मेरठ, उत्तर प्रदेश: दिल्ली से मेरठ जाने वाले यात्रियों के लिए दिल्ली-मेरठ एक्सप्रेसवे एक बड़ी राहत है. पहले इस रास्ते में 2-3 घंटे लग जाते थे, अब सिर्फ 45-60 मिनट में पहुंचा जा सकता है, लेकिन कई लोग सोचते हैं कि नेशनल हाईवे या एक्सप्रेसवे बनाने की लागत वसूल होने के बाद टोल कलेक्शन बंद हो जाता है. भारतीय राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण (NHAI) ने इस आम धारणा को साफ तौर पर खारिज कर दिया है.
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NHAI के अनुसार, राष्ट्रीय राजमार्गों या एक्सप्रेसवे पर टोल सिर्फ निर्माण लागत वसूल करने तक ही नहीं लिया जाता. टोल वसूली राष्ट्रीय राजमार्ग शुल्क नियम (National Highways Fee Rules) के तहत होती है. यह पैसा सड़क की नियमित मरम्मत, रखरखाव, सुरक्षा उपायों , लाइटिंग और यात्रियों की सुविधा के लिए इस्तेमाल होता है. इससे यात्रा सुरक्षित और सुगम बनी रहती है.
दिल्ली-मेरठ एक्सप्रेसवे की खास बातें
- लंबाई: करीब 82-96 किमी.
- खासियत: भारत का सबसे चौड़ा 14 लेन वाला एक्सप्रेसवे.
- समय: दिल्ली से मेरठ मात्र 45-60 मिनट में.
- टोल: सराय काले खां से मेरठ तक लगभग 175 रुपये (हल्के वाहनों के लिए).
भारत का पहला 14-लेन का एक्सप्रेसवे
- इसका दिल्ली से डासना (गाजियाबाद) तक का हिस्सा 14 लेन का है. इसमें बीच की 6 लेन एक्सप्रेसवे हैं और दोनों तरफ की 4-4 (कुल 8) लेन नेशनल हाईवे और लोकल ट्रैफिक के लिए हैं.
- यह एक्सप्रेसवे पूरी तरह से सिग्नल-फ्री है. दिल्ली से मेरठ के बीच आपको एक भी ट्रैफिक लाइट या कट नहीं मिलेगा, जिससे गाड़ियां बिना रुके अपनी तय स्पीड से चल सकती हैं.
क्यों जरूरी है टोल?
NHAI कहता है कि टोल से मिला पैसा सिर्फ नई सड़क बनाने में नहीं, बल्कि पुरानी सड़कों को अच्छी हालत में रखने, दुर्घटनाएं कम करने और यात्रियों को बेहतर सुविधा देने में लगता है. बिना इस फंड के बड़े एक्सप्रेसवे जैसे दिल्ली-मेरठ को लंबे समय तक अच्छा रखना मुश्किल होगा.
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