प्रयागराज के अमन ने कबाड़ से बनाया बिना गैस वाला चूल्हा, जले हुए मोबिल ऑयल से बन रही हैं गर्मागर्म जलेबियां

आनंद राज

02 Apr 2026 (अपडेटेड: 02 Apr 2026, 06:30 PM)

Prayagraj News: प्रयागराज के अमन गुप्ता ने गैस सिलेंडर की कमी के बीच पुराने मोबिल ऑयल से चलने वाला देसी चूल्हा बनाया. 200 के खर्च में दिनभर बन रही हैं जलेबियां.

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संगम नगरी के अतरसुईया सब्जी मंडी इलाके में इन दिनों एक जुगाड़ वाला चूल्हा कौतूहल का विषय बना हुआ है. जब कमर्शियल गैस सिलेंडर की कमी के कारण जलेबी विक्रेता अमन गुप्ता का धंधा ठप होने लगा तो उन्होंने हार मानने के बजाय दिमाग दौड़ाया. नतीजा यह हुआ कि आज वे बिना एलपीजी के पुराने जले हुए मोबिल ऑयल की मदद से भट्टी दहका रहे हैं और ग्राहकों को धड़ाधड़ जलेबियां परोस रहे हैं.

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2500 में तैयार हुई स्वदेशी भट्टी

अमन ने इस अनोखे चूल्हे को तैयार करने के लिए किसी महंगी मशीन का नहीं, बल्कि कबाड़ का सहारा लिया है. उन्होंने पुरानी कोल्ड ड्रिंक की बोतल, तेल का खाली डिब्बा, लोहे के पाइप और एक छोटे ब्लोअर को जोड़कर यह सिस्टम बनाया है. इसमें ईंधन के रूप में गैरेज से मिलने वाले बेकार जले हुए मोबिल ऑयल का इस्तेमाल होता है. ब्लोअर की हवा और मोबिल की बूंदों के मेल से ऐसी तेज आंच निकलती है, जो बड़े से बड़े कमर्शियल चूल्हे को मात दे दे.

गैस के मुकाबले 80% तक की बचत

अमन बताते हैं कि कमर्शियल सिलेंडर महंगा होने के साथ-साथ कई बार बाजार से गायब भी हो जाता है, जिससे उनकी दुकान दो दिनों तक बंद रही. लेकिन इस देसी जुगाड़ ने उनकी किस्मत बदल दी. इस चूल्हे को बनाने में मात्र 2500 की वन-टाइम लागत आई. अब रोजाना करीब 5 लीटर पुराना मोबिल ऑयल खर्च होता है, जिसकी कीमत लगभग 200 पड़ती है. यह खर्च गैस सिलेंडर के मुकाबले बेहद मामूली है.

सुबह 6 बजे से उमड़ रही है भीड़

अमन के पिता द्वारा शुरू की गई यह दुकान पहले से ही अपने स्वाद के लिए मशहूर थी लेकिन अब लोग इस टेक्नोलॉजी को देखने भी दूर-दूर से आ रहे हैं. सुबह 6 से 11 बजे तक दुकान पर भारी भीड़ रहती है. कई स्थानीय दुकानदार और छोटे कारोबारी भी अमन से इस चूल्हे की बारीकियां सीख रहे हैं ताकि वे भी महंगाई और गैस की किल्लत से निजात पा सकें.

अमन का कहना है कि यह प्रयोग मजबूरी में शुरू हुआ था क्योंकि परिवार की रोजी-रोटी इसी दुकान पर टिकी है. आज उनका यह सस्ता और टिकाऊ मॉडल न सिर्फ उनका मुनाफा बढ़ा रहा है, बल्कि आत्मनिर्भर भारत की एक छोटी लेकिन सशक्त तस्वीर भी पेश कर रहा है.