले की लाइफलाइन कही जाने वाली धान की फसल खेतों में ही दम तोड़ने की कगार पर पहुंच गई है.अब फसल को बचाने के लिए किसानों को अपनी जेब ढीली कर 'महंगे पानी' का सहारा लेना पड़ रहा है, जिससे खेती का बजट पूरी तरह चरमरा गया है.
ADVERTISEMENT
बिजली 'लापता', डीजल पंपों का सहारा
जिन किसानों ने भारी उम्मीदों के साथ पहले ही धान की रोपाई कर दी थी, उनके खेतों में अब दरारें पड़ने लगी हैं. सरकारी सिंचाई व्यवस्था और बिजली विभाग के बड़े-बड़े दावे हवा-हवाई साबित हो रहे हैं. अनियमित बिजली सप्लाई के कारण सरकारी ट्यूबवेल सफेद हाथी बन चुके हैं. ऐसे में बेबस किसान अपनी गाढ़ी कमाई का पैसा डीजल-पेट्रोल वाले पंपिंग सेटों में फूंकने को मजबूर हैं.
भांव के किसानों का दर्द: हर हफ्ते जेब पर डाका.
राही ब्लॉक के भांव गांव के किसानों का दर्द इस समय चरम पर है. वहां के जागरूक किसानों ने अपना हाल बयां करते हुए कहा कि धान की फसल कोई आम फसल नहीं है, इसे हर 8 से 10 दिन में पानी की भारी खुराक चाहिए होती है. जब कुदरत ने हाथ खींच लिए, तो हमें हर हफ्ते पंपिंग सेट चालू करना पड़ रहा है. डीजल का भाव आसमान छू रहा है और बिजली आती नहीं. अगर यही हाल रहा तो लागत भी वसूल नहीं होगी.
पैदावार पर मंडराया संकट का साया
कृषि विशेषज्ञों की मानें तो धान की शुरुआती रोपाई और बढ़वार के समय खेतों में पर्याप्त नमी होना संजीवनी की तरह है. लेकिन इस बार मानसून की बेरुखी ने खेतों को रेगिस्तान बनाने की ठान ली है. किसानों का साफ कहना है कि अगर अगले कुछ दिनों में इंद्रदेव ने अपनी कृपा नहीं बरसाई, तो इस बार धान की पैदावार औंधे मुंह गिरेगी.अब देखना यह है कि प्रशासन इन बेबस किसानों को राहत देने के लिए बिजली आपूर्ति सुधारता है या फिर किसान यूं ही आसमान की तरफ टकटकी लगाए भगवान भरोसे बैठा रहेगा.
ADVERTISEMENT











